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लोकतंत्र में यूरेशियन ब्राह्मणों के पूँजीवाद का डंका

Published On :    22 Jul 2019   By : MN Staff
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तथाकथित आजादी के 70 वर्ष बाद भी आज भारत में पूँजीतंत्र पूरी तरह लोकतंत्र पर हावी है. दिखने में, सुनने में, कहने में लोकतंत्र है, परन्तु वास्तविक स्थिति बिल्कुल भिन्न है.



देश में 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में 60 प्रतिशत ब्राह्मणों को टिकट देकर पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने लोकतंत्र की जगह ब्राह्मणतंत्र की स्थापना कर दिया. जिसमें, भारत के यूरेशियन पूँजीपतियों ने पूर्ण सहयोग किया. विडला समूह इसका जीता-जागता उदाहरण है. 1951 में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल न लागू होने पर इस्तीफा दे दिया था. 


उस वक्त धन्नासेठ मारवाडियों सहित स्वामी कर पात्रीजी माधवाचार्य, जयेन्द्र सरस्वती सभी ब्राह्मणवादियों ने बाबासाहब का जबरदस्त विरोध किया था. उसका कारण स्पष्ट था कि बेटियों को पिता के जायदाद मे बेटों के बराबर हिस्सा मिलना चाहिए एवं नारियों को भी चुनाव लड़ने एवं वोट डालने का हक पुरूषां के बराबर मिलना चाहिए. परन्तु, भारत के ब्राह्मणवादी पूँजीपतियों ने हिन्दू कोड बिल पारित नहीं होने दिया. तथाकथित आजादी के 70 वर्ष बाद भी आज भारत में पूँजीतंत्र पूरी तरह लोकतंत्र पर हावी है. दिखने में, सुनने में, कहने में लोकतंत्र है, परन्तु वास्तविक स्थिति बिल्कुल भिन्न है. कारण भारत की ब्राह्मण-बनिया मीडिया नित नये-नये तरीको से इस देश के मूलनिवासियों को भ्रमित करने का काम करती हैं


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9 मार्च 2017 को मीडिया में यह बताया गया कि विजय माल्या को विदेश न जाने पर पास पोर्ट जब्त होना चाहिए. ऐसी खबर सभी अखबारों में छपी, मीडिया पर दिखाया गया, परन्तु 10 मार्च 2016 के अखबारां में छपा कि विजय माल्या 2 मार्च को विदेश भाग गया. आज तक न्यूज चैनल पर दिखाया गया कि वह अपने लंदन के घर में सुरक्षित है. उसकी फोटो कई लड़कियां के साथ दिखायी गयी. लड़कियां के साथ अलिंगन करते हुए भी दिखाया गया, यानी यही समाचार सभी चैनलां पर सुबह 8 बजे रात तक चलता रहा. 


भारत के 17 बैंकां से लगभग 9000 करोड़ का कर्ज लेकर भाग गया. मेहुल चोकसी, नीरव मोदी सहित कईयों ने देश को लूटा और फरार हो गये. मैं भारत सरकार से पूछना चाहती हूँ कि बैंकां को क्या-क्या अधिकार दिये गये है? क्या एक वक्त पर कई बैंकां से कर्ज लिया जा सकता है? क्या एनओसी इन बेईमान पूँजीपतियां पर लागू नहीं होती है? क्या सरकारें कानून एवं संविधान का दुरूपयोग नहीं कर रही है? लगातार 125 संसोधन कर संविधान को समाप्त करने की साजिश नहीं की जा रही है? इस बात में तो कोई दो राय ही नहीं है कि देश की ब्राह्मणवादी सरकारें संविधान में संशोधन करते-करते संविधान को लगभग खत्म कर दिया है.


2004 से 2015 तक राजनैतिक सांठ-गांठ करके देश के 5000 पूँजीपतियां को 6 लाख करोड़ रूपये का लोन लगभग 2 दर्जन राष्ट्रीयकृत बैंकां ने बिना जाँच-पड़ताल के ही दे दिया और देश का चोर चौकीदार ने उन 5000 पूँजीपतियों को विदेश भगाने में भरपूर मदद किया. आज केवल 44 कम्पनियां पर 4.78 लाख करोड़ रूपया बैंकां का बकाया है. एक रिपोर्ट में बताया गया था कि केवल दिसम्बर 2015 तक 4.45 लाख करोड़ बैड लोन दिया गया और इसमें कोई भी मानक पूरा नहीं किया गया. भारतीय रिर्जव बैंक गर्वनर रघुराजन ने कहा भी था कि आबीआई के जरिये उन तमाम डिफाल्टरां की घोषणा की जा सकती है. परन्तु, भारत की ब्राह्मण-बनिया मीडिया केवल विजय-माल्या के बारे में वह भी आधा-अधूरा सच बताती रही. 


