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राजनीतिक आरक्षण पर संकेत विद्रोही का सनसनीखेज खुलासा

Published On :    14 Dec 2019   By : MN Staff
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एक बार फिर से संसद के दोनों सदनों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के राजनीतिक आरक्षण को मंजूरी मिल गई है



एक बार फिर से संसद के दोनों सदनों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के राजनीतिक आरक्षण को मंजूरी मिल गई है और मीडिया में खासकर प्रिंट मीडिया में खबरें आ रही हैं कि अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति का आरक्षण और दस साल के लिए बढा दिया गया. लेकिन, खबरें देने वाले ब्राह्मण-बनिया प्रचार माध्यम ये नहीं बताये कि वह राजनीतिक आरक्षण है. जिसकी समय सीमा संविधान निर्माताओं ने 10 साल के लिए तय की थी. पिछली बार बढ़ाए गए राजनीतिक आरक्षण की समयसीमा आने वाले 25 जनवरी 2020 तक है.



सबसे पहले हम यहा ये देखेंगे कि क्या शिक्षा और नौकरी के आरक्षण के लिए 10 साल की समय सीमा रखी गई थी, या यह महज एक अफवा है? लोकसभा की पूर्व अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने संघ के एक कार्यक्रम में कहा था कि डॉ.बाबासाहब ने केवल 10 साल के लिए आरक्षण दिया था. 


राजनितिक नेता अपने फायदे के लिए हर दस साल के बाद इसे बिना किसी दिक्कत के बढा देते है, इस प्रकार का सफेद झूठ उन्होंने पेश किया. आरक्षण के बारे में समाज में जो गलत संदेश फैलाना चाहिए, उसमें संघ परिवार के लोग यशस्वी हो जाते है. आज भी कई सारे लोगों को आरक्षण का नाम सुनते ही गुस्सा आ जाता है. ‘बाबासाहब ने ही केवल दस साल के लिए आरक्षण दिया था’ ऐसा तर्क दिया जाता है.


अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का फायदा लेने वाले लोग भी ऐसी अफवाओं के शिकार हो जाते है. एससी, एसटी और ओबीसी इन सभी पिछड़ों को समाज की तुलना में प्रगति करने के लिए संविधान के आर्टिकल 15 और 16 के अनुसार शिक्षा और नौकरी में आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जो की मौलिक अधिकारों में निहित है, जिसे किसी भी परिस्थिति में समाप्त नहीं किया जा सकता है. 

इसलिए इसे हर दस साल बाद बढ़ाने का कोई सवाल ही नहीं है. जब तक भारत में संविधान लागू है उसे कोई बदल नहीं सकता. जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हर वर्ग के लोगों का संख्या के अनुपात में प्रतिनिधीत्व होना चाहिए, उन्हें समान संधी उपलब्ध होनी चाहिए, इसलिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है. यह व्यवस्था में चेक और बैलेन्स करने के लिए एक कारगर हथियार भी है. इसके उलट आर्टिकल 334 के अनुसार, लोकसभा और विधानसभा का आरक्षण केवल दस साल के लिए दिया गया था. राजनितिक आरक्षण की तरह शिक्षा और नौकरी के आरक्षण कि कोई समय सीमा नहीं है.


आरक्षण के विरोधियों की तरफ से एक तर्क यह भी दिया जाता है कि आरक्षण की वजह से जातिवाद फैल रहा है. लेकीन, जब देश में आरक्षण नहीं था तब भी इस देश में हजारों सालों तक जातिय विषमता कायम थी, वो कैसे? इस सावल पर उनके पास कोई जवाब नहीं है. दूसरी बात, जिस शिक्षा और नौकरी में आरक्षण की वजह से जातिय विषमता बढ़ रही है, ऐसा जो कहा जाता है, वह भी अभी निजीकरण की वजह से समाप्त हो चुका है. 


