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राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति के बिना ही चल रहा भारत

Published On :    21 Sep 2020   By : MN Staff
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देश के बड़े मेडिकल संस्थानों में आत्महत्या से रोकथाम की व्यवस्थाएं नहीं : आरटीआई



नई दिल्ली : साल 2013 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने अपने सदस्य देशों के साथ एक बैठक में मेंटल हेल्थ एक्शन प्लान पर अधिक ध्यान देने की बात की थी. बाद में भारत ने इसे लेकर प्रतिबद्धता जताई और वादा किया कि आत्महत्या और आत्महत्या की कोशिशों को रोकने के लिए इस प्लान को सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लागू किया जाएगा. 


लेकिन दिल्ली स्थित एक डॉक्टर द्वारा केंद्र के तीन प्रमुख स्वास्थ्य संस्थानों में दायर किए गए सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन से पता चलता है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोई उचित कदम नहीं उठाए गए हैं. राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति के बिना ही भारत चल रहा है.

गौरतलब है कि बीते जुलाई में कार्यकर्ता सतेंद्र सिंह ने दिल्ली के एम्स, चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेश एंड रिसर्च और पुदुचेरी के जवाहरलाल इंस्टिट्यूट ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ मेडिकल साइंसेस के अधीन 13 मेडिकल संस्थानों में आरटीआई दायर कर आत्महत्या को रोकने के लिए चलाई जा रही योजनाओं की हकीकत को जानना चाहा. जबकि, लंबे समय से चली आ रही मांग को देखते हुए डब्ल्यूएचओ का यह सुझाव है कि भारत में ‘राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति’ होनी चाहिए. इसी दौरान इस साल मई में भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को डब्ल्यूएचओ के कार्यकारी बोर्ड का अध्यक्ष चुना गया था.

कार्यकर्ता सिंह ने बताया कि हर्षवर्धन दिल्ली एम्स के भी अध्यक्ष थे और इसके बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की गई है, भारत राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथान रणनीति के बिना ही चल रहा है. सिंह ने एम्स, जेआईपीएमईआर, पीजीआईएमईआर और दिल्ली विश्वविद्यालय में जुलाई के बीच में आरटीआई दायर की थी. उनके पहले छह सवाल आत्महत्या से जुड़े हुए थे. 


उन्होंने पूछा कि क्या संस्थान के पास आत्महत्या रोकथाम के लिए कोई समर्पित हेल्पलाइन नंबर हैं, क्या संस्थान उनके परिसर में हो रही आत्महत्याओं और इसकी कोशिशों के आंकड़े इकट्ठा करते हैं? इसके अलावा उन्होंने पिछले दस सालों में आत्महत्याओं के विवरण, इसे रोकने के लिए चलाई जा रही योजनाओं, उनकी प्लानिंग, डिजाइन तथा लागू करने की स्थिति के संबंध में जानकारी मांगी थी.

इसके जवाब में पुदुचेरी के जेआईपीएमईआर ने साल 2010 से 2019 के बीच 10 साल में हुईं आत्महत्याओं का एक चार्ट भेजा. इसमें जेआईपीएमईआर स्टाफ और छात्रों को मिलाकर कुल 90 आत्महत्याओं की जानकारी थी, जिसमें से 27 मामले अकेले साल 2019 के थे. उन्होंने बताया कि इसके अलावा स्टाफ और छात्रों के छह अप्राकृतिक मौत के मामले सामने आएं, जिसमें से तीन मामले फांसी लगाने, एक मेथनोल जहर लेने और दो चूहेमार दवा खाने से जुड़े हुए थे. 


यह पूछे जाने पर कि पिछले पांच वर्षों में जेआईपीएमईआर में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (एमएचसीए), 2017 की धारा 29 (2) के तहत आत्महत्याओं और इसके प्रयास कम करने के लिए किस तरह की योजनाएं और लागू की गईं? संस्थान ने कहा कि 10 सितंबर, 2018 में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर जेआईपीएमईआर में आत्महत्या की रोकथाम से संबंधित एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. वहीं सितंबर 2018 के दूसरे सप्ताह को आत्महत्या रोकथाम सप्ताह के रूप में मनाया गया था.



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सिंह ने बताया कि दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस बारे में कोई जवाब नहीं दिया. वहीं चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर ने आरटीआई आवेदन के जवाब में बताया कि मनोचिकित्सा विभाग के पोस्ट ग्रेजुएट, सीनियर रेजिडेंट, फैकल्टी और नॉन-टीचिंग स्टाफ किसी भी व्यक्ति द्वारा आत्महत्या या इसके प्रयास का मामला सामने नहीं आया है. आत्महत्या को रोकने के लिए चलाई जा रही योजनाओं के संबंध में संस्थान ने कोई जवाब नहीं दिया और कहा, पीजीआईएमईआर के मनोचिकित्सा विभाग में कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.



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वहीं एम्स के एससी/एसटी, ओबीसी/विमेन सेल के केंद्रीय जनसूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने 19 अगस्त को अपना जवाब भेजा और कहा कि मांगी गई जानकारी इस विभाग में उपलब्ध नहीं है. एम्स के कॉलेज ऑफ डेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च ने बताया कि वे अंडरग्रेजुएट, पोस्टग्रेजुएट, सीनियर रेजिडेंट्स, फैकल्टी और नॉन-टीचिंग स्टाफ श्रेणियों में आत्महत्या और इसकी कोशिश के आंकड़े नहीं रखते हैं. संस्थानों द्वारा दिए गए जवाब पर प्रतिक्रिया देते हुए सिंह ने कहा, भारत को तत्काल एक राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति की आवश्यकता है. बता दें कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार साल 2019 में आत्महत्या से 1,39,123 लोगों की मौत हुई, जो 2018 की तुलना में 3.4 फीसदी की वृद्धि है.
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