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सरकार ने कंपनियों को दी एक दिन में 12 घंटे तक वर्किंग आवर्स रखने की छूट

Published On :    21 Nov 2020   By : MN Staff
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नए लेबर कोड में प्रस्ताव



नई दिल्ली : मोदी सरकार द्वारा संसद में नए श्रम कानून का बिल पारित करने के बाद अब सामने आ रहा हैं की इसमे क्या प्रवाधान किया गया हैं. नए लेबर कोड के ड्राफ्ट में कर्मचारियों के काम के घंटे को दिन में 12 घंटे तक किए जाने का केंद्रिय श्रम मंत्रालय ने प्रस्ताव रखा हैं. ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ ऐंड वर्किंग कंडीशंस के नाम से तैयार कोड में सरकार ने कंपनियों को एक दिन में 12 घंटे तक वर्किंग आवर्स रखने की छूट देने की बात कही है. बता दें कि इससे पहले यह अवधि 9 घंटे की थी और इसमें एक घंटे का रेस्ट भी शामिल था. इस प्रस्ताव के बाद देश भर के कामगारों में केंद्र सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ने की संभावना है.



यह लेबर कोड मौजूदा 13 केंद्रीय श्रम कानून की जगह लेगा. हालांकि पहले की तरह ही ड्राफ्ट में यह बात भी कही गई है कि कर्मचारियों से सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता. ड्राफ्ट रूल्स में कहा गया है कि कर्मचारियों के काम के घंटे इस तरह से तय किए जाएंगे कि उसमें रेस्ट के लिए इंटरवल का वक्त भी शामिल हो और दिन भर में 12 घंटे से ज्यादा का वर्किंग पीरियड न हो.


फिलहाल इस ड्राफ्ट पर श्रम मंत्रालय ने अगले 45 दिनों में संबंधित पक्षों से राय मांगी है. इस कोड के अलावा 4 अन्य कोड्स को भी श्रम मंत्रालय ने पेश किया है. केंद्र सरकार की योजना लेबर को़ड्स को जनवरी तक संसद से मंजूरी दिलाने की है. ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ ऐंड वर्किंग कंडीशंस कोड में सरकार ने यह भी तय किया है कि यदि सप्ताह में कोई कर्मचारी ओवरटाइम करता है तो उस अवधि का उसे डबल मेहनताना दिया जाएगा.



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ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में कहा गया है कि यदि कर्मचारी किसी दिन 8 घंटे से ज्यादा या फिर सप्ताह में 48 घंटे से ज्यादा काम करता है तो फिर उसे ओवरटाइम का मेहनताना सामान्य सैलरी से दोगुना मिलेगा. यही नहीं ओवरटाइम के कैलकुलेशन को लेकर भी नियम तय किया गया है. यदि कोई कर्मचारी 15 से 30 मिनट तक काम करता है तो फिर उसे पूरे 30 मिनट के तौर पर काउंट किया जाएगा. इसके अलावा मासिक सैलरी की बात की जाए तो यह 1/26 प्रतिदिन दिहा़ड़ी के आधार पर तय की जाएगी. सैलरी के लिए इससे कम का कैलकुलेशन नहीं किया जा सकता.



मालूम हो की केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने पिछले दिनों कहा था कि यदि किसी श्रम सुधार से श्रमिकों के हितों की रक्षा नहीं होती है तो उसे सुधार नहीं कहा जा सकता है. अब यही सरकार श्रम कानून में बदलाव कर श्रमिकों के हितों की रक्षा के साथ खिलवाड कर रही है. कामगारों के समर्थन का दम भरने वाली सरकार ने कामगारों के नही बल्कि कॉरपोरेट के हितों की रक्षा करती दिख रही है. जिस पर देश की सभी ब्राम्हणवादी कामगार युनियने चूप है. जब भी आम कामगारों के हितों के रक्षा की बात आती हैं तब कागमारों के लिए लढने का दावा करने वाली यह युनियने चुप्पी साध लेती है.



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निजीकरण के लेकर भी यही हाल है. राजनैतिक दलों के प्रतिनिधी इसका संसद में विरोध नहीं करते वही दुसरी और उनकी ट्रेड युनियने कामगारों को रस्ते पर उताकर इसका विरोध करने को कहती हैं. यह दोहरा मापदंड ब्राम्हणवादी ट्रेड यूनियनों का हैं. जिसके चलते देश की आम कामगारों का भवितव्य लगातार अंधकारमय होता जा रहा हैं.
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