लेकिन, जातिय विषमता समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है. बल्कि, और भी ज्यादा उग्र रुप से सामने आ रही है. हमारा दूसरा मुद्दा ये है कि इस राजनीतिक आरक्षण का जन्म कैसे हुआ? 1931 के दूसरे राउंडटेबल कांफ्रेन्स में बाबासाहब डा.अम्बेडकर ने चार मांगों को अंग्रेजों के सामने रखा था. जिसमें पहली मांग ये थी कि अछूतों को स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र, दूसरी लोकसंख्या के अनुपात में पर्याप्त प्रतिनिधित्व, तिसरी प्रौढ़ मताधिकार और चौथी दो बार वोट करने का अधिकार.


अंग्रेजों ने 17 अगस्त, 1932 को कम्यूनल अवार्ड घोषित कर बाबासाहब डा.अम्बेडकर के सभी मांगों को स्वीकार कर लिया. लेकिन, गांधी जी जिनके बारे में कहा जाता है कि वे सभी लोगों के आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे थे, वे इससे नाराज हो गए. केवल नाराज ही नहीं हुए, बल्कि उन्होंने इसका कड़ा विरोध करना शुरु कर दिया और वह विरोध कोई साधारण विरोध नहीं था. बल्कि, गांधी जी ने अछूतों को मिले हुए अधिकार का अपनी जान की बाजी लगाकर विरोध किया. 


यहां तक कि वे आमरण अनशन पर बैठ गए. इससे बाबासाहब पर काँग्रेसियों का दबाव बढ़ने लगा. लेकिन, बाबासाहब उस दबाव में नहीं आये और अंग्रेजों से लड़-झगड़कर हासिल किए हुए अधिकार किसी भी किमत पर छोड़ने के लिए राजी नहीं हुए. यह देख काँग्रेस के लोगों ने उत्तर प्रदेश और बिहार में बेसहारा अछूतों की बस्तियों को आग लगाना शुरु कर दिया. 


तब बाबासाहब डा.अम्बेड़कर ने भी सोचा कि जिन लोगों के लिए मैने ये अधिकार हासिल किए हैं, वहीं लोग अगर नहीं रहे तो मं इन अधिकारों का क्या करुंगा? इसलिए बाबासाहब ने 24 सितंबर, 1932 को गांधी जी के साथ एक पैक्ट किया जो आज पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है. इस पूना पैक्ट ने ही राजनितिक आरक्षण को जन्म दिया.


हमारा तिसरा मुद्दा ये है कि क्या बाबासाहब ने भी पूना पैक्ट का विरोध किया था? पूना पैक्ट की वजह से अछूतों का क्या नुकसान हुआ? इसका सारा विश्लेषण बाबासाहब ने  ‘‘ॉवाट गांधी एंड कांग्रेस हैव टू द अनटचेबल’’ इस किताब में किया है. 24 दिसम्बर, 1945 में बाबासाहब ने मद्रास में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के माध्यम से ‘चुनाव और अछूतों की जिम्मेदारी’ इस विषय पर भाषण दिया था. 


बाबासाहब का स्वागत करने के लिए हजारों की संख्या में उनके अनुयायी मद्रास स्टेशन के बाहर उपस्थित थे और बाबासाहब के सामने ही उन्होंने ‘पूना करार का धिक्कार हो, पूना करार का धिक्कार हो’ ऐसे नारे भी लगाये थे. इसकी खबर 29 दिसम्बर, 1945 को बाबासाहब के ‘जनता’ में प्रकाशित भी हुई थी.


1945 को ही बाबासाहब के कहने पर आर.आर.भोले नाम के बाबासाहब के एक सहकारी ने पूना पैक्ट के विरोध में जेल भरो आंदेलन किया था, जिसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं ने हिस्सा लिया था. एक महिला तो अपने छह महीने का बच्चा लेकर ही जेल में गई थी. ऐसे कई सारे उदाहरण सबूत के तौर पर दिए जा सकते हैं कि पूना पैक्ट बाबासाहब की मर्जी के बगैर हुआ था. 


