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भारत में मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमला, कट्टरपंथियों को राजनीतिक संरक्षण

Published On :    25 Feb 2021   By : MN Staff
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मोदी सरकार ने नफरत की आग भड़काई और समाज में गहरी दरारें पैदा की : ह्यूमन राइट्स वॉच



‘‘सरकार न सिर्फ मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को हमलों से सुरक्षा प्रदान करने में नाकामयाब हुई है, बल्कि वह कट्टरपंथियों को राजनीतिक संरक्षण प्रदान कर रही है और उनका बचाव कर रही है.’’

न्यूयॉर्क :
जब से मोदी सरकार आई है तब से देश में न केवल नफरत की आग भड़काई जा रही है, बल्कि समाज में गहरी दरारें भी पैदा की जा रही है. यह बात किसी और ने नहीं, बल्कि खुद ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा है कि भारत में सरकारी तंत्र ने मुसलमानों के खिलाफ सुव्यवस्थित रूप से भेदभाव करने और सरकार के आलोचकों को बदनाम करने वाले कानूनों और नीतियों को अपनाया है. 


भाजपा की सरकार में अन्तर्निहित पूर्वाग्रहों ने पुलिस और अदालत जैसी स्वतंत्र संस्थाओं में पैठ बना ली है, यह बेख़ौफ़ होकर धार्मिक अल्पसंख्यकों को धमकाने, उन्हें हैरान-परेशान करने और उनपर हमले करने की ख़ातिर राष्ट्रवादी समूहों को लैस कर रही है.


23 फरवरी, 2021 को दिल्ली सांप्रदायिक हिंसा के एक साल पूरे हो रहे हैं जिसमें 53 लोग मारे गए थे. मृतकों में 40 मुस्लिम थे. भाजपा नेताओं द्वारा हिंसा भड़काने और हमलों में पुलिस अधिकारियों की संलिप्तता के आरोपों समेत पूरे मामले की विश्वसनीय और निष्पक्ष जांच करने के बजाय, सरकारी तंत्र ने कार्यकर्ताओं और विरोध प्रदर्शन के आयोजकों को निशाना बनाया है. 


सरकार ने हाल ही में एक अन्य जन प्रतिरोध, इस बार किसान आन्दोलन पर कार्रवाई की है. इसने अल्पसंख्यक सिख प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया है और अलगाववादी समूहों के साथ उनके कथित जुड़ाव की जांच शुरू कर दी है. ह्यूमन राइट्स वॉच की दक्षिण एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, भाजपा द्वारा अल्पसंख्यकों की कीमत पर हिंदू बहुसंख्यकों को आलिंगनबद्ध करने के प्रयासों का सरकारी संस्थानों पर भी असर हुआ है, जो बिना भेदभाव के कानून द्वारा समान संरक्षण की अनदेखी कर रहे हैं. सरकार न सिर्फ मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों को हमलों से सुरक्षा प्रदान करने में नाकामयाब हुई है, बल्कि वह कट्टरपंथियों को राजनीतिक संरक्षण प्रदान कर रही है और उनका बचाव कर रही है.


सरकार के भेदभावपूर्ण नागरिकता कानून और प्रस्तावित नीतियों के खिलाफ सभी धर्मों के भारतीयों द्वारा महीनों तक चलाए गए शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के बाद, फरवरी 2020 में दिल्ली में हमले हुए. भाजपा नेताओं और समर्थकों ने राष्ट्रीय हितों के खिलाफ साजिश का आरोप लगाकर प्रदर्शनकारियों, खास तौर से मुसलमानों को बदनाम करने की कोशिश की. 


इसी तरह, विभिन्न धर्मों के हजारों-हजार किसानों द्वारा नवंबर 2020 में सरकार के नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किए जाने के बाद भाजपा के नेताओं, सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों और सरकार परस्त मीडिया ने एक अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक, सिखों को बदनाम करना शुरू कर दिया. उन्होंने 1980 और 90 के दशक में पंजाब के सिख अलगाववादी विद्रोह का हवाला देते हुए सिखों पर यह आरोप लगाया कि उनका खालिस्तानी एजेंडा है. यहां तक कि 8 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में विभिन्न शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में भाग लेने वाले लोगों को ‘परजीवी’ बताया और भारत में बढ़ते सर्वसत्तावाद की अंतर्राष्ट्रीय आलोचना को ‘विदेशी विनाशकारी विचारधारा’ कहा.


विरोध प्रदर्शनों के बारे में जानकारी प्रदान करने और सोशल मीडिया पर उन्हें मदद करने के तरीके बताने के लिए कथित रूप से एक दस्तावेज़ संपादित करने के लिए राजद्रोह और आपराधिक साजिश के आरोप में जलवायु कार्यकर्ता को गिरफ्तार किया और दो अन्य लोगों के खिलाफ वारंट जारी किए. इसके साथ ही हाल के वर्षों में सरकार द्वारा कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और अन्य आलोचकों को निशाना बनाने के बढ़ते मामलों के बीच हालिया गिरफ्तारियां हुई हैं. 


