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3 साल से एक ही मामले में बगैर ट्रायल के 120 आदिवासी जेल में कैद

Published On :    23 Sep 2020   By : MN Staff
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सुकमा के घने जंगलों में सुरक्षा बलों के एक कैंप के कुछ ही दूरी पर बुरकापाल नाम का एक छोटा गांव हैं. तीन साल पहले इस गांव के 37 आदिवासियों को यूएपीए कानन के तहत गिरफ्तार किया गया था. इनका ट्रायल अभी तक शुरू नहीं होने से वे जेल में बंद हैं. उन पर माओंवादीयों की मदद करने का आरोप हैं.



नई दिल्ली : सुकमा के घने जंगलों में सुरक्षा बलों के एक कैंप के कुछ ही दूरी पर बुरकापाल नाम का एक छोटा गांव हैं. तीन साल पहले इस गांव के 37 आदिवासियों को यूएपीए कानन के तहत गिरफ्तार किया गया था. इनका ट्रायल अभी तक शुरू नहीं होने से वे जेल में बंद हैं. उन पर माओंवादीयों की मदद करने का आरोप हैं.


दरअसल अप्रैल, 2017 में इस गांव से कुछ ही दूरी पर सीआरपीएफ की 74वीं बटालियन कैंप को माओवादियों ने उड़ा दिया था. इस घटना में इंस्पेक्टर रैंक के एक अफसर समेत 25 जवानों की मौत हो गयी थी. यहां तैनात सुरक्षा बलों के जवान बुरकापाल गांव से सटे डोरनापाल-जागरगोंडा सड़क के निर्माण की गार्डिंग कर रहे थे.


इसके बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने चिंतागुफा पुलिस थाने के अंतर्गत आनेवाले बुरकापाल, गोंडापल्ली, चिंतागुफा, तालमेल्टा, कोराइगुंडम और टोंगुडा गाव के 120 आदिवासियों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार कर लिया. गांव के नवनिर्वाचित सरपंच के बड़े भाई भी हमले में शामिल होने के आरोप में जेल में बंद हैं, सरपंच ने बताया कि हमले के कुछ ही दिनों बाद हमारे गांव के 37 लोगों को यूएपीए समेत दूसरी धाराओं के तहत गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.


सरपंच मुचाकी हांडा ने बताया कि “प्रत्येक पुरुष और यहां तक कि कुछ किशोर बच्चे भी जो उस समय गांव में थे सभी के खिलाफ यूएपीए और दूसरी धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया गया. केवल शहरों में काम करने वाले लोग ही छूटे. मैं उस समय आंध्र प्रदेश की एक ग्रोसरी स्टोर में काम कर रहा था इसलिए मेरा नाम नहीं दर्ज किया गया. लेकिन मेरे भाई का नाम डाल दिया गया. 



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कोई भी इस हमले में शामिल नहीं था लेकिन पुलिस ने माओवादी होने का आरोप लगा कर सभी को गिरफ्तार कर लिया था. तीन साल से ज्यादा बीत गए हैं, लेकिन मुकदमों का ट्रायल शुरू नहीं होने से कसी को भी जमानत नहीं मिली है. पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक बुरकापाल के 37 लोगों के साथ तीन गांवों के कुल 120 लोगों को यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया है. और इन सभी पर उस हमले में शामिल होने का आरोप है.


हमले में नामजद की गयी मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया ने कहा कि अभी तक इसका ट्रायल नहीं शुरू हुआ है. और उसमें केवल इस बात के चलते देरी हो रही है क्योंकि आरोपियों की संख्या बहुत ज्यादा है. पुलिस का कहना है कि इतने लोगों को एक साथ कोर्ट में पेश करने की व्यवस्था नहीं की जा सकती है. क्योंकि उसके पास पर्याप्त कांस्टेबल नहीं हैं और कोर्ट उनकी टुकड़ियों में सुनवाई के लिए तैयार नहीं है.


उन्होंने बताया कि पुलिस ने निर्दोष लोगों को यूएपीए और दूसरी धाराओं के तहत बंद किया है. ट्रायल अभी भी अपने शुरुआती चरण है जिसमें आरोपों को तैयार किया जाता है. अब यह तीन साल हो गया है जब 120 आरोपी जगदलपुर जेल में बंद हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह के कैदियों को राजनीतिक कैदी के तौर पर श्रेणीबद्ध कर उन्हें लाकडाउन के दौरान जमानत दे दी जानी चाहिए थी. और उसी के साथ फास्टट्रैक कोर्ट में उनकी ट्रायल भी शुरू हो जानी चाहिए थी.



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वहीं, बस्तर के आईजी सुंदराज पी ने उनके आरोपों को बकवास करार देते हुए कहा, कोविड-19 महामारी और लाकडाउन के चलते केस के ट्रायल में बाधा खड़ी हो गयी. बस्तर पुलिस केस में तेजी से ट्रायल को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है.


वहीं बुरकापाल केस में ज्यादातर आरोपियों के वकील संजय जयस्वाल ने कहा कि इस सच्चाई से बिल्कुल इंकार नहीं किया जा सकता है कि जरूरत से ज्यादा देरी कोर्ट की मंथर प्रक्रिया के चलते है. जायसवाल ने कहा कि सभी के खिलाफ चार्जशीट तैयार हो जाने के बाद ही ट्रायल शुरू हो पाएगा.



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आदिवासियों की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज उठाने वाली सोनी-सोरी का कहना है कि सरकार निर्दोष आदिवासियों की नाराजगी नहीं सुन रही है. सोरी ने कहा, गांव में कोई भी पुरुष नहीं छूटा है. हमले के बाद बगैर किसी सबूत के बुरकापाल समेत दूसरे गांवों के आदिवासियों को सुरक्षा बलों ने जेल में डाल दिया.


छत्तीसगढ़ के डीजीपी डीएम अवस्थी ने बताया कि आरोपियों को कोर्ट में साफ-सुथरे ट्रायल का पूरा हक है और वह इस सिलसिले में पुलिस को निर्देश देंगे. अवस्थी ने बताया की मुझे ट्रायल में देरी के बारे में नहीं बताया गया. मैं मामले की जांच करूंगा और जरूरी निर्देश भी दूंगा, ताकि ट्रायल शुरू हो सके.

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