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Kaala, a must watch movie.

Published On :    13 Jun 2018   By : MN Staff
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फिल्म की कहानी भारत की सबसे बडी झोपडपट्टी कही जाने वाली मुंबई स्थित धारावी की है. फिल्म की शुरुवात ही आपको शिवसेना के ‘उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी’ आंदोलन की याद दिलाती है



मुझे साऊथ इंडियन सिनेमा ओवर फाईटींग और फास्ट डिरेक्शन की वजह से बिलकुल भी पसंद नहीं. इसके पहले शायद ही मैने कोई साऊथ की फिल्म देखी हो. बाहुबली-1 की सफलता के बाद बाहुबली-2 की इतनी चर्चा होने के बाद भी मैने आज तक ना बाहुबली का ना पहला पार्ट देखा और ना दुसरा. इससे आप अंदाजा लगा सकते हो की मुझे साऊथ की फिल्मों से कितनी नफरत है. लेकीन इसके बावजुद भी मै Kaala देखने गया और सन्न रह गया.


फिल्म की कहानी भारत की सबसे बडी झोपडपट्टी कही जाने वाली मुंबई स्थित धारावी की है. फिल्म की शुरुवात ही आपको शिवसेना के ‘उठाओ लुंगी, बजाओ पुंगी’ आंदोलन की याद दिलाती है. शिवसेना का जन्म साऊथ के लोगों को मुंबई में विरोध करके हुआ है. 



जो लोग साऊथ से मुंबई में आये उनमें से ज्यादा तर लोग धारावी, एँटॉपहिल और चेंबुर जैसे इलाकों में बस गए. धारावी की एक विशेषता ये भी है की वो किसी बाहरी गँगस्टर या अंडरवर्ल्ड डॉन के प्रभाव में नहीं आयी. आज भी मुंबई में धारावी का अपना एक अलग आतंक है.



झोपडपट्टीयों की अपनी एक अलग समस्या है. गंदगी, पानी, प्रायवेसी, स्वास्थ, शिक्षा और न जाने क्या क्या! इन सभी समस्याओं को फिल्म में बखुबी से और बारीकी से दर्शाया गया है. सुबह उठकर संडास जाने की समस्या से लेकर रात को बिवी की ‘चुम्मी’ लेने तक की सारी समस्याओं को एक मजाकियां अंदाज में पेश किया है.


फिल्म के मुख्य किरदार सुपर स्टार रजनीकांत का नाम #काला है. काला रंग मेहनतकश लोगों की पहचान है. साऊथ इंडिया में काला रंग विद्रोह का प्रतिक माना जाता है. पेरियार रामासामी के प्रचारक काले रंग के कपडो में इस व्यवस्था के विरोध में मैदान में उतरे थे. साल 2016-17 को निकले हुए मराठा क्रांति मोर्चा के स्वयंसेवकों ने भी काले रंग की पोशाक पहनी थी, वो उन्होंने शायद वही से लिया था.


गंदे और गलत काम करने वाला सफेद पोशाक में और नेक और साफ काम करने वाला काले पोशाक में शायद ही आपने किसी दूसरी फिल्म में देखा होगा. मै तो हमेशा कहता हूँ की ‘गंदे हाथ साफ कमाई की निशानी है और साफ हाथ गंदे कामों की निशानी!’


फिल्म में निगेटीव किरदार कर रहे नाना पाटेकर का एक अलग रुतबा है. नाना पाटेकर को पूरी फिल्म में कहीं पर भी हिंसा करते नहीं दिखाया है, लेकीन उनकी क्रुरता उनकी कलाकारी से झलकती है. कई बार तो नाना अपनी अदाकारी की वजह से सुपर स्टार रजनीकांत पर हावी होते दिखाई देते है.


जिन प्रतिकों का चयन निर्देशक ने फिल्म में किया है वो लाजवाब है. फिर चाहे वो राम-रावण हो या झोपडपट्टी तोडकर वहां पर बिल्डींग बनाने के लिए आया हुआ ‘मनु’ बिल्डर हो या क्रांतिकारी, लेकीन भारत में क्रांति करने के लिए असमर्थ ‘लेनिन’ हो. सारी मान्यताओं को हवा में उडाकर रावण को सही और राम को गलत दिखाने वाला पा. रंजिथ एक निर्देशक बना है.


फिल्म में ब्राम्हणवाद और सत्ता पर बने रहने के लिए ब्राम्हणों द्वारा किये जाने वाले  लगभग हर षडयंत्र को दिखाया गया है. मसलन धार्मिक दंगों से लेकर प्रशासन के दुरुपयोग तक, यानि साम, दाम, दंड, भेद के ब्राम्हणी निती को निर्देशक ने सही मायने के साथ उजागर किया है. शोषणकारी व्यवस्था के विरोध में संगठीत शक्ति ही जीत सकती है, यह संदेश भी इस फिल्म से मिलता है.


हाल ही में आंदोलनकारीयों को नक्षलवादी ठहराकर नौजवानों में डर निर्माण करने की मीडिया की नाकाम कोशिश भी इस फिल्म से ध्वस्त होती है. नौजवानों को आंदेलन की मुख्यधारा में लाने के लिए ये फिल्म कारगर साबित हो सकती है.


फिल्म इंडस्ट्री पर ब्राम्हणों का वर्चस्व होने की वजह से प्रत्येक निगेटीव रोल में किसी बहुजन का नाम आता है और अच्छे काम करने वाला उच्चवर्णीय. लेकीन काला में नाना पाटेकर अभ्यंकर नामक ब्राम्हण दिखाये है जो निगेटीव किरदार में है, जिसके घर में परशुराम का फोटो टंगा है.


फिल्म में जमिन के अधिकारों कि बात की है. आज देश में न केवल झोपडपट्टीयों में रहने वालों से उनकी जमिन छिनी जा रही है, बल्कि किसान, आदिवासी, मुस्लिम इन सभी तपकों से उनकी जमिन सरकार द्वारा छिनकर बनिया पुँजीपतियों को दी जा रही है.


अगर हम बात इतिहास की करें तो ब्राम्हणों ने भारत पर आक्रमण करके यहां के मूलनिवासीयों से सबसे पहले उनकी जमीन ही छिनी थी, ‘काला’ उसी अधिकार की बात करता है.


मुझे जिसने एकदम से हिला दिया वो था फिल्म का क्लाईमैक्स, जिसके बारे में लिखा नहीं जा सकता. उसे तो केवल थिएटर में जाकर देखा जा सकता है.


#Kaala की पूरी टिम को बधाई देते हुए, पा. रंजिथ का शुक्रिया अदा करते हुए, आप सभी अनुरोध करता हूँ की ये फिल्म थिएटर में जाकर देखे.

-संकेत विद्रोही.
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