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कश्मीर, एनआरसी, सीएए, राम मंदिर पर लिए गलत स्टेप

Published On :    13 Feb 2020   By : MN Staff
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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर पूर्व चीफ जस्टिस ने उठाए सवाल



नई दिल्ली : दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और लॉ कमीशन के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस एपी शाह ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए हालिया फैसलों पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट बहुसंख्यक जनमानस के आवेगों को कम कर सरकार की विचारधारा से असंतोष जताने में नाकाम रही है. उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, राम मंदिर, एनआरसी समेत कई मुद्दों की चर्चा करते हुए कहा कि कानून की सर्वोच्च संस्था ने इन मामलों में न्यायोचित कदम नहीं उठाए हैं.


स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति में आयोजित एक व्याख्यानमाला में जस्टिस शाह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की सुनवाई की प्राथमिकता तय करने में भी गड़बड़ियां की हैं. उन्होंने कहा कि कई मौकों पर दिखा कि कोर्ट के पास जनहित, सिविल राइट से जुड़े मुकदमों की सुनवाई के लिए समय नहीं है, उस पर देरी की गई. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद की स्थितियों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करने में देरी करने पर भी सवाल उठाए.


जस्टिस शाह ने कहा कि इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक लगाने की बजाय कोर्ट ने उस पर सीलबंद लिफाफे में डिटेल रिपोर्ट मंगाने को प्राथमिकता दी. उन्होंने कहा कि कई चुनाव हो गए पर इस मामले में केस वहीं का वहीं पड़ा है. जस्टिस शाह ने देश के मुख्य न्यायाधीश की उस बात पर भी आश्चर्य जताया जिसमें सीजेआई ने सीएए केस की सुनवाई के दौरान कहा था कि पहले हिंसा रोकिए, तभी केस की सुनवाई करेंगे. 


एनआरसी पर सुप्रीम कोर्ट के रूख पर जस्टिस शाह ने असंतोष जताते हुए कहा कि कोर्ट ने उन्हीं लोगों को नागरिकता साबित करने को कह दिया जो एनआरसी से प्रभावित थे और पीड़ित होकर याचिकाकर्ता बने थे. बतौर जस्टिस शाह, ऐसा कर कोर्ट ने एक तरह से सरकार की उस दलील को ही साबित करने की कोशिश की कि जिनके पास कागजात नहीं हैं, वो विदेशी हैं.


अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण का आदेश देने के फैसले पर जस्टिस शाह ने कहा, इस फैसले में इक्विटी एक प्रमुख मुद्दा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले (जिसने मंदिर निर्माण की अनुमति दी) के परिणामस्वरूप पूरा जजमेंट ही संदिग्ध है. क्योंकि, यह अभी भी ऐसा लगता है जैसे हिंदुओं द्वारा की गई अवैधता (पहली बार 1949 में मस्जिद में राम लला की मूर्तियों को रखना और दूसरा 1992 में बाबरी विध्वंस) को स्वीकार करने के बावजूद कोर्ट ने अपने फैसले से गलत करने वाले को पुरस्कृत किया है.



यह भी पढ़े : नागरिकता क़ानूनः यूपी में नागरिक सत्याग्रह निकाल रहे छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता गिरफ़्तार

बता दें कि जस्टिस शाह ने कुछ दिनों पहले भी एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखकर सीएए पर चल रहे विरोध-प्रदर्शन के मद्देनजर न्यायपालिका पर निशाना साधा था. जस्टिस शाह ने तब लिखा था कि नागरिकता कानून के खिलाफ देश भर में हो रहे प्रदर्शनों में कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है. प्रदर्शनकारियों के साथ सरकारी मशीनरी के सलूक को उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था. इसके अलावा उन्होंने लिखा था कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे न्यायपालिका की आवाज लगभग ‘गायब’ महसूस नजर आती है, या फिर मजबूत सरकार में न्यायपालिका की आवाज ‘दब’ सी गई है.

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