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नोटबंदी के बाद बढ़ी शिशु मृत्यु दर, यूपी-मध्यप्रदेश और झारखंड सबसे आगे

Published On :    26 Nov 2020   By : MN Staff
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साल 2016 में लिए गए नोटबंदी फसले का असर अर्थव्यस्था में गिरावट ही नहीं बल्कि शिशु मृत्यु दर पर भी काफी पड़ा है. एक स्टडी में इसका खुलासा हुआ हैं.



नई दिल्ली : साल 2016 में लिए गए नोटबंदी फसले का असर अर्थव्यस्था में गिरावट ही नहीं बल्कि शिशु मृत्यु दर पर भी काफी पड़ा है. एक स्टडी में इसका खुलासा हुआ हैं. इसमें बताया गया है कि नोटबंदी के बाद झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में कुल शिशु मृत्यु दर बढ़ी है जबकि अन्य राज्यों में एक साल से स्थिरता दिख रही है. यह स्टडी अर्थशास्त्री, ज्यां द्रेज, आशीष गुप्ता, साई अंकित पराशर और कनिका शर्मा के नेतृत्व में किया गया.


स्टडी ने के अनुसार वर्ष 2016 में नोटबंदी के बाद शिशु मृत्यु दर कम करने का भारत का प्रयास कमजोर पड़ रहा है. 2017 में शिशु मृत्यु दर 2.9 प्रतिशत थी जो वर्ष 2018 में 3.1 प्रतिशत हो गई है. हालांकि वर्ष 2019 में शिशु मृत्यु दर में फिर से गिरावट आई है. लेकिन स्टडी में चेतावनी दी गई कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण इस साल एक ओर झटका लगने की आशंका है.


इससे प्रसवपूर्व देखभाल और बच्चे की टीकाकरण जैसी स्वास्थ्य सेवाओं में काफी रूकावट आई हैं. वर्ष 2005-2016 के बीच कुल शिशु मृत्यु दर की वार्षिक गिरावट दर 4.8 प्रतिशत प्रतिवर्ष थी जबकि 1990 से 2005 की अवधि के दौरान ये 2.1 प्रतिशत और वर्ष 1971 और 1990 के बीच प्रतिवर्ष 2.6 प्रतिशत थी.


यह स्टडी वर्ष 2017 और 2018 के दौरान भारत में शिशु मृत्यु दर स्थिरता और पुनरावृत्ति के अनुसार खुशफहमी यह है कि नवंबर 2016 में नोटबंदी के साथ किया गया भारत का चौंकाने वाला प्रयास इस असफलता के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार है. उस समय 86 प्रतिशत मुद्रा रातों रात बेकार हो गई थी। इस स्टडी में इस्तेमाल किए गए आंकड़े, नमूना, पंजीकरण प्रणाली की संक्षिप्त रिपोर्ट पर आधारित है.



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बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्टडी में बताया गया है कि छत्तीसगढ, झारखंड, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में कुल शिशु मृत्यु दर बढ़ी है तथा सात अन्य राज्यों में कम से कम एक साल से स्थिरता आई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि नमूना पंजीकरण प्रणाली में कई सालों से आईएसआर-1 शिशु मृत्यु दर में इस प्रकार की गिरावट नहीं देखी गई है. यह सब काफी खतरनाक है.



स्टडी में कहा गया है कि वर्ष 2005 से 2016 तक भारत में शिशु मृत्यु दर में तेज गिरावट के लंबे दौर का अनुभव किया था. इस अवधी को तीव्र आर्थिक विकास द्वारा चिह्नित किया गया था. इसमें वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरूआत और वर्ष 2006 के सार्वभौमिकीकरण समेत सामाजिक क्षेत्र की प्रमुख पहल सामिल थी. 



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इस बात को ध्यान में रखते हुए कि पिछले पंद्रह सालों के दौरान इस तरह की बाधा नहीं आई है, स्टडी में कहा गया है कि वर्ष 2017 में राज्य स्तर पर शिशु मृत्यु दर में गिरावट का यह उलटफेर मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित था. हालांकि वर्ष 2018 के दौरान कई राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसी तरह का उलटफेर हुआ.
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