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विदेशी कर्ज के जंजाल में फँसता भारत, देश पर 101.3 लाख करोड़ का कर्ज

Published On :    21 Sep 2020   By : MN Staff
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वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में खुलासा



नई दिल्ली : देश पर विदेशी कर्ज का भार कम होने का नाम नहीं ले रहा हैं. मोदी सरकार आने के बाद इसमें ओर इज़ाफा हुआ हैं. एक तरफ जँहा कोरोना महामारी के संकट में देश अर्थव्यवस्था चौपट हुई वहीं दूसरी ओर विदेशी कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा हैं. यानी एक तरह देश विदेशी कर्ज के जंजाल में फँसता जा रहा है.


देश पर कुल विदेशी कर्ज मार्च के अंत तक 2.8 प्रतिशत बढ़कर 558.5 अरब डॉलर पर पहुंच गया. मार्च, 2019 के अंत तक कुल बाहरी कर्ज 543 अरब डॉलर था. यह खुलासा वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट से हुआ हैं. कोरोना महामारी की वजह से चालू वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का कर्ज 170 लाख करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंचने का अंदाजा हैं. जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 87.6 फीसदी के बराबर है.


अंग्रेजी अखबार बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी खबर के मुताबिक, वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट में सामने आई है. इस रिपोर्ट के मुताबिक जून 2020 के अंत तक सरकार की देनदारी बढ़कर 101.3 लाख करोड़ जा पहुंची है. मार्च 2020 तक यह कर्ज 94.6 लाख करोड़ रुपए थी. जो कोरोना के बाद से लगातार बढ़ती जा रही है. पिछले साल जून 2019 में यह कर्ज 88.18 लाख करोड़ की थी.


‘भारत का बाहरी कर्ज एक स्थिति रिपोर्टः 2019-20’ में कहा गया कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में बाहरी कर्ज मामूली बढ़कर 20.6 प्रतिशत पर पहुंच गया. एक साल पहले समान अवधि में यह 19.8 प्रतिशत था.


आंकड़ों की बात करें तो सरकार की देनदारी में केवल अप्रैल-जून तिमाही में 7.1 फीसदी का इज़ाफा हुआ है. जो पिछले साल समान अवधि में 0.8 फीसदी थी. साल भर पहले यानी जून 2019 के अंत में सरकार का कुल कर्ज 88.18 लाख करोड़ रुपए था. केवल जून महीने की बात करें तो सरकार ने करीब 3,46,000 करोड़ की डेट सिक्योरिटी जारी है.


जबकि एक साल पहले इसी अवधि में 2,21,000 करोड़ रुपए की प्रतिभूतियां जारी की गई थी. इस अवधि के दौरान वाणिज्यिक बैंकों की हिस्सेदारी 39 प्रतिशत और बीमा कंपनियों की हिस्सेदारी 26.2 प्रतिशत थी. जबकि प्रतिभूतियों की कुल 28.6 फीसदी की हिस्सेदारी रही है.


रिपोर्ट में कहा गया है कि यह कमी मुख्य रूप से सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का निवेश घटने की वजह से है. सरकारी प्रतिभूतियों में एफपीआई का निवेश 23.3 फीसदी घटकर 21.6 अरब डॉलर रह गया, जो एक साल पहले 28.3 अरब डॉलर था.


रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कई वर्षो में देश का ऋण स्तर धीरे-धीरे बढ़ता गया. वित्त वर्ष 2011-12 में ऋण का स्तर 58.8 लाख करोड़ रुपये या जीडीपी के 67.4 फीसदी पर था. पिछले वित्त वर्ष में कर्ज 146.9 लाख करोड़ रुपये था, जो जीडीपी के 72.2 फीसदी के बराबर था. चालू वित्त वर्ष के 170 लाख करोड़ के कर्ज अनुमान में 27 फीसदी कर्ज राज्यों के होंगे. 


कोरोना महामारी से अर्थव्यवस्था को उबारने और लोगों को वित्तीय राहत प्रदान करने के लिए केंद्र और राज्य चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में कुल 21.6 लाख करोड़ रुपये का कर्ज ले चुके हैं. मध्य जुलाई तक केंद्र और राज्यों की बाजार से ली गई उधारी पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 77 फीसदी अधिक है.


रिपोर्ट के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष के दौरान कर्ज काफी अधिक बढ़ जाने से फ़ाइनेंशियल रेस्पांसिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट (थ्त्ठड) लक्ष्य को हासिल करने में दिक्कत आएगी. एफआरबीएम के तहत वित्त वर्ष 2022-23 तक केंद्र और राज्यों के कर्ज को जीडीपी के 60 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा गया है. चालू वित्त वर्ष में कर्ज में भारी बढ़ोतरी से अब इस लक्ष्य को 2030 तक हासिल किया जा सकेगा.

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