सरकार ने अल्पसंख्यकों और कमजोर समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वालों को खास तौर पर परेशान किया है और उन पर मुकदमा चलाया है. भाजपा नेताओं और संबद्ध समूहों ने अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से मुसलमानों को लंबे समय से राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदू जीवन शैली के लिए खतरा बताया है. उन्होंने इस दावे के साथ ‘लव जिहाद’ का हौआ खड़ा किया है कि मुस्लिम पुरुष हिंदू महिलाओं का इस्लाम में धर्मान्तरण के लिए उन्हें बहला-फुसलाकर शादियां करते हैं, मुस्लिमों को अवैध प्रवासी या यहां तक कि उग्रवादी करार दिया और उन पर गोहत्या के मामले में हिंदू भावनाएं आहत करने का आरोप लगाया.


ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि 2014 में मोदी की भाजपा के सत्तासीन होने के बाद, इसने कई विधायी और अन्य कार्य किए हैं, जिन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव को कानूनी जामा पहना दिया है और उग्र हिंदू राष्ट्रवाद की जड़ें मजबूत की हैं. सरकार ने दिसंबर 2019 में मुसलमानों के साथ भेदभाव करने वाला नागरिकता कानून पारित किया, जिसमें पहली बार धर्म को नागरिकता का आधार बनाया गया. अगस्त 2019 में, सरकार ने एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य, जम्मू और कश्मीर को दी गई संवैधानिक स्वायत्तता रद्द कर दी और लोगों के बुनियादी अधिकारों का उल्लंघन करते हुए अनेकानेक प्रतिबंध लगा दिए.


राज्य सरकारें मुस्लिम मवेशी व्यापारियों पर गोहत्या निषेध संबंधी कानूनों के तहत मुक़दमें दर्ज करती हैं, जबकि भाजपा से संबद्ध समूह मुस्लिमों और अनुसूचित जातियों पर इन अफवाहों के आधार पर हमले करते हैं कि उन्होंने गोमांस के लिए गौ-हत्या की या उनका व्यापार किया. हाल ही में, तीन भाजपा शासित राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानून पारित किए हैं, व्यवहार में, जिनका इस्तेमाल हिंदू महिलाओं से शादी करने वाले मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ किया जाता है. ये कार्रवाइयां घरेलू कानून का और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के प्रति भारत के दायित्वों का उल्लंघन करती हैं.


ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा कि भारत सरकार धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यक आबादी की सुरक्षा के वास्ते और उनके खिलाफ भेदभाव और हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध पूरी तरह और निष्पक्ष तौर पर कानूनी कार्रवाई करने के लिए भी बाध्य है. गांगुली ने कहा, भाजपा सरकार की कार्रवाइयों ने सांप्रदायिक नफ़रत की आग भड़काई है, समाज में गहरी दरारें पैदा की हैं और अल्पसंख्यक समुदायों में सरकारी तंत्र के प्रति डर और अविश्वास को और ज्यादा गहरा किया है. एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में भारत की अवस्थिति पर गंभीर खतरे में है जब तक कि सरकार भेदभावकारी कानूनों और नीतियों को वापस नहीं लेती है और अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न की खातिर न्याय सुनिश्चित नहीं करती है.


इसके अलावा मार्च में कोविड-19 के उभार के बाद कई हफ्तों तक भाजपा सरकार ने कोविड मामलों में उछाल के लिए दिल्ली में आयोजित एक सार्वजनिक धार्मिक सभा को ज़िम्मेदार ठहराया जिसका आयोजन अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक मिशनरी आंदोलन, तबलीगी जमात ने किया था. इस घटनाक्रम ने इस्लामोफोबिया के प्रसार को आवेग दिया, कुछ भाजपा नेताओं ने इस सभा को ‘तालिबानी अपराध’ और ‘कोरोना आतंकवाद’ बताया और सरकार परस्त टेलीविज़न चैनल्स और सोशल मीडिया ने इस सभा में शिरकत करने वालों और आम तौर पर भारतीय मुस्लिमों को इस उभार के लिए न सिर्फ जिम्मेदार ठहराया बल्कि इसे जान-बूझकर फ़ैलाने का भी आरोप लगाया. 


सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर ऐसे फेक वीडियो वायरल हुए जिसमें दावा किया गया कि मुसलमानों ने जानबूझकर वायरस फैलाया. इससे हफ्तों तक मुस्लिमों के साथ दुर्व्यवहार का दौर जारी रहा, उनके व्यवसाय का और उनका व्यक्तिगत रूप से बहिष्कार किया गया और राहत सामग्री बांटने वाले स्वयंसेवकों समेत मुसलमानों पर अनगिनत हमले हुए.

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