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गुजरात में बीजेपी को बड़ा झटका, आदिवासियों के लगातार विरोध के बाद पार-तापी नर्मदा रिवर लिंक प्रोजेक्ट रद्द

Published On :    22 May 2022   By : MN Staff
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बता दें, आदिवासी समुदाय इस प्रोजेक्ट का लंबे समय से विरोध कर रहा था. गुजरात में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं. इस परियोजना के चलते बीजेपी सरकार को आदिवासी वोट बैंक के छिटक जाने का खतरा पैदा हो गया था. हाल ही में तापी के सोनगढ़ में आदिवासी समुदाय द्वारा एक रैली का आयोजन किया गया था. इस दौरान पीएम मोदी के नाम पोस्टकार्ड लिखकर भी इस प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग की गई थी. इस प्रोजेक्ट पर चल रहे भारी विरोध के बाद आज सूरत में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इसे रद्द करने की घोषणा की.



नई दिल्ली : गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा सरकार को एक बड़ा झटका लगा है. आदिवासियों के भारी विरोध के कारण राज्य सरकार को अपने महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट से कदम पीछे खींचना पड़ा है. राज्य सरकार ने पार-तापी नर्मदा रिवर लिंक प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया है. कुछ दिनों पहले तक भाजपा सरकार इस प्रोजेक्ट को राज्य की एक अहम योजना के रूप में चिह्नित कर रही थी. लेकिन आदिवासियों के लगातार विरोध के बाद उन्होंने इसे रद्द कर दिया है.


बता दें, आदिवासी समुदाय इस प्रोजेक्ट का लंबे समय से विरोध कर रहा था. गुजरात में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं. इस परियोजना के चलते बीजेपी सरकार को आदिवासी वोट बैंक के छिटक जाने का खतरा पैदा हो गया था. हाल ही में तापी के सोनगढ़ में आदिवासी समुदाय द्वारा एक रैली का आयोजन किया गया था. इस दौरान पीएम मोदी के नाम पोस्टकार्ड लिखकर भी इस प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग की गई थी. इस प्रोजेक्ट पर चल रहे भारी विरोध के बाद आज सूरत में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने इसे रद्द करने की घोषणा की.


कांग्रेस ने इस परियोजना को आदिवासियों के हितों के विरुद्ध करार देते हुए पूरी तरह रद्द किए जाने की मांग की थी. बीते दिनों कांग्रेस प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा था कि कांग्रेस विकास के खिलाफ नहीं है, लेकिन चंद पूंजीपतियों का फायदा पहुंचाने के लिए हजारों आदिवासी परिवारों को नुकसान पहुंचाने की कोई बात करेगा तो उसका हम पुरजोर विरोध करेंगे. इन परियोजनाओं को वर्ष 2010 में मंजूरी दी गई थी, जब केंद्र सरकार, गुजरात और महाराष्ट्र के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे.


पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजना के जरिए पश्चिमी घाट के पानी को सौराष्ट्र और कच्छ के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भेजा जाना था. लंबे समय से दक्षिण गुजरात के आदिवासी इसका विरोध कर रहा था. आदिवासी नेताओं का कहना है कि महाराष्ट्र के डांग, वलसाड और नासिक जिले में छह जलाशय विकसित होने से गुजरात के करीब 50,000 लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे. इनमें से तीन बांध डांग में, एक वलसाड में और दो महाराष्ट्र में विकसित किए जाने थे.


डांग जिले के वाघई तालुका में बनने वाले तीन बांधों के डूब क्षेत्रों में कम से कम 35 गांव पूरी तरह से जलमग्न होने का खतरा था. आदिवासियों का कहना था कि नदी जोड़ने की परियोजना की लागत 10,211 करोड़ रुपए है और अगर सरकार सौराष्ट्र और कच्छ में सिंचाई के लिए बड़े बांध बनाना चाहती है तो उन्हें वहां इन बांधों को विकसित करना चाहिए. यहां बांध बनाने और वहां पानी लेने का कोई मतलब नहीं है.


आदिवासी नेताओं का यह भी कहना है कि केंद्र ने नर्मदा योजना की विफलता को छिपाने के लिए परियोजना को डिजाइन किया है. परियोजना के परिणामस्वरूप डांग, वलसाड और तापी जिलों में सैकड़ों आदिवासी विस्थापित होंगे. सागौन, बांस और अन्य लकड़ियों से भरपूर डांग के जंगल जलमग्न हो जाएंगे. आदिवासी नेताओं का कहना है कि उन्होंने नर्मदा योजना, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, उकाई आदि कई परियोजनाएं देखी हैं, जहां आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित होने के लिए मुआवजा दिया जाना बाकी है.

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