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मनुष्य धर्म के लिए नहीं, बल्कि धर्म मनुष्य के लिए बना है : डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर

Published On :    7 Oct 2019   By : MN Staff
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बाबासाहब अम्बेडकर ने 14 तारीख को नहीं, अशोक विजयादश्मी को ध्यान में रखते हुए अशोक विजयादशमी का दिन चुना था. डॉ.अम्बेडकर द्वारा धम्म दीक्षा समारोह के लिए अशोक विजयादशमी का ही दिन क्यों चुना?



लेख: डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर 14 अक्टूबर 1956 को लाखों अनुयायियों के साथ नागों की प्रवित्र भूमि नागपुर में बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की. इस धम्म दीक्षा समारोह को 63 साल पूरे होने जा रहे हैं. डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने 14 तरीख ही क्यों चुना? क्योंकि, 1956 में 14 अक्टूबर को अशोक विजयादशमी का दिन था. 


इसलिए बाबासाहब अम्बेडकर ने 14 तारीख को नहीं, अशोक विजयादश्मी को ध्यान में रखते हुए अशोक विजयादशमी का दिन चुना था. डॉ.अम्बेडकर द्वारा धम्म दीक्षा समारोह के लिए अशोक विजयादशमी का ही दिन क्यों चुना? बाबासाहब डॉ.अम्बेडकर ने 1951 में केन्द्रीय मंत्री मंडल से अपने विधिमंत्री पद का इस्तीफा दिया था. इस्तीफा देने के पश्चात उनके पास 1956 तक समय ही समय था. 


वे 1951 से लेकर 1956 के बीच धर्म परिवर्तन कर सकते थे. मगर, उन्होंने 1956 को ही धर्म परिवर्तन क्यों किया? बहुत सारे लोग यह सोचते हैं कि बाबासाहब ने 14 तारीख के महत्व को ध्यान में रखकर धर्म परिवर्तन किया, इसलिए 14 तारीख को ही धम्मचक्र प्रवर्तन दिन मनाना चाहिए. जबकि, यह गलत सोच है. 


दरअसल, बौद्ध धम्म में अशोक विजयादशमी का एक ऐतिहासिक महत्व है. सबसे बड़ी बात यह है कि 1956 में 14 तारीख को अशोक विजयादशमी को 2,500 साल पूरे होने जा रहे थे. इसलिए बाबासाहब अम्बेडकर मूलनिवासी बहुजनों को उस विरासत के साथ जोड़ देना चाहते थे. इसलिए बाबासाहब ने 14 अक्टूबर 1956 को धम्म दीक्षा ली.


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पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गई प्रतिक्रांति के संबंध में बाबासाहब ने 6 जून, 1950 को कोलंबो (श्रीलंका) में दिये अपने भाषण में कहते हैं ‘‘ब्राह्मणी शासनाधिकार की एक बहुत बड़ी घटना मौर्य साम्राज्य का पतन होने में दिखायी देती है. भारतीय इतिहासकारों ने इस महान घटना को महत्व नहीं दिया, यह खेदजनक बात है. 


मूलतः यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी घटना है’’ पुष्यमित्र नामक एक ब्राह्मण अंतिम मौर्य सम्राट राजा बृहद्रथ का सेनापति था और पुष्यमित्र का गुरू पतंजली था. पतंजली ने बौद्धों से ही योग विद्या ग्रहण की थी, किन्तु बाद में वह बौद्धों का दुश्मन बन गया. पतंजली की सलाह पर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ की हत्या की और मौर्य वंश की जगह अपने शृंगवंश के नाम से राज स्थापित किया. 


इसके बाद पुष्यमित्र शुंग ने पुनः ब्राह्मण धर्म की स्थापना करने के लिए बौद्ध भिखुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया. यही नहीं, पुष्यमित्र शुंग ने नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों में आग दी. बताया जाता है कि वह आग छः महीने से ज्यादा दिन तक जलती रही. जिसके कारण बौद्ध धम्म भारत से लुप्त हो गया और ब्राह्मण राज की स्थापना हुई. 


इस प्रतिक्रांति के बाद इस देश में ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हुआ. ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित होने के बाद रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, गीता आदि ब्राह्मणी ग्रंथां की रचना की गई. असल में रामायण का राम एक काल्पनिक पात्र है. हकीकत यह है कि राम कोई और नहीं पुष्यमित्र शुंग ही है और रावण जिसे लोग दशानन अर्थात दश सिर वाला कहते हैं वह कोई और नहीं राज बृहद्रथ है जो मौर्य वंश का दसवाँ और अंतिम शासक था. 


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जिसकी छल-कपट से पुष्यमित्र ने हत्या कर दी थी. लेकिन, ब्राह्मणों ने प्रतिक्रांति के बाद पुष्यमित्र शुंग को ‘राम’ के रूप में नायक के तौर पर सामने रखकर लोगों के सामने प्रस्तुत कर दिया. इसी तरह से राजा बृहद्रथ मौर्य को रावण के रूप में प्रस्तुत कर दिया और रामायण के नाम से प्रचारित किया कि राम ने रावण का वध किया था. इसलिए खुशी में हर साल दशहरा (विजयदश्मी) को त्योहार के रूप में मनाया जाता है. हर साल दशहरा के दिन रावण के पुतले को जलाकर जश्मन मनाया जाता है.


जबकि, असल में यह सब एकदम बकवास है. क्योंकि, दशहरा (विजयदश्मी) का कोई भी संबंध रामायण से नहीं है. बल्कि, विजयदश्मी का नाम अशोक विजयदश्मी है. चूंकि, ऊपर ही बताया जा चुका है कि रामायण का राम पुष्यमित्र शुंग और रावण मौर्य राजा बृहद्रथ है. इसलिए राम और रावण को मानने की बात ही गलत है. क्योंकि, अगर रावण को मानते हैं तो हमें राम को भी मानना होगा. 


कुल मिलाकर अशोक विजयादशमी और उसके महत्व को खत्म करने के लिए एक वैकल्पिक कार्यक्रम खड़ाकर रावण दहन की परंपरा शुरू कर दी. अगर, मूलनिवासी बहुजन समाज के लोग रावण को मानते हैं तो उनके अनुसार ‘रावण दहन’ के नाम पर वे अपने ही पुरखे को जलाकर खुश होते हैं और जश्न मनाते हैं. इस तरह से ब्राह्मणों ने रामायण सहित कई अनर्गल ग्रंथ लिखकर ब्राह्मण धर्म को मजबूत कर लिया. 


जबकि, धर्म परिवर्तन करने के पीछे अपने मकसद को जाहिर करते हुए डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर कहते हैं कि ‘‘मैंने धर्म परिवर्तन इसलिए किया, क्योंकि मुझे समता, स्वतंत्रता, भाईचारा और न्याय चाहिए’’ उपरोक्त चारों बातें मुझे तथागत बुद्ध के विचारों में दिखायी देती है, इसलिए मैंने बुद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की है. इसलिए, डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर कहते हैं कि ‘‘मनुष्य धर्म के लिए नहीं है, बल्कि धर्म मनुष्य के लिए है’’  



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