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मोदी सरकार के ही ऐलान से घटी कर चुकाने वालों की संख्या : सर्वे

Published On :    14 Feb 2020   By : MN Staff
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देश के प्रधानमंत्री का काम देश का विकास करना होता है, लेकिन भारत का पहला ऐसा प्रधानमंत्री है जो देश का विनाश कर रहा है.



मुम्बई : देश के प्रधानमंत्री का काम देश का विकास करना होता है, लेकिन भारत का पहला ऐसा प्रधानमंत्री है जो देश का विनाश कर रहा है. क्योंकि, मोदी सरकार के एक ऐलान से टैक्स भरने वालों की संख्या महज एक ही साल में 1.83 करोड़ कम हो गई. 


जबकि, नरेंद्र मोदी ने 12 फरवरी को टाइम्स नाउ समिट में 130 करोड़ की आबादी वाले देश में सिर्फ 1 फीसदी लोगों के टैक्स चुकाने पर हैरानी जताते हुए कहा था कि देश में सिर्फ 1.5 करोड़ लोग ही टैक्स अदा करते हैं. अगर, उनमें 20 साल से अधिक आयु के लोगों की बात करें तो यह 1.6 प्रतिशत ही होता है. इससे देश को लगा कि पीएम के इस बयान के बाद टैक्स देने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी, लेकिन, हैरान करने वाला आंकड़ा यह है कि टैक्सपेयर्स की संख्या बढ़ने की बजाय बीते एक साल में घटकर आधी हो गई है.


आंकड़ों के मुताबिक, असेसमेंट ईयर 2018-19 में 3.29 करोड़ लोगों ने इनकम टैक्स चुकाया था. लेकिन, वहीं 2019-20 में यह आंकड़ा 55 फीसदी घटते हुए 1.46 करोड़ पर आ गया. आखिर, टैक्स चुकाने वाले लोगों की संख्या में 1.83 करोड़ की यह कमी कैसे आ गई? दरअसल, 2019-20 के लिए 1 फरवरी को पेश किए गए अंतरिम बजट में मोदी सरकार ने 2.5 लाख से 5 लाख रुपये या उससे कम की आय वाले लोगों को टैक्स से छूट दे दी थी.


सरकार ने बजट में ऐलान किया था कि 2.5 लाख से लेकर 5 लाख रुपये या उससे कम कमाने वाले लोगों को इनकम टैक्स रिटर्न तो फाइल करना होगा, लेकिन टैक्स की कोई देनदारी नहीं होगी. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के ही शुरुआती अनुमानों के मुताबिक आईटीआर फाइल करने वाले देश के 1.8 करोड़ लोगों ने इस प्रावधान के जरिए अपनी टैक्सेबल इनकम जीरो बताई है. साफ है कि बजट में दी गई छूट के चलते ही बड़ी संख्या में लोग टैक्स के दायरे से बाहर हो गये.



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आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर तक देश में 5.7 करोड़ लोगों ने आईटीआर फाइल किया, जिनमें से 4.3 करोड़ लोगों ने अपनी कमाई 5 लाख रुपये तक ही बताई है. ये वो लोग हैं, जिन्होंने आईटीआर तो फाइल किया है, लेकिन कोई टैक्स नहीं दिया है. जबकि, 2018-19 में जीरो टैक्स वाले लोगों की संख्या 2.2 करोड़ थी. यानी इस छूट का सबसे ज्यादा फायदा केवल उच्च तत्सम जातियों और पूंजीपतियों को हुआ है. इसके बाद ही सरकार पहले से ही कारपोरेट घरानों के लिए टैक्स कम करते आई है.



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