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पूर्व जस्टिस मदन बी. लोकुर बोले- राजद्रोह से भी ज्यादा ख़तरनाक है यूएपीए का प्रावधान

Published On :    23 May 2022   By : MN Staff
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पूर्व जस्टिस ने कहा, राजद्रोह में कुछ अपवाद थे जहां राजद्रोह के आरोप लागू नहीं किए जा सकते. लेकिन यूएपीए की धारा 13 के तहत कोई अपवाद नहीं हैं. यदि यह प्रावधान बना रहता है, तो यह खराब से बदतर स्थिति में जाने जैसा होगा.राज्य असंतोष के रूप में क्या देखता है, यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है, यह बहुत खतरनाक है क्योंकि यूएपीए के तहत जमानत प्राप्त करना कठिन है.



नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मदन बी. लोकुर ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून (यूएपीए) के एक प्रावधान के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा कि यह ‘खराब से बदतर स्थिति में जाने’ जैसा है. यूएपीए का प्रावधान राजद्रोह से भी ज्यादा ख़तरनाक है. पूर्व न्यायाधीश जस्टिस लोकुर यह बात कहीं. वे ‘राजद्रोह से आजादी’ कार्यक्रम में शीर्ष अदालत द्वारा पारित अंतरिम आदेश के मायने समझाने की कोशिश कर रहे थे.  


पूर्व जस्टिस ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि सरकार राजद्रोह के प्रावधान के बारे में क्या करेगी लेकिन मेरी राय में वह इसे हटा देगी. लेकिन उतना ही चिंताजनक यूएपीए में धारा 13 का एक समानांतर प्रावधान है जो कहता है कि जो कोई भी भारत के खिलाफ असंतोष पैदा करने का इरादा रखता है.’ राजद्रोह में यह सरकार के खिलाफ असंतोष है, लेकिन यूएपीए प्रावधान में यह भारत के खिलाफ असंतोष है, बस यही अंतर है.


राजद्रोह में कुछ अपवाद थे जहां राजद्रोह के आरोप लागू नहीं किए जा सकते. लेकिन यूएपीए की धारा 13 के तहत कोई अपवाद नहीं हैं. यदि यह प्रावधान बना रहता है, तो यह खराब से बदतर स्थिति में जाने जैसा होगा.राज्य असंतोष के रूप में क्या देखता है, यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है, यह बहुत खतरनाक है क्योंकि यूएपीए के तहत जमानत प्राप्त करना कठिन है.


शीर्ष अदालत ने आजादी से पूर्व के राजद्रोह कानून के तहत देश में सभी कार्यवाहियों पर तब तक के लिए रोक लगा दी है जब तक कि कोई ‘उपयुक्त’ सरकारी मंच इसकी फिर से जांच नहीं करता और निर्देश दिया कि केंद्र और राज्य अपराध का हवाला देते हुए कोई नई प्राथमिकी दर्ज नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने 11 मई के अपने आदेश में राजद्रोह के मामलों में जांच पर रोक लगा दी थी तथा देश भर में राजद्रोह कानून के तहत लंबित मुकदमों और सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी थी.


पूर्व जस्टिस ने कहा, ‘देश भर में लंबित मुकदमे और राजद्रोह कानून के तहत सभी कार्यवाहियों पर यह यथास्थिति एक नुकसानदेह हिस्सा है. मान लीजिए कि एक व्यक्ति जो निर्दोष है, लेकिन राजद्रोह के तहत उसके खिलाफ झूठा मामला दर्ज किया गया है और चाहता है कि मुकदमा पूरा हो जाए, तो उसे कुछ समय इंतजार करना होगा.’


उन्होंने कहा, ‘इसी तरह अगर किसी को राजद्रोह के तहत दोषी ठहराया जाता है और उसने अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर की है तो उसे भी इस तरह की यथास्थिति को हटाए जाने तक इंतजार करना होगा.’ लोकुर ने कहा कि बेहतर होता अगर शीर्ष अदालत ने इस यथास्थिति का आदेश नहीं दिया होता और इसके बजाय ऐसे लोगों को राहत देने के लिए एक तंत्र तैयार करना चाहिए था.


उन्होंने युवा पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि का उल्लेख किया, जिनके पासपोर्ट पर रोक लगा दी गई और वह कोपेनहेगन के एक शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए नहीं जा सकीं. क्योंकि उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया था. पूर्व जस्टिस लोकुर ने कहा, ‘जो लोग राजद्रोह के प्रावधान का सामना कर रहे हैं उन्हें कुछ सुरक्षा की आवश्यकता है, क्योंकि यदि उनके मुकदमे पर रोक लगा दी जाती है तो उन्हें निर्णय आने के लिए अनिश्चितकाल तक इंतजार करना होगा. यह यथास्थिति आदेश कुछ समस्या पैदा कर सकता है.’

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