2010 से 2015 तक 36 लाख करोड़ रूपया इस देश के पूँजीपतियां को आर्थिक मंदी के नाम पर खैरात में बांट चुकी है. 5.89 लाख करोड़ 2015 में मोदी सरकार ने पूँजीपतियां को दे दिया है. अगर, 2018 की बात करें तो आज के समय में यह आंकड़ा और ज्यादा बढ़ गया है. आज भारत की आर्थिक स्थिति कितना ज्यादा खराब है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है. हालांकि इससे समझने में कुछ आसानी होगी कि एनपीए के कारण भारत में मैनु फैक्चरिंग सेक्टर ठप्प हो चुकी है. 


सरकार के सरकारी उपक्रमां का नीजिकरण धड़ल्ले से किया जा रहा है. मोदी सरकार ने बीते पाँच सालों में  जहाँ बैंक, रेलवे, 400 रेलवे स्टेशनां और हवाई अड्डों का नीजिकरण कर चुकी है तो वही दूसरी ओर कई सरकारी कंपनियों और सरकारी नौकरियों में खाली पड़े पदों को भी समाप्त कर चुकी है. यानी मेरे सपाट शब्दों में मोदी सरकार ने पूरी तरह से देश को देशी-विदेशी पूँजीपतियां को सौपने का खाका तैयार कर चुकी है. भारत में 17.68 लाख विदेशी कम्पनियांं में अब तक 30 हजार विदेशी कम्पनियाँ आ भी चुकी हैं. 


जैसे बीते पाँच सालों में मोदी सरकार के मेक इन इण्डिया पर सवालिया निशान लगते रहे वही दशा आज भी बना हुआ है. इसके बाद भी मोदी सरकार, उसके भड़वे-दलाल, मेक इन इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, स्किल इण्डिया, क्लीन इण्डिया, र्स्टाटप इण्डिया, स्टैन्ड इण्डिया की तारीफ करते नहीं थकते हैं. चूंकि ब्राह्मण-बनिया मीडिया ने तो पूरी ठेकेदारी ही ले रखी है.


अभी आप लोगों ने हाल ही में देखा होगा कि मोदी सरकार की, जनधन योजना, मुद्रा योजना, बेटी बचाओं योजना, किसान फसल बीमा योजना, अटल पेंशन योजना मात्र छलावा साबित हुए हैं. हकीकत में यह मूलनिवासियां को भ्रमित करने के लिए प्रचार-प्रसार किया जा रहा है. जिससे भारत का मूलनिवासी इन सब योजनाओं की बात करता रहे और असल मुद्दा गायब हो जाय. और इसी की आड़ में शासक वर्ग देश को लूटता रहे. यही इन विदेशी ब्राह्मणां का राष्ट्रवाद है.


सवाल तो यह है कि जब 36 लाख करोड़ रूपये देश के पूँजीपतियां को बांट दिया तो फिर पूँजीपतियों को बैंकां से लोन लेने की क्या जरूरत आ पडी?़ देश के किसानां के प्रति ऐसी संवेदनशीलता क्यां नहीं दिखाई? आज देश का 60 प्रतिशत किसान घुट-घुटकर जीवन बिता रहा है, कभी ओलावृष्टि, तो कभी बाढ़ तो कभी सूखे और तो और लाखां किसान कर्ज के बोझ से दबे होने के कारण आत्महत्या कर चुके हैं इसके बाद भी उनकी हत्महत्या का सिलसिला जारी है. 


किसान यदि बैंकां से कर्ज लेता है और समय से ऋण न चुका सका तो बैंक अपने गुण्डां को भेज देती है, उसे जेलां में बंद करवा देती है, उनके घर और जमीनों की कूर्की करा देती है. लेकिन, वहीं पूँजीपतियों को अरबो का कर्ज देने के बाद भी उनसे वसूली नहीं करती हैं. बल्कि उनको कर्ज देकर उनको देश से भी भगा देते हैं. इसके बाद भी विपक्ष का नाटक करने वाली कांग्रेस भी उसके खिलाफ आंदोलन नहीं करती है. 


जैसे कांग्रेस बीजेपी के विरोध में केवल हवाहवाई बयानबाजी करती है, ठीक यही रवैया भारत में समस्त ब्राह्मणवादी दलों में है. भाजपा, कांग्रेस, माकपा, भाकपा, आप तृणमूल कांग्रेस, अन्ना दुमक्र सहित एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. इन सभी दलां का डीएनए एक है. आज अर्न्तराष्ट्रीय बजट में कच्चे तेल की कीमत पानी से भी कम है, मगर इसको मोदी मीडिया द्वारा चरम पर दिखाकर पेट्रोल-डीजल के दामों में बेतहासा बढ़ोत्तरी कर रहे हैं. 


जबकि, 2014 से लेकर 2018 तक चार बार अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल में कमी आयी, इसके बाद भी भारत में पेट्रोल-डीजल में महंगाई चरम पर ही रही. जो नतीजा 2014 में वही वही आज भी है. बीते पाँच सालों में अरबो-खरबों का घोटाला किया है उसका हिसाब किताब इस देश की जनता को कौन देगा? कान खोलकर सुन लेना, कांठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. भारत का मूलनिवासी एससी, एसटी, ओबीसी एवं मायनॉरिटी जाग चुका है, पाई-पाई का हिसाब लेगा.


माया बगाटे
सामाजिक कार्यकर्ता (भोपाल)

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