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सिख विरोधी दंगों के दोषियों को सज़ा दिलाने में पुलिस-प्रशासन की दिलचस्पी नहीं थी जस्टिस ढ़िगरा का तत्कालिन कांग्रेस सरकार पर गंभीर आरोप

Published On :    17 Jan 2020   By : MN Staff
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1984 के दंगों संबंधी मामलों की जांच के लिए बनाए गए विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि तत्कालीन केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने दंगों के दौरान दंगाइयों पर हत्या, आगजनी और हिंसा के मामले दर्ज करने की कोशिश नहीं की.



नई दिल्ली : 1984 में हुए सिख विरोधी दंगे को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है. यह खुलासा सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी ने अपनी जांच रिपोट में किया है. रिपोट में कहा गया की तत्कालीन केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान दंगाइयों पर हत्या, आगजनी और हिंसा के मामले दर्ज करने की कोशिश नहीं की.साथ ही आपराधिक मामलों को छिपाने का प्रयास भी किया गया.


जस्टिस ढींगरा की अध्यक्षता वाले इस विशेष जांच दल में सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी राजदीप सिंह और वर्तमान आईपीएस अधिकारी अभिषेक दुलार भी शामिल थे. शीर्ष अदालत ने 11 जनवरी, 2018 को इस जांच दल का गठन किया था, जिसे उन 186 मामलों में आगे जांच करनी थी जिन्हें पहले बंद कर दिया गया था.  


एसआईटी रिपोर्ट में जस्टिस एसएन ढींगरा ने राजीव गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर गंभीर आरोप लगते हुए कहा, ‘दंगों के फौरन बाद और इसके कई सालों बाद भी बड़ी संख्या में पीड़ितों के द्वारा जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग समेत विभिन्न एजेंसियों से संपर्क करने के बावजूद अब भी हत्या, दंगे, आगजनी के ढेरों मामले ऐसे हैं जिनके बारे में पता नहीं है और जिनको सजा नहीं दी गई है. 


इन अपराधों की सजा न मिलने और दोषियों के खुले घूमने की मूल वजह कानून के अनुरूप अपराधियों को सजा दिलाने में पुलिस और प्रशासन की दिलचस्पी की कमी है.’ सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसएन ढींगरा की अध्यक्षता वाले इस आयोग की रिपोर्ट में इन सिख विरोधी दंगों के बारे में पीड़ितों द्वारा हजारों की संख्या में हत्या, दंगे, हिंसा और आगजनी का आरोप लगाने वाले हलफनामों पर जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग द्वारा की गई कार्रवाई को लेकर भी टिप्पणी की गई है.


यह बताते हुए कि 1985 में मिश्रा आयोग हलफनामों के आधार पर 1991-92 में एफआईआर दर्ज हुईं, रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यह बात इस तथ्य से स्पष्ट है कि रंगनाथ मिश्रा आयोग को हत्याओं, आगजनी और दंगाइयों द्वारा की गई लूट से संबंधी सैंकड़ों हलफनामे मिले थे, जिनमें आरोपी के नाम थे. इनके आधार पर संबंधित पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश देने के बजाय कमेटी के बाद कमेटी बनती रहीं और इससे यह मामले सालों तक दर्ज नहीं हुए.’



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इसके बाद जिस तरीके से ट्रायल कोर्ट द्वारा देरी का हवाला देते हुए आरोपियों को बरी किया गया, उसके बारे में ढींगरा आयोग ने शीर्ष अदालत को बताया, ‘बावजूद इसके औसतन सभी मामलों में ट्रायल कोर्ट के जजों, जिन्हें जांच के बाद यह मुकदमे भेजे गए थे, ने गवाहों के बयानों को एफआईआर दर्ज होने में हुई देरी, गवाह द्वारा बयान दर्ज करवाने में हुई देर या ऐसे ही किसी आधार पर ख़ारिज कर दिया. ’इसके अलावा आयोग ने आरोपियों को बरी किए जाने के छह फैसलों के खिलाफ अपील दायर करने की सिफारिश की है.


आयोग ने पाया कि कल्याणपुरी थाने के एसएचओ सुरवीर सिंह त्यागी दंगाइयों के साथ साजिश में शामिल थे.‘त्यागी ने जानबूझकर स्थानीय सिखों से उनके लाइसेंसी हथियार ले लिए, जिससे कि दंगाई उन्हें निशाना बनाकर जान-माल का नुकसान पहुंचा सकें. उन्हें निलंबित किया गया था लेकिन उन्हें प्रमोट करते हुए एसीपी बना दिया गया.


रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि सिख यात्रियों को दिल्ली में रेलवे स्टेशनों पर ट्रेनों से बाहर निकालकर मारा गया लेकिन पुलिस ने किसी को भी मौके से यह कहते हुए नहीं बचाया कि उनकी संख्या बेहद कम थी. रिपोर्ट में कहा गया कि ट्रेन में सफर कर रहे सिख यात्रियों की ट्रेन और रेलवे स्टेशनों पर हमला करने वाले लोगों द्वारा हत्या किये जाने के पांच मामले थे. यह घटनाएं एक और दो नवंबर 1984 को दिल्ली के पांच रेलवे स्टेशनों- नांगलोई, किशनगंज, दया बस्ती, शाहदरा और तुगलकाबाद में हुई.


रिपोर्ट में कहा गया, ‘इन सभी पांच मामलों में पुलिस को दंगाइयों द्वारा ट्रेन को रोके जाने तथा सिख यात्रियों को निशाना बनाए जाने के बारे में सूचना दी गई. सिख यात्रियों को ट्रेन से बाहर निकालकर जला दिया गया. शव प्लेटफॉर्म और रेलवे लाइन पर बिखरे पड़े थे. पुलिस ने किसी भी दंगाई को मौके से गिरफ्तार नहीं किया. किसी को गिरफ्तार नहीं करने के पीछे जो कारण दर्शाया गया वह यह था कि पुलिसकर्मियों की संख्या बेहद कम थी.’


बता दें कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर, १९८४ को उनके दो सुरक्षाकर्मियों द्वारा गोली मार कर हत्या किये जाने के बाद दिल्ली सहित देश के अनेक हिस्सों में बड़े पैमाने पर सिख विरोधी दंगे हुए थे. इन दंगों में अकेले दिल्ली में 2,733 सीखों की हत्या कर दी गई थी.

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