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नई शिक्षा नीति के तहत लड़कियों की स्कूल वापसी करा पाना मुश्किल काम

Published On :    2 Aug 2020   By : MN Staff
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सरकार के सामने कई चुनौतियाँ



नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति-2020 को मंज़ूरी दे दी है. जिसमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में कई बदलाव किए गए हैं. इसमें शिक्षा पर सरकारी ख़र्च को 4.43 फीसदी से बढ़ाकर जीडीपी का छह फ़ीसदी तक करने का लक्ष्य है. लेकिन सवाल यह हैं की क्या इसमें उन लड़कियों की बात है जो 14 साल की उम्र तक आते-आते स्कूल छोड़ देती हैं. क्या सरकार उन लड़कियों की स्कूल में वापसी करा पाएगी जो लड़कियाँ  कक्षा सातवी आठवी या 14 वर्ष की उम्र के स्कूल छोड़ देती है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसे जनता द्वारा आरएसएस का एजेंडा करार दिया जाएगा. जिसकी चर्चा अभी हो रही है.


बता दें की सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, हर साल 16.88 फीसदी लड़कियाँ आठवीं के बाद स्कूल छोड़ देती हैं. इनमें से कई लड़कियों की कम उम्र में शादी करने पर माँ बनने की वजह से असमय मौत हो जाती हैं. सरकार बीते कई दशकों से इस समस्या से निपटने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है. ऐसे समय में केंद्र सरकार की ओर से लाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति एक ताज़ा हवा के झोंके जैसी नजर आ रही हैं.


दरअसल नई शिक्षा नीति का उद्देश्य प्राथमिक विद्यालय से लेकर माध्यमिक स्तर तक सभी बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना है. सरकार इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है लेकिन शिक्षा क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस नीति में तय किये लक्ष्यों की प्राप्ति को लेकर आश्वस्त नज़र नहीं आते. वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, लड़कियों के स्कूल छोड़ने के पीछे सरकारी स्कूलों की ख़राब हालत और भारी फीस बड़ी वजह समझी जाती है.


साल 2018 में तत्कालीन एचआरडी राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने राज्य सभा में बताया था कि हर वर्ष 16.88 फीसदी लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं. एनएसएसओ के सर्वे में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की वजहों की पड़ताल की गई है जिसके मुताबिक़ कम उम्र में शादी, स्कूल दूर होना और घर के कामकाज में लगना स्कूल छोड़ने की बड़ी वजहें हैं. ऐसे में सरकार को उन समस्याओं को हल करना होगा जो कि लड़कियों को स्कूल छोड़ने पर मजबूर करती हैं. इसके साथ ही एक बड़ी वजह कहीं-कहीं स्कूल 20 किलोमीटर से ज़्यादा दूर होना हैं. ज्यादातर माता-पिता अपनी बच्चियों को बहुत दूर पढ़ने के लिए नहीं भेजना चाहते और स्कूल आने-जाने में होने वाला ख़र्च वहन नहीं कर सकते. इसलिए वे बच्चियों को स्कूल नहीं भेज पाते.


ड्रॉप-आउट रेट लगभग 40 फीसदी है जिनमें से ज़्यादातर लड़कियाँ हैं. अब सवाल यह हैं की सरकार इस चुनौती को पूरा कैसे करेगी?


नई शिक्षा नीति में कुल जीडीपी का 6 फीसदी खर्च करने का लक्ष रखा गया है. हालांकि भारत सरकार साल दर साल अपने शिक्षा बजट को घटाती जा रही है. अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2014-15 में सरकार ने 38,607 करोड़ रुपये खर्च किए थे, तो साल 2019 तक आते-आते ये बजट 37 हज़ार करोड़ रुपये हो गया. बीच के दो सालों में सरकार ने स्कूली शिक्षा पर सिर्फ़ 34 हज़ार करोड़ रुपये खर्च किया.


सरकार ने साल 2030 तक दो करोड़ बच्चों को स्कूल वापस लाने का लक्ष रखा हैं. लेकिन इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को स्कूल लाने के लिए आपको स्कूल और अध्यापक चाहिए. अध्यापकों की बात करें तो प्राथमिक स्तर पर ही 9 लाख पद खाली पड़े हैं. यूडीआईएसई की रिपोर्ट के मुताबिक़ देश के सिर्फ़ 52 फीसदी स्कूलों में हाथ धोने, पीने का पानी और लायक टॉयलेट की व्यवस्था है.


लड़कियों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्हें वे अधिकार देने होंगे जिनके दम पर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें और अधिकारों का उल्लंघन होने पर कोर्ट जा सकें. यह शिक्षा के अधिकार क़ानून में संशोधन होने से ये संभव हो सकता है. लेकिन नई नीति में शिक्षा के अधिकार क़ानून का ज़िक्र नहीं है. कस्तूरी रंगन समिति ने अपने ड्राफ़्ट में कहा था कि तीन से 18 साल तक की उम्र के बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए शिक्षा के अधिकार क़ानून को एक वाहक के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा. इसके तहत इस क़ानून में संशोधन करके तीन वर्ष से 18 वर्ष के बच्चों को इस क़ानून के अंतर्गत लाया जाएगा. लेकिन इस नीति में से ये बात ग़ायब है.


अगर इस नीति में आरटीई क़ानून को संशोधित करने की बात की गई होती तो बेहतर होता. जब तक 18 साल की उम्र तक शिक्षा पाना बच्चों का अधिकार नहीं बन जाता तब तक शहर हो या गाँव स्थिति वही रहेगी जो कि इस समय है. सरकार इस नीति में बच्चियों को शिक्षा देने की बात करती दिख रही है, लेकिन अधिकार देने से बचती नज़र आ रही है.

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