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नोबेल पुरस्कार विजेता की तल्ख टिप्पणी, बोले- देश में मौजूदा हालात बन गए हैं डर की वजह

Published On :    2 Jul 2022   By : MN Staff
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अमर्त्य सेन ने गुरुवार को कहा, ‘मुझे लगता है कि अगर कोई मुझसे पूछता है कि मैं किसी चीज से भयभीत हूं तो मैं कहूंगा ‘हां’. अब भयभीत होने की वजह है. देश में मौजूदा हालात डर की वजह बन गए हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं किया जाना चाहिए.



कोलकाता : नोबेल पुरस्कार विजेता और प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भारत में मौजूदा हालात पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा देश के हालात ने उन्हें भयभीत कर दिया है, यह देखते हुए कि ‘विभाजनों से निपटने में न्यायपालिका की भूमिका सीमित है और यह ‘असाधारण’ है कि औपनिवेशिक काल के कानूनों का इस्तेमाल आज के समय में लोगों को जेल में डालने के लिए किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि लोगों का धार्मिक आधार पर बंटवारा नहीं किया जाना चाहिए. साथ ही कहा कि लोगों को एकता बनाए रखने की दिशा में काम करना चाहिए.


अमर्त्य सेन ने गुरुवार को कहा, ‘मुझे लगता है कि अगर कोई मुझसे पूछता है कि मैं किसी चीज से भयभीत हूं तो मैं कहूंगा ‘हां’. अब भयभीत होने की वजह है. देश में मौजूदा हालात डर की वजह बन गए हैं.’ उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक आधार पर विभाजन नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा, ‘मैं चाहता हूं कि देश एकजुट रहे. मैं ऐसे देश में विभाजन नहीं चाहता, जो ऐतिहासिक रूप से उदार था. 


हमें एक साथ मिलकर काम करना होगा.’ उन्होंने कहा कि भारत केवल हिंदुओं या मुसलमानों का नहीं हो सकता. उन्होंने देश की परंपराओं के आधार पर एकजुट रहने की आवश्यकता पर जोर दिया. सेन ने कहा, ‘भारत केवल हिंदुओं का देश नहीं हो सकता. साथ ही अकेले मुसलमान भारत का निर्माण नहीं कर सकते. हर किसी को एक साथ मिलकर काम करना होगा.’


वायर के अनुसार, उन्होंने कहा कि इस समय केवल सहिष्णुता से काम नहीं चलेगा. उन्होंने कहा, भारत में सहिष्णुता की एक अंतर्निहित संस्कृति है लेकिन वक्त की जरूरत है कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ काम करें. सेन ने भारत की सहिष्णुता की संस्कृति के उदाहरण का हवाला दिया कि यहूदी, ईसाई और पारसी युगों से भारत में सह-अस्तित्व में हैं. उन्होंने उपासना स्थलों को लेकर हुए हालिया विवादों पर कहा कि उन्होंने सोचा भी नहीं था कि हिंदू एक समूह के रूप में ‘ताजमहल का श्रेय लेने में सक्षम होंगे.



यह भी पढ़े : ‘सरना’ को आदिवासियों के धर्म के तौर पर मान्यता दे केंद्र सरकार, आदिवासियों की मांग



उन्होंने कहा, ‘शाहजहां के सबसे बड़े बेटे दारा शिकोह ने 50 उपनिषदों का मूल संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया और इससे दुनिया को हिंदू धर्मग्रंथों, हिंदू संस्कृति और हिंदू परंपराओं के बारे में जानने में मदद मिली. रविशंकर और अली अकबर खान के राग और संगीत विभिन्न धर्मों के लोगों के साथ आने का प्रमाण हैं. आज के भारत में ऐसे सहयोग की जरूरत है, यहां (केवल) सहिष्णुता की बात करने से समाज के बंटने के खतरों का समाधान नहीं होगा.’ उन्होंने जोड़ा कि भारत में सहिष्णुता की संस्कृति रही है, जिसके कारण ही यहूदी, ईसाई और पारसी यहां बरसों से साथ रहते आए हैं. अपने संबोधन में सेन ने न्यायपालिका और उसकी निष्क्रिय भूमिका की भी आलोचना की.


उन्होंने कहा, ‘भारतीय न्यायपालिका अक्सर विखंडन के खतरों की अनदेखी करती है, जो डराने वाला है. एक सुरक्षित भविष्य के लिए न्यायपालिका, विधायिका और नौकरशाही के बीच संतुलन होना जरूरी है, जो भारत में नदारद है. यह असामान्य है कि लोगों को सलाखों के पीछे डालने के लिए औपनिवेशिक कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.’ सेन पहले भी उन कानूनों के खिलाफ मुखर रहे हैं जो असहमति जताने वालों की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाते हैं.

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