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बिहार में महामारी को लेकर सरकार नहीं सतर्क

Published On :    29 Mar 2020   By : MN Staff
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कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच नीतीश सरकार की लचर व्यवस्था



पटना : लगता है कि सरकारें इस महामारी को दूसरे स्टेज से तीसरे स्टेज में पहुंचाकर ही मानेगी. क्योंकि, जिस तरह से सरकार काम कर रही है उससे तो यही लगता है कि भारत में यह महामारी बहुत ही जल्द तीसरे स्टेज में पहुंचने वाली है. 


सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, 13 मार्च से 21 मार्च के बीच बिहार में कोरोना वायरस से संक्रमित होने के संदेह में 31 लोगों के सैंपल की जांच की गई थी, तो कोरोना से पीड़ितों की संख्या शून्य थी. वहीं, 22 मार्च से 27 मार्च के बीच 6 दिनों में लगभग 544 सैंपलों की जांच की गई, जिनमें 9 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं. पटना में 4 लोगों में, मुंगेर में 3 और नालंदा व सिवान में 1-1 व्यक्ति कोरोना से संक्रमित मिला है. इनमें कम से कम चार लोग ऐसे हैं, जिनमें संक्रमण एक ही मरीज से फैला है.



स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, 9 में से पांच लोगों में संक्रमण विदेश से आए संक्रमित मरीज से फैला है. इस तरह के संक्रमण को स्थानीय संक्रमण कहा जाता है, जो संक्रमण का दूसरा चरण है. जानकारों का मानना है कि अगर इसे यहीं नहीं रोका गया, तो सामुदायिक स्तर पर फैलने से रोकना नामुमकिन हो जाएगा.


बिहार में दिनोंदिन बढ़ रहे कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले बताते हैं कि यहां हालात संगीन होने वाले हैं, लेकिन बिहार सरकार की तैयारियां नाकाफी नजर आ रही हैं. पर्याप्त आइसोलेशन बेड व सुरक्षा उपाय तो दूर कोरोना वायरस के मरीजों के इलाज में लगे डॉक्टरों का तो कहना है कि उन्हें सबसे बुनियादी चीजें मास्क और सैनिटाइजर तक उपलब्ध नहीं कराया गया है.



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भागलपुर के जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय के इन्टर्न ने कोरोना वायरस के संदिग्ध मरीजों के इलाज के लिए एन-95 मास्क और पर्सनिल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) की मांग की, तो अस्पताल प्रबंधन ने लिखित आदेश जारी कर कहा कि मरीजों के इलाज के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के दिशानिर्देश में एन-95 मास्क और पीपीई की आवश्यकता नहीं है. जवाहर लाल नेहरू चिकित्सा महाविद्यालय के जूनियर डॉक्टर अमित आनंद ने बताते हैं, अस्पताल में लगभग 100 जूनियर डॉक्टर कार्यरत हैं. 


हमलोगों की ड्यूटी आइसोलेशन वार्ड में नहीं है, लेकिन इमरजेंसी व अन्य विभागों में जो मरीज आते हैं, उनमें कोरोना वायरस का संक्रमण है या नहीं, हम नहीं जानते हैं इसलिए संक्रमण का खतरा रहता है. उन्होंने आगे कहा, हम लोगों ने तीन दिन पहले ही प्रबंधन से मास्क और किट देने की मांग की थी. यही नहीं बिहार सरकार की तरफ से कोरोना अस्पताल घोषित किए नालंदा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल (एनएमसीएच) के 83 जूनियर डॉक्टरों ने 23 मार्च को अस्पताल प्रबंधन को पत्र लिख कर दो हफ्ते के होम क्वारंटाइन (घर पर अलग रहने) की अपील की है.



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डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें अस्पताल प्रबंधन की तरफ से मास्क, सैनिटाइजर और पीपीई नहीं दिया गया, जिस कारण कोरोना वायरस से ग्रस्त मरीजों का इलाज करने से उनमें भी संक्रमण के लक्षण नजर आने लगे हैं. 23 मार्च के पत्र का कोई जवाब नहीं मिलने के बाद 25 तारीख को जूनियर डॉक्टरों ने स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को दोबारा पत्र लिखा. 


पत्र में डॉक्टरों ने लिखा है, पीपीई किट, एन-95 मास्क और हैंड सैनिटाइजर नहीं होने के कारण कोरोना अस्पताल में कार्यरत सभी चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मी और सुरक्षा कर्मियों में डर का माहौल है. एनएमसीएच कोरोना अस्पताल है, लेकिन इसका आइसोलेशन वार्ड खुद सुरक्षित नहीं है. कोरोना वायरस से ग्रस्त मरीज और उसके परिजन खुलेआम वार्ड में घूम रहे हैं, जिससे संक्रमण बढ़ने का खतरा है.
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