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लॉकडाउन की आड़ में बीजेपी लागू कर रही अपना एजेंडा

Published On :    29 Mar 2020   By : MN Staff
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लॉकडाउन के बीच बैंको का विलय, 1 अप्रैल से घट जायेगी सरकारी बैंकों की संख्या



नई दिल्ली : भले ही लॉकडाउन को कोरोना वायरस का चक्र तोड़ने के लिए बताया जा रहा है, लेकिन सच यही है कि इस लॉकडाउन में बीजेपी सरकार के अनर्गल काम करने का चक्र नहीं टूट रहा है. वह लगातार जनहित विरोधी काम करते आ रही है और अपने ऐजेंडे को धीरे-धीरे लागू कर रही है. संकट के समय में भी संघी सरकार को राम मंदिर, विवादित प्रोजेक्ट और बैंकों के विलय की चिंता है. जबकि, पूरी दुनिया इस महामारी को काबू करने में लगी है. यही कारण है कि भारत में वायरस दूसरे स्टेज से तीसरे स्टेज में जा रहा है और सरकार इसे रोकने के बजाए अपने एजेंडों को लागू कर रही है.


गौरतलब है कि खतरनाक कोरोना वायरस के चलते 14 अप्रैल तक देशव्यापी लॉकडाउन लागू है. पूरा देश अपने घरों में कैद है. लेकिन, इसी लॉकडाउन के बीच केन्द्र की संघी सरकार देश के 10 बड़े बैंकों का विलय करने जा रह. है. एक अप्रैल से इन बैंकों के नाम भी बदल जायेंगे. सरकार बहुत अच्छी तरह से जानती है कि लॉकडाउन के दौरान बैंकों के विलय के बाद बनी इकाई में कामकाज सरकार के लिए बड़ा चैलेंज होगा. लेकिन, सरकार को इस बात का कोई भी फर्क नहीं पड़ता है. क्योंकि, सरकार को जब इस महामारी में जनता की चिंता नहीं है तो सरकार को कामकाज में आ रही दिक्कतों की क्या चिंता होगी.



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सूत्रों के मुताबिक, कैनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक मिलकर एक हो जाएंगे, इसके अलावा इलाहाबाद बैंक का विलय इंडियन बैंक में हो रहा है. पीएनबी में ओबीसी और यूबीआई के विलय से बनने वाला बैंक एसबीआई के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा बैंक होगा. वहीं यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में आंध्रा बैंक और कॉर्पोरेशन बैंक का विलय होना है. 


बताया जा रहा है कि विलय से जुड़ी जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है. बैंकों के विलय से ग्राहकों पर भी असर पड़ेगा. यही नहीं कुछ बैंकों की ब्रांच बंद हो सकती है, वहीं ग्राहकों की कस्टमर आईडी अगर विलय में शामिल दो बैंकों में एक साथ है तो एक आईडी बंद हो सकती है. ग्राहकों को नए चेकबुक के लिए तैयार रहना चाहिए इसके साथ ही ग्राहकों को अन्य कामों के लिए थोड़ा पेपरवर्क भी करना पड़ सकता है.


बता दें कि इस विलय के बाद तीन साल में सरकारी बैंक 27 से 12 हो जाएंगे. विलय को लेकर सरकार ने वजह बताई है कि इससे बैंकों के रिस्क लेने की क्षमता में इजाफा होगा. इसके साथ ही एनपीए कंट्रोल करने में भी मदद मिलेगी. मालूम हो कि बैंकों का बढ़ता एनपीए केंद्र सरकार के लिए चिंता का विषय है. एनपीए को कम करने के लिए केंद्र लगातार प्रयास कर रही है. 



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असल में यह बातें केवल जनता को गुमराह करने के लिए बताई जा रही है कि एनपीए को कम करने के लिए सरकार बैंकों का विलय कर रही है. जबकि, सरकार बैंकों को लूटने के लिए ऐसा कर रही है. क्योंकि, अक्सर यही होते आया है कि मर्ज के बाद बैंकों का एनपीए कम होने के बजाए और ज्यादा बढ़ गया है. अंत में उस बैंक को घाटे का सौदा बताकर निजी हाथों में बेंच दिया गया है. अगर, सरकार बचे इन बैंका विलय कर रही है सवधान रहने की जरूरत है कि आने वाले समय में इन बैंकों का भी वहीं हस्र होने वाला है जो पीएनबी और यस बैंक का हुआ है. क्योंकि, जो सरकार कहती वह नहीं होता है, ठीक उसके विपरित होता है.


सूत्रों ने बताया बैंकों के विलय से बैंककर्मी नाखुश हैं. बैंककर्मियों का मानना है कि यह विलय नहीं किया जाना चाहिए. ऑल इंडिया बैंक एंप्लाइज एसोसिएशन और ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने 27 मार्च से हड़ताल का आह्वान किया था, लेकिन लॉकडाउन के चलते ऐसा नहीं हो सका. असल में सरकार ने यह फैसला इसीलिए इस समय लिया है ताकि कोई उसका विरोध न कर सके.

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