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छह सालों से सुनवाई के इंतज़ार में यूएपीए के तहत गिरफ़्तार कार्यकर्ता की हिरासत में मौत

Published On :    26 Jan 2021   By : MN Staff
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माओवादी आंदोलन में कथित भागीदारी के आरोप में 2014 में गिरफ्तार महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की छात्र अधिकार कार्यकर्ता कंचन नानवरे की पुणे के ससून अस्पताल में मौत हो गई. 38 वर्षिय नानवरे आदिवासी समुदाय से थीं.



मुंबई : माओवादी आंदोलन में कथित भागीदारी के आरोप में 2014 में गिरफ्तार महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की छात्र अधिकार कार्यकर्ता कंचन नानवरे की पुणे के ससून अस्पताल में मौत हो गई. 38 वर्षिय नानवरे आदिवासी समुदाय से थीं. नानवरे को जन्म से ही हृदय संबंधी बीमारी थी और वह बीते हफ्ते मस्तिष्क संबधी बीमारी से जूझ रही थीं.


उनके परिवार और वकीलों का आरोप है कि न तो जेल और न ही अस्पताल प्रशासन ने उन्हें 16 जनवरी को उनकी ब्रेन सर्जरी होने तक इसकी जानकारी नहीं दी. बीते दो सालों में नानवरे ने अपने वकील के जरिये जमानत के लिए कई बार सत्र अदालत और बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया था. उनके वकील पार्थ शाह का कहना है की हर बार उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई.


बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष अक्टूबर में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें मेडिकल आधार पर और उनकी लगातार खराब हो रहे स्वास्थ्य के चलते जमानत दिए जाने की मांग की गई थी. डॉक्टरों ने उन्हें हार्ट ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया था, इसे भी अदालत के समक्ष रखा गया, लेकिन यह याचिका अब भी लंबित है. जब उनकी जमानत याचिका पर हाईकोर्ट के समक्ष सुनवाई हुई तो अदालत को बताया गया कि उनके जीवित बचने के लिए हृदय प्रत्यर्पण ही एकमात्र विकल्प है. 


अदालत ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर विचार करने और तत्काल चिकित्सा देखरेख के लिए एक समिति का भी गठन किया था, लेकिन इस महत्वपूर्ण मामले पर भी सुनवाई में महीनों लग गए और इस दौरान उनकी मौत हो गई.


नानवरे पर जिन नौ मामलों पर केस दर्ज किया गया, उनमें से छह में वह पहले ही बरी हो गई थीं. तीन मामले एक गढ़चिरौली, पुणे और गोंदिया अभी भी लंबित हैं. बीते छह सालों में वह महाराष्ट्र की विभिन्न जेलों में रहीं. उन्हें उनके पति अरुण बेल्के के साथ गिरफ्तार किया गया था और यूएपीए के तहत उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया. बेल्के फिलहाल जेल में हैं.



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उनके वकिल शाह ने कहा कि वह गंभीर रूप से बीमार थीं, लेकिन फिर भी उनके परिवार को तत्काल इसकी सूचना नहीं दी गई. शाह ने कहा, ‘बेल्के के परिवार को 24 जनवरी को एक पत्र मिला, जिसमें उनकी  बिगड़ती हालत के बारे में बताया गया और आज एक फोन आया जिसमें कहा गया कि उनकी मौत हो गई है. वकीलों की एक टीम अदालत का रुख कर रही है कि उनके शव को चंद्रपुर के बल्लारशाह में बेल्के के परिवार को दिया जाए.



नानवरे ने 2004 में छात्र अधिकार कार्यकर्ता के रूप में सामाजिक आंदोलन में हिस्सा लिया था. तब उनकी सहयोगी अनुराधा सोनूले बताती हैं कि नानवरे, बेल्के और कई अन्य छात्र 2004 से ही देशभक्ति युवा मंच का हिस्सा थे. सोनूले को भी कबीर कला मंच के सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के साथ इसी तरह के आरोपों में 2011 में गिरफ्तार किया गया था. उन्हें 2014 में जमानत मिली थी. 


सोनूले ने कहा, हमने कई छात्र आंदोलनों में हिस्सा लिया और किसानों, आदिवासियों और अनु.जाति समुदायों से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी आवाज भी उठाई. कंचन अपनी खराब स्वास्थ्य स्थिति के बावजूद सक्रिय तौर पर जुड़ी रहीं. देशभक्ति युवा मंच पर बाद में माओवादियों के अगुआ संगठन होने का आरोप लगा करनानवरे और बेल्के को 2008 में पहली बार गिरफ्तार किया गया.



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उन दोनों और दर्जनभर से अधिक छात्रों पर इलाके में नक्सल गतिविधियों में हिस्सा लेने का आरोप लगा और उनके खिलाफ यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया. वे लगभग सात महीनों तक जेल में रहे और बाद में उन्हें बरी किया गया. नानवरे के बिगड़ रहे स्वास्थ्य के बारे में सुनकर सोनूले सासून अस्पताल पहुंची थीं. उन्होंने बताया, ‘मुझे उनसे मिलने नहीं दिया गया, लेकिन उनकी सर्जरी के बारे में बताया गया. 



डॉक्टर ने मुझे बताया कि वह सिरदर्द की शिकायत कर रही थीं और उन्हें ब्लड क्लॉट की समस्या थी. पुणे की वकील गायित्री काम्बले को नानवरे से मिलने दिया गया. सर्जरी की वजह से नानवरे बेहोश थीं. बेल्के को अदालत ने नानवरे से मिलने की मंजूरी दी लेकिन उनके वकीलों का आरोप है कि जेल प्रशासन ने तत्काल आवश्यक व्यवस्था नहीं की और इस बीच उनकी मौत हो गई. पिछले साल मार्च में देश में कोरोना के मामले आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर कैदियों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया. महाराष्ट्र सरकार ने भी वादा किया कि वह भी जेल में बंद 11,000 से अधिक कैदियों को रिहा करेगा. कुछ कैदियों को रिहा किया गया लेकिन कई और को जेल में डाला जा रहा है.
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