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विदेशी ट्रिब्यूनल के कामकाज पर एमनेस्टी ने उठाए गंभीर सवाल

Published On :    30 Nov 2019   By : MN Staff
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कहा- लोगों में फैली है दहशत



नई दिल्ली : मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भारतीय अधिकारियों और अदालतों पर असम में विदेशी ट्रिब्यूनल की अदालतों के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े किए है. उनके अनुसार असम में विदेशी ट्रिब्यूनल की वजह से लोगों में दहशत फैली हुई है. एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया ने बुधवार को एक अपनी एक रिपोर्ट में कहा, विदेशी ट्रिब्यूनलों को अदालतों, भारत सरकार और असम सरकार द्वारा जवाबदेह नहीं ठहराया गया है.


एजेंसी के अध्यक्ष आकार पटेल के अनुसार पिछले 15 वर्षों से विदेशी ट्रिब्यूनलों ने असम में लोगों को अपनी नागरिकता से वंचित रखने के मामले में कहर बरपाया है. विदेशी ट्रिब्यूनलों पर टिप्पणी करते हुए आकार पटेल ने कहा, देखिये विदेशी ट्रिब्यूनल अदालत नहीं है. 


ये सिविलियन लोग हैं जो तय करते हैं कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं है.’’उनके अनुसार ट्रिब्यूनल के लोगों को सरकार ये टारगेट देती है कि वो कितने लोगों को भारतीय नागरिक ना घोषित करे और अगर उनका टारगेट पूरा नहीं होता है तो उन्हें हटा दिया जाता है.



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असम में 19 लाख लोगों को नागरिक सूची से बाहर कर दिया गया था जो इस फै़सले को विदेशी ट्रिब्यूनल में चैलेंज करते हैं. आकार पटेल कहते हैं कि जिन लोगों को नागरिक सूची से बाहर किया गया है उनमे हिन्दू, मुस्लिम, सिख और एससी सहीत सभी संप्रदायों के लोग शामिल हैं लेकिन आकार पटेल के अनुसार नागरिक संशोधन बिल के पारित होने के बाद निशाने पर केवल मुस्लिम समुदाय होगा.


इस बिल में इस बात का प्रावधान है कि अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आकर बस गए हिंदुओं, सिखों और ईसाईयों को नागरिकता दे दी जाएगी लेकिन मुसलमानों को नहीं. उन्होंने कहा, जो मुसलमान नहीं हैं उन्हें अवैध शहरियों के नामों की लिस्ट से निकाला जाएगा.


एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय नागरिकों को उनके नाम में छोटी-मोटी गलतियों के कारण विदेशी घोषित किया गया है. बीबीसी से बात करते हुए आकार पटेल ने कहा कि उनकी टीम ने असम में सैकड़ों ऐसे नागरिकों से बातें की है जिनको विदेशी घोषित कर दिया गया है. इनमें से एक रिपोर्ट में एक अबू बकर सिद्दीक़ी से इंटरव्यू किया गया है जिन्हें इस वजह से विदेशी घोषित किया गया था क्योंकि उनके दादा का नाम एक दस्तावेज में एपर अली और दूसरे में एफर अली था.


रिपोर्ट में कहा गया है, विदेशियों के न्यायाधिकरणों के सामने आने वाले लोगों को निष्पक्ष परीक्षण सुरक्षा और मानवाधिकारों की गारंटी नहीं दी जाती है, जो कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 से प्रभावित होते हैं, जो नागरिकों और विदेशियों दोनों पर लागू होते हैं.
बता दे की भारत सरकार की एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने हाल में बेंगलुरु स्थित एमनेस्टी के कार्यालय पर छापेमारी की थी. मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्थाओं ने इसकी कड़ी निंदा की थी.



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