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एफआईआर आधारित ख़बर पर मानहानि का मुक़दमा पत्रकार की आवाज़ को दबाना हैः हाईकोर्ट

Published On :    26 Jun 2022   By : MN Staff
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2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट को लेकर लोकमत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रमुख विजय दर्डा और संपादक राजेंद्र दर्डा को आईपीसी की धारा 500 के तहत मानहानि करने के आरोपी बनाए गए थे.



नई दिल्ली : एफआईआर की सामग्री पर आधारित एक तथ्यात्मक समाचार रिपोर्ट मानहानिकारक नहीं है और इस स्थिति में रिपोर्टर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पत्रकार की आवाज को दबाने और उसे अपनी खबर वापस लेने के लिए मजबूर करने का एक प्रयास है. एक सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने यह बात कहीं.



लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट को लेकर लोकमत मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रमुख विजय दर्डा और संपादक राजेंद्र दर्डा को आईपीसी की धारा 500 के तहत मानहानि करने के आरोपी बनाए गए थे. अब हाईकोर्ट के जस्टिस विनय जोशी ने दोनों के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दी. कोर्ट ने कहा कि अगर पत्रकारों को एफआईआर पर रिपोर्टिंग करने से रोका जाता है तो उस परिस्थिति में वे मामले में अंतिम फैसला आने तक उस मामले पर रिपोर्ट ही नहीं कर पाएंगे, जिसका मतलब होगा कि जनता घटनाओं के बारे में जानने के अपने अधिकार से वंचित हो जाएगी.



पीठ ने कहा, ‘संपादक की जिम्मेदारी सही तथ्यों को प्रकाशित करना है, इसके अलावा और कुछ नहीं. खबर प्रकाशित होने से पहले एफआईआर की सच्चाई की जांच करने और मामले की पड़ताल करने की प्रकाशक से उम्मीद नहीं की जाती है.’ अदालत ने आगे कहा, ‘ऐसी खबरों पर मानहानि की शिकायत दर्ज कराना रिपोर्टर्स को चुप कराने, उनकी आवाज दबाने और उन्हें मामले में आरोपी और कथित तौर पर बदनाम हुए व्यक्ति के खिलाफ जबरन खबर वापस लेने का प्रयास करने के अलावा और कुछ नहीं है.’


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मामले को लेकर कोर्ट ने कहा, ‘इसमें कोई शक नहीं है कि अफवाह के आधार पर या सुनी गई जानकारी के आधार पर बिना सच्चाई के प्रकाशित खबर पत्रकार के लिए घातक है. ऐसा नहीं है कि एफआईआर दर्ज नहीं की गई है या यहां भ्रामक खबरें प्रकाशित की गई है.



दरअसल शिकायतकर्ता रविंद्र गुप्ता ने आरोप लगाया था कि उनके खिलाफ लोकमत में छपा एक लेख झूठा था और अखबार के द्वारा बिना कोई पुष्टि किए छापा गया था. गुप्ता ने दावा किया कि वे कथित अपराध के घटित होने के समय अपराध स्थल पर नहीं थे और उनका नाम बाद में आरोप-पत्र से बाहर निकाल दिया गया था.



गौरतलब है कि मीडिया के खिलाफ हुए मानहानि के मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए कहा था कि  प्रेस की बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी ‘पूर्ण’ होनी चाहिए. ‘कुछ गलत रिपोर्टिंग’ होने पर मीडिया को मानहानि के लिये नहीं पकड़ा जाना चाहिए. सीजेआइ दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चन्द्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ ने एक पत्रकार और मीडिया हाउस के खिलाफ मानहानि की शिकायत निरस्त करने के पटना हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए यह बात कहीं थी.

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