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सरकारी कर्मचारियों को बेरोजगार बनाने का सरकारी अभियान

Published On :    7 Aug 2020   By : MN Staff
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भ्रष्ट और संतोष जनक काम न करने के नाम पर अफसरों को जबरन रिटायर करेगी केंद्र सरकार, तैयार हो रही लंबी सूची



नई दिल्ली : भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सरकार लाख कोशिश कर ले, लेकिन इस देश से भ्रष्टाचार कभी भी खत्म नहीं हो सकता है. क्योंकि, खुद सरकार ही भ्रष्ट है. इसलिए भ्रष्टाचार खत्म करने के नाम पर सरकारी नौकरियों को ही खत्म करने का काम कर रही है. जैसे सरकारें गरीबी खत्म करने के नाम पर गरीबों को ही खत्म कर रही है. यह एक तरह से सरकार का सरकारी अभियान है. 


केन्द्र की सत्ता अपने हाथों में लेने के बाद से ही बीजेपी की मोदी सरकार, सरकारी नौकरियों को खत्म करने और सरकारी कर्मचारियों को बेरोजगार बनाने का अभियान चला रही है. कभी 50 से ज्यादा उम्र का हवाला देकर तो कभी संतोषजनक काम न करने का हवाला देकर सरकारी कर्मचारियों को जबरन रिटायर करते आ रही है.


यह अभियान न केवल केन्द्र सरकर चला रही है, बल्कि उत्तर प्रदेश सहित बीजेपी शासित राज्य की सरकारें भी इस अभियान को बड़े पैमाने पर चला रहीं हैं. यह अभियान एक बार फिर से उस वक्त जोर पकड़ रही है जब लॉकडान के चलते सब काम धंधा पूरी तरह से ठप है. गरीबों से लेकर आम जनता और सरकारी कर्मचारियों से लेकर व्यापारियों तक के सामने बेरोजगारी और भुखमरी का संकट खड़ा हो गया है. ऐसे समय में सरकार उनकी मदद करने के बजाए उनको बेरोजगार बनाने का  कर रही है.


खबर के अनुसार, केंद्र सरकार अपने मंत्रालयों और विभागों में लंबे समय से बैठे भ्रष्ट और सुस्त अफसरों की सेवा पर कैंची चलाने के लिए लंबी सूची तैयार कर रही है. पचास साल की आयु का पड़ाव पार कर चुके इन अफसरों को एफआर 56 (जे)/रूल्स-48 ऑफ सीसीएस (पेंशन) रूल्स-1972 नियम के तहत जबरन रिटायरमेंट दी जाएगी. इनमें ए, बी और सी श्रेणी के अधिकारी शामिल हैं. सभी केंद्रीय संस्थानों से इन अधिकारियों की रिपोर्ट मांगी गई थी. 



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कोरोना संक्रमण के दौरान इन अधिकारियों की फाइलें आगे नहीं बढ़ सकीं. वजह उस समय इन मामलों के लिए रिप्रेजेंटेशन कमेटी गठित नहीं हो पाई थी. अब केंद्र सरकार ने कमेटी का नए सिरे से गठन कर दिया है. इसमें दो आईएएस अधिकारी और एक कैडर कंट्रोलिंग अथॉरिटी का सदस्य शामिल हैं.


बता दें कि सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) 1972 के नियम 56(जे) के अंतर्गत 30 साल तक सेवा पूरी कर चुके या 50 साल की उम्र पर पहुंचे अफसरों की सेवा समाप्त की जा सकती है. ऐसे अफसरों को जबरन रिटायरमेंट दे दी जाती है. संबंधित विभाग से इन अफसरों की जो रिपोर्ट तलब की जाती है, उसमें भ्रष्टाचार, अक्षमता व अनियमितता के आरोप देखे जाते हैं. यदि आरोप सही साबित होते हैं तो अफसरों को जबरन रिटायरमेंट दे दी जाती है. ऐसे अधिकारियों को नोटिस एवं तीन महीने के वेतन-भत्ते देकर घर भेजा जा सकता है. 



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इसके साथ ही केंद्र सरकार के अलावा कई राज्य सरकारें भी अपने अधिकार क्षेत्र वाले भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई कर रही हैं. पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार ने करीब छह सौ अफसरों को जबरन रिटायरमेंट देने का फैसला किया था. जबकि, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने अपने 27 सीनियर अधिकारियों को जबरन रिटायरमेंट पर भेज दिया था.


दिल्ली, हरियाणा, यूपी, महाराष्ट्र, असम और त्रिपुरा के मुख्यमंत्रियों ने भी केंद्र की तर्ज पर अपने प्रदेशों में भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल कसनी शुरू कर दी थी. केंद्र सरकार अपने इस कदम से मौजूदा व्यवस्था में सुधार लाना चाहती है. बहुत सी ऐसी योजनाएं हैं, जो अफसरों की लापरवाही के चलते समय पर पूरी नहीं हो पाती हैं. यही वजह है कि अब केंद्र सरकार सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) 1972 के नियम 56(जे) के तहत अक्षम व भ्रष्ट अधिकारियों को समय से पहले घर भेज रही है. 


विभागों में ऐसे अधिकारियों की संदिग्ध गतिविधियों और कामकाज पर नजर रखने के लिए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एवं अन्य निगरानी समितियों की भरपूर मदद ली जा रही है. केंद्रीय सतर्कता आयोग में ऐसे मामलों के लिए अलग से अधिकारियों की टीम गठित की गई है. दिल्ली में एलजी अनिल बैजल पहले ही भ्रष्ट अफसरों को जबरन रिटायरमेंट देने की कार्रवाई शुरू कर चुके हैं.

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