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डॉ. अम्बेडकर ने पुनः अपना जीवन एक बैरिस्टर के रूप में शुरू किया।

Published On :    14 Apr 2018   By : MN Staff
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इस प्रकार वह शोषित अस्पृश्य एवं तिरस्कृत समाज के मसीहा बनकर समता, स्वतन्त्रता और भाई चारे के कर्म युद्ध में जुट गए। उन्होंने सवर्ण समाज से अछूतां शोषितों को मुक्त कराने की रणनीति तैयार की।



इस प्रकार वह शोषित अस्पृश्य एवं तिरस्कृत समाज के मसीहा बनकर समता, स्वतन्त्रता और भाई चारे के कर्म युद्ध में जुट गए। उन्होंने सवर्ण समाज से अछूतां शोषितों को मुक्त कराने की रणनीति तैयार की। 


कोर्ट, कचहरी में बाबासाहब अछूतां के सामाजिक बहिष्कार, शोषण, छुआ-छूत के अनके दृश्य देखते और स्वंय भी अपमान भरा जीवन जीते फिर भी सवर्ण कानून वेत्ता महत्वपूर्ण मुकदमां के हल के लिए रात्रि के अंधकार में बाबासाहब के घर राय-मशविरा करने आते। 


बाबासाहब सवर्ण मानसिकता को भली-भाँति जान चुके थे। उन्हांने तथागत बुद्ध, संतकबीर, और राष्ट्रपिता जोतिराव फुले की सामाजिक क्रान्ति से गहरा सबक लिया था जिसके कारण संघर्ष ही उनका जीवन बन चुका था। 


शोषित समाज में जाग्रति पैदा करने के लिए बाबासाहब ने संघर्ष की प्रथम लड़ाई में 19 मार्च 1927 को सार्वजनिक स्थानां पर जाने की तथा कुँए-तालाबां से पानी भरने की खुली छूट प्राप्त करने के सम्बन्ध में ‘‘चावदार तालाब’’ पर सत्याग्रह किया। 


उन्होंने उपस्थित अछूत सामाजिकों में उत्साह जगाते हुए बताया कि सार्वजनिक स्थानों, कुंआ-तालाब, मन्दिर आदि में कुत्ते-बिल्ली आ जा सकते हैं, पानी पी सकते हैं किन्तु अछूतां को इन्सान होकर भी यह अधिकार नहीं है। 


यह मानवता के साथ घोर अन्याय ही नहीं अपराध भी है जिसका ‘‘अत्यज संघ’’ के माध्यम से संगठित होकर मुकाबला करना चाहिए। उन्हांने अछूतां की शिक्षा के लिए ‘प्यूपिल एजूकेशन सोसाइटी’’ का गठन कर उपरोक्त तालाब के पास पर्याप्त स्थान पर कॉलेज की स्थापना की जिसमें आज भी हजारों अछूत विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करते हैं। 


सामाजिक संघर्ष की प्रक्रिया में चौबीस हजार अछूतां के संगठन से ‘महाड़ तालाब’ पर जलाई ‘मनुस्मृति’ से सवर्ण बौखला उठे। उन्होंने डा. अम्बेडकर की ऐसी प्रतिक्रिया पर तरह-तरह की साजिशें रचीं।


डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर ने ऐसे कई कार्य हमारे मूलनिवासी, शोषित समाज के लिए किए हैं हमारी आने वाली पीढ़ी दर पीढ़ी डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी का कर्ज नहीं उतार सकती है। 


डॉ. अम्बेडकर बुद्ध धर्म के सिद्धान्तां से इतने प्रभावित हो चुके थे कि उन्हांने बुद्ध धम्म की महानता एवं पवित्रता पर कई ग्रंथों की रचना की जिनमें 04 दिसम्बर 1956 को ‘‘द बुद्धा एण्ड कार्लमार्क्स’’ ग्रंथ का अन्तिम अध्याय पूर्ण कर टाइप कर दिया तथा 05 दिसम्बर 1956 को पूर्व लिखित ग्रंथ ‘‘द बुद्ध एण्ड हिज धम्मा’’ के टाइप्ड प्रीफेश को पूर्वानुमति से घर-घर जा कर जैन नेताओं के समूह को पढ़कर सुनाया। 



रात्रि को भोजन के उपरान्त मूलनिवासियां के मसीहा, मानवता के हित चिन्तक, ज्ञान एवं प्रकाश के स्तम्भ, बुद्ध धम्म के सच्चे अनुयायी, भारतीय संविधान के जनक, उदारचित दया और ममता के रक्षक महामानव बाबासाहब की यूरेशियन विदेशी ब्राह्मणों ने षड्यंत्र पूर्वक बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की 06 दिसम्बर 1956 को हत्या कर दी और कराहती मानवता के सच्चे मसीहा हमेशा के लिए चिर निद्रा में सो गये जिनके जीवन संघर्ष से प्रेरणा लेकर हमें आजादी के आन्दोलन में जुटना चाहिए।

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