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पूर्व जस्टिस बोले- सरकार की आलोचना करने वाले होते हैं शिकार, राजद्रोह कानून को खत्म करने का समय

Published On :    19 Jan 2022   By : MN Staff
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यह देशद्रोह कानूनों को पूरी तरह से खत्म करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अनुमति देने का समय है.



नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने सरकार की आलोचना करने वाले आलोचकों के खिलाफ देशद्रोह लगाने को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए राजद्रोह कानून को खत्म करने की बात कही है. उन्होंने कहा कि यह देशद्रोह कानूनों को पूरी तरह से खत्म करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अनुमति देने का समय है. 14 जनवरी को मुंबई में डीएम हरीश स्कूल ऑफ लॉ के उद्घाटन के मौके पर एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जस्टिस नरीमन ने यह बात कहीं.



पूर्व जस्टिस ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करने वालों पर कड़े राजद्रोह कानून के तहत मामला दर्ज किया जा रहा है. लेकिन अभद्र भाषण देने वालों से ठीक तरीके से निपटा नहीं जा रहा है. उन्होंने कहा कि अभद्र भाषण देने वाले, एक विशेष समूह का नरसंहार करने का आह्वान कर रहे हैं, लेकिन इन लोगों के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती दिख रही. अधिकारियों में भी इसके लिए उदासीनता है. यहां तक कि दुर्भाग्य से सत्ताधारी दल के उच्च स्तर के लोग न केवल इस तरह की अभद्र भाषण के लिए खामोश हैं बल्कि उसका लगभग समर्थन भी कर रहे हैं.



पूर्व न्यायाधीश ने तिरुवनंतपुरम में उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू द्वारा अभद्र भाषा को असंवैधानिक कहे जाने पर खुशी जाहिर की. बता दें कि वेंकैया नायडू ने कहा था, अभद्र भाषा और लेखन संस्कृति, विरासत, परंपरा के साथ-साथ संवैधानिक अधिकारों और लोकाचार के खिलाफ हैं. प्रत्येक व्यक्ति को देश में अपने धार्मिक विचारों को मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार है. अपने धर्म का पालन करें, लेकिन गाली न दें और अभद्र भाषा और लेखन में लिप्त न हों.


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बता दें कि पूर्व न्यायाधीश रोहिंटन नरीमन पिछले साल अगस्त में रिटायर हो चुके हैं. उनकी पहचान सपाट और बेबाक बोली के लिए है. अपने पिछले 35 सालों की वकालत के दौरान वह 500 से ज्यादा सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को अपने खाते में दर्ज करा चुके हैं.



इसके पहले भारत के औपनिवेशिक इतिहास से चले आ रहे राजद्रोह कानून के हो रहे दुरुपयोग को लेकर चिंता ज़ाहिर करते हुए मुख्य न्यायाधीश एन.व्ही. रमना ने कहा था कि, राजद्रोह कानून का इस्तेमाल बिल्कुल उसी तरह से है, जैसे हम किसी बढ़ई को लकड़ी का एक टुकड़ा काटने के लिये आरी देते हैं लेकिन वो उसका इस्तेमाल पूरे जंगल को ही काटने में कर डालता है.



आईपीसी की धारा 124-ए के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अगर अपने शब्दों द्वारा चाहे वक्तव्य अथवा लिखित में, या फिर अपने इशारों, या अपने स्पष्ट व्यवहार से नफ़रत या निंदा की कोशिश, अथवा भारत की विधि-व्यवस्था द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ़ असंतोष/रोष व्यक्त या जागृत करता है, और दोषी पाया जाता है, तो उस पर (आजीवन कारावास) और जुर्माने की सज़ा लागू होगी. ये भी हो सकता है कि एक से तीन साल के कारावास के साथ उसपर जुर्माना भी लगाया जाये. इस कानून को ब्रिटिश राज के दौरान राज्य के खिलाफ़ किसी भी प्रकार के असंतोष या विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए लागू किया गया था.



बता दें कि ऐसे कई उदाहरण है जहां इस कानून का इस्तेमाल बहुतायत में अपने राजनीतिक विरोधियों की असहमति और अभिव्यक्ति एवं बोलने की स्वतंत्रता को दबाने में हो रहा है. सन् 1962 के केदारनाथ के संदर्भ मे आये अदालत के फ़ैसले के अनुसार, राजद्रोह कानून का इस्तेमाल केवल विशेष परिस्थिति में ही की जा सकती है, ख़ासकर तब-जब की देश की सुरक्षा और संप्रभुता खंतरे में हो. हालांकि, हाल के दिनों में ये बार-बार देखा जा रहा है कि- इस कानून का इस्तेमाल सरकार-विरोधी राजनीतिक दलों को चुप कराने के लिये किया जा रहा है ताकि वे सरकार के खिलाफ़ रोष या असंतोष ज़ाहिर न कर सकें.
 

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