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यूपी में मुस्लिमों की संख्या कम, एनकाउंटर में मारे गए मुस्लिमों की संख्या ज्यादा

Published On :    13 Aug 2020   By : MN Staff
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तीन साल में यूपी पुलिस ने किए 6,476 एनकाउंटर्स, मरने वालों में 37 फीसदी मुस्लिम



लखनऊ : कई साल पहले इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें खुलासा किया गया था कि जनगणना 2001 के मुताबिक, देश में मुसलमानों की संख्या 13.4 प्रतिशत है, जबकि, दिसंबर, 2011 के एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, जेलों में इनकी संख्या 21 प्रतिशत है. लेकिन इसी बीच यूपी से आई इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट ने चौंका दिया है. इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि जनगणना 2011 के मुताबिक, सूबे में मुसलमानों की संख्या 19 प्रतिशत है, लेकिन पुलिस एनकाउंटर में मरने वाले मुसलमानों की संख्या 37 प्रतिशत है. यानी देश में सबसे ज्यादा मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है और उनको मौत के घाट उतारा जा रहा है.

गौरतलब है कि सूबे में जब से बीजेपी की योगी सरकार बनी है तब से न केवल हत्या, बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, दबंगई, गुंडागर्दी, डकैती आदि की घटनाएं बढ़ी हैं, बल्कि सूबे के मुसलमानों को एनकाउंटर के नाम पर मौत के घाट भी उतारा जा रहा है. आपराधिक घटनाओं के मामलों में यूपी अन्य राज्यों को कोसों दूर छोड़ दिया है. यही नहीं एनकाउंटर के मामलों में भी यूपी की पुलिस सबसे आगे चल रही है. भले ही एनकाउंटर पूरी तरह से फर्जी ही क्यों न हो. इसमें एक और चौंकाने वाली बात है कि इन एनकाउंटर में मरने वाले सबसे ज्यादा मुस्लिम समुदाय के लोग हैं. इससे तो यही लगता है कि सूबे की योगी सरकार एनकाउंटर की आड़ में सूबे के मुसलमानों की हत्या कर रही है.

इकनॉमिक टाइम्स की जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एनकाउंटर में मारे गए लोगों में लगभग 37 प्रतिशत मुस्लिम थे. इकनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने पिछले तीन सालों में 6,476 एनकाउंटर किए हैं, जिनमें मारे गए 37 प्रतिशत लोग मुस्लिम थे. जबकि यूपी में अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी मात्र 19 फीसदी है. 



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रिपोर्ट में दिये गए डेटा के अनुसार, 6,476 से अधिक मुठभेड़ों में मारे गए 125 व्यक्तियों में से लगभग 47 लोग मुस्लिम है. हालांकि, इन एनकाउंटर्स में अब तक 13 पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है और लगभग 941 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं. इनमें से अधिकांश मुठभेड़ पश्चिमी यूपी से जुड़े मामलों में हुई हैं, जिनमें शामली, अलीगढ़, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर शामिल हैं. पुलिस रिकॉर्ड से यह भी पता चला कि इन मुठभेड़ों में 13,837 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिसमें 2,419 आरोपी घायल भी हुए हैं.


रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने अब तक एनकाउंटर में 21 लोगों को मार गिराया है. गैंगस्टर विकास दुबे से जुड़े तीन मामलों के अलावा मरने वाले अन्य आरोपी मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, बहराइच, मेरठ, बरेली, वाराणसी और बस्ती के थे. यहां पर सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि यूपी में आतंकी विकास दुबे का आतंक बहुत पहले से चल रहा था, यह बात सरकार भी जानती थी. उस वक्त उसका एनकाउंटर क्यों नहीं किया गया? क्या इसलिए की वह सरकार की नजरों में अपराधी नहीं, ब्राह्मण था? योगी सरकार की मानसिकता यह दर्शाती है कि अगर आतंकी विकास दुबे 20 पुलिस कर्मियों की हत्या नहीं किया होता तो शायद योगी सरकार उसका एनकाउंटर नहीं करती. असल में जब से सूबे में योगी सरकार बनी है तब से सूबे के मुसलमानों को ज्यादा टारगेट किया जा रहा है. इस बात की गवाही आंकड़े दे रहे हैं.



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अगर इन आंकड़ों पर गौर करें तो योगी सरकार के आने के बाद पहले साल में 45 लोगों को पुलिस एनकाउंटर में मारा गया, जिनमें से 16 मुस्लिम थे. वहीं मार्च 2017 के बाद से, सबसे अधिक जांच जो मुठभेड़ों का कारण बनीं, वे मेरठ, आगरा और बरेली में दर्ज आपराधिक मामलों की हैं, इसके बाद कानपुर, नोएडा, वाराणसी और प्रयागराज शामिल हैं. वहीं अन्य मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक योगी राज में सबसे ज्यादा एनकाउंटर मेरठ और आगरा में हुए हैं. 


मेरठ में कुल 2070 मुठभेड़ों में पुलिस ने 3792 अपराधी गिरफ्तार किए. इनमें से 1159 गोली लगने से घायल हुए, जबकि 59 को पुलिस ने मौके पर ही मार गिराया. इसके बाद आगरा में 1422 एनकाउंटर्स किए गए. इस दौरान 3693 अपराधी गिरफ्तार हुए, जबकि 134 गोली लगने से घायल हुए. पुलिस ने आगरा में 11 अपराधियों को ढेर कर दिया.
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