क्योंकि, उससे अछूतों के अधिकार छिने जा चुके थे. संविधान लागू होने के दस साल बाद जब पहली बार राजनितिक आरक्षण कि काल मर्यादा समाप्त हो गई, तब बाबासाहब के बाद उनके पुत्र यंशवंतराव अम्बेडकर ने आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र की काल मर्यादा ना बढ़ाई जाये, इसके लिए आंदोलन शुरु करने की बातें कही. इसके अलावा तत्कालीन रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के लोगों ने संसद के सामने विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा कर दी. इस संबंध की खबरें 28 नवंबर, 1959 के प्रबुध्द भारत में छपकर आयी.


हमारा चौथा और आखिरी मुद्दा ये है कि राजनीतिक आरक्षण क्यों नहीं चाहिए? डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने उस वक्त के अछूत यानी आज के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए स्वतंत्र निर्वाचन क्षेत्र की मांग की थी. लेकिन, पूना पैक्ट की वजह से उन्हें संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र मिला और दो बार वोट करने का अधिकार भी छिन लिया गया. जो संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र 1950 से पहले केवल अनुसूचित जाति के लिए लागू थी, वही काँग्रेस ने आदिवासी यानी अनु.जनजाति के लिए भी लागू कर दिया. 


इस प्रकार से अनु.जाति तथा जनजाति के आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से खड़े किए हुए उम्मीदवार उस वर्ग के लिए काम नहीं करते. बल्कि, जिस पार्टी के टिकट पर वे चुनाव लड़ते हैं, उसी पार्टी के अजेंड़े को आगे बढ़ाने का काम करते है. यह पीछले 70 सालों में राजनितिक आरक्षण का इतिहास रहा है. लोकसभा की 543 सीटों में से अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचति जनजाति के लिए 47 सीटें आरक्षित रखी गई है. इस तरह से कुल मिलाकर यह आंकड़ा होता है 131! देशभर के सभी विधानसभाओं में अनु.जाति की 614 और अनु.जनजाति कि 554 सीटें आरक्षित रखी गई है. यह आंकड़ा 1168 विधायकों का होता है.


आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार का चुनाव करते वक्त राजनितिक पार्टीयाँ ये नहीं देखती कि इससे समाज को कितना फायदा होगा. वह तो केवल यही देखती है कि उनकी पार्टी को कितना फायदा होगा और जो उम्मीददवार पार्टी को ज्यादा फायदा पहुँचा सकता है उसी को टिकट मिलता है. समाज के लिए लड़ाई लड़ने वाले लोगों को राजनितिक पार्टीयाँ टिकट नहीं देती हैं. इसका परिणाम ये होता है कि इन वर्गों के प्रतिनिधी संसद के अंदर रहते हुए भी उन्हें न्याय नहीं मिलता. 


बल्कि, उनके विरोध के सारे कानून उनकी आँखों के सामने ही पारित हो जाते हैं और वे कुछ भी नहीं करते और ना ही कुछ कर सकते हैं. ऐसे सांसद और विधायक खस्सी किए हुए लोग हैं, ऐसी समाज की धारणा बन गई है. कल तक काँग्रेस इस राजनीतिक आरक्षण को बढ़ाती थी, अब भाजपा ने कैबिनेट की मीटिंग में इसे पारित कर दिया और साथ में ही संसद के दोनों सदनों में भी इसे पारित करवा दिया. 


इससे यह भी सामने आता है इस राजनितिक आरक्षण का लाभ जैसे काँग्रेस को मिल रहा था, वैसे आज भाजपा को भी मिला है. इस मुद्दे पर भी काँग्रेस-भाजपा का अजेंड़ा एक ही है. और यही कारण है कि राजनीतिक आरक्षण बढ़ाने के लिए समाज में कहीं कोई मांग नहीं उठ रही है, कहीं कोई आंदोलन नहीं हो रहा है, इसके बावजूद भी इसे हर दस साल बाद उस समाज के सहमती के बगैर ही बढ़ाया जा रहा है.

संकेत विद्रोही
महाराष्ट्र
मो.9004248821


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