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कोरोना के नाम पर देश में लॉकडाउन कर विवादित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही सरकार

Published On :    25 Mar 2020   By : MN Staff
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जहां एक तरफ पूरा भारत (और दुनिया) कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार की कोशिशें कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने अपने महत्वाकांक्षी और विवादित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए दिल्ली मास्टर प्लान में संशोधन को मंजूरी देते हुए नोटिफिकेशन जारी कर रही है.



नई दिल्ली : जहां एक तरफ पूरा भारत (और दुनिया) कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए विभिन्न प्रकार की कोशिशें कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय ने अपने महत्वाकांक्षी और विवादित सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के लिए दिल्ली मास्टर प्लान में संशोधन को मंजूरी देते हुए नोटिफिकेशन जारी कर रही है. यही नहीं सरकार लॉकडाउन के ही बीच अयोध्या में राममंदिर निर्माण और एनपीआर को भी शुरू कर रही है. 


इस हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट का बजट 20,000 करोड़ रुपये का है. एक महामारी से लड़ते हुए पूरे भारत के लॉकडाउन में चले जाने के बावजूद इस तरह के नोटिफिकेशन जारी करना ये दर्शाता है कि आखिर मोदी सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं. असल में कोरोना सरकार के लिए एक बहुत बड़ा बहाना मिल गया है. इसलिए सरकार कोरोना की आड़ में अपना हर एजेंडा जो आरएसएस ने सरकार को दिया है उसे पूरा करने की कोशिश कर रही है. कोरोना के ही आड़ में शाहीनबाग में विगत दो महीनों से चल रहे सीएए, एनआरसी और एनपीआर विरोधी आंदोलन को कुचलने में सरकार सफल हुई है.



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सूत्रों ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक चार स्क्वायर किमी. क्षेत्र में स्थित कई ऐतिहासिक इमारतों का पुनर्निर्माण और पुनर्विकास किया जाएगा. पांच प्लॉटों के लिए लैंड यूज में संशोधन किया गया है, जिसमें मौजूदा संसद के बगल में नया संसद भवन और प्रधानमंत्री के लिए नया आवास बनाने का प्रस्ताव शामिल है. बीते 20 मार्च को जारी किए गए नोटिफिकेशन में कहा गया है कि केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल दिल्ली-2021 के मास्टर प्लान और जोन-डी एवं जोन-सी के जोनल डेवलपमेंट प्लान (इंडिया गेट के बाहरी क्षेत्र पर प्लॉट नंबर 08 के लिए) में प्रस्तावित संशोधनों पर दिल्ली विकास प्राधिकरण ने आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए थे. 


इसमें कहा गया है कि प्रस्तावित संशोधनों के संबंध में 1,292 आपत्तियां और सुझाव प्राप्त हुए और डीडीए द्वारा गठित बोर्ड ऑफ इंक्वायरी एंड हियरिंग द्वारा इस पर विचार किया गया. इसके बाद केंद्र ने दिल्ली मास्टर प्लान 2021 और जोनल डेवलपमेंट प्लान में संशोधन करने का निर्णय लिया और नोटिफिकेशन जारी कर अब इसकी पुष्टि कर दी गई है.



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नोटिफिकेशन के अनुसार नया संसद भवन एक त्रिकोणीय भूखंड पर आएगा, जिसे मौजूदा संसद के विपरीत प्लॉट नंबर 2 पर निर्माण के लिए निर्धारित किया गया है. यह 9.5 एकड़ भूमि क्षेत्र में फैला होगा. पहले इस जगह को ‘जिला पार्क’ के लिए आवंटित किया गया था. संयोग से पिछले साल अगस्त में नरेंद्र मोदी ने भारत की आजादी के 75 वें वर्षगांठ के मौके पर 2022 तक में एक नए संसद के निर्माण की बात की थी. इससे पहले साल 2015 में तत्कालीन स्पीकर सुमित्रा महाजन ने तत्कालीन केंद्रीय शहरी विकास मंत्री एम. वेंकैया नायडू को पत्र लिखकर एक नया संसद भवन बनाने की मांग की थी.


उन्होंने कहा था कि मौजूदा इमारत की हालत ठीक नहीं है और यह कर्मचारियों, सुरक्षा, मीडिया आगंतुक और संसदीय गतिविधियों की बढ़ती मांगों को पूरा करने में सक्षम नहीं है. संसद भवन को ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने डिजाइन किया था और इसका निर्माण 1921 में शुरू होने के छह साल बाद पूरा हुआ था. इस इमारत में आजादी से पहले इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल था. सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को ऐतिहासिक इमारतों को हानि पहुंचाने और बेवजह हजारों करोड़ों रुपये को खर्च करने के रूप में देखा जा रहा है.



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बता दें कि मोदी सरकार अब तक कई ऐसे प्रोडक्ट तैयार कर चुकी है जिस पर अरबों रूपये खर्च हुए है, जबकि, उस प्रोडक्ट का कोई भी काम नहीं है. लेकिन, वहीं जिसकी देश में ज्यादा जरूरत है जैसे अस्पताल, कॉलेज, चिकित्सा सुविधा, रोजगार आदि इस पर सरकार कोई कदम नहीं उठा रही है. 


नतीजा सामने है आज देश में महामारी से जूझ रहा है इस दौर में भी सरकार डॉक्टरों को न तो बॉडी कीट (पीपीई) मुहैया करा रही है और न ही मास्क, दास्ताने जैसे कई मेडिकल सुरक्षा उपकरण. इस कारण डॉक्टर बड़े-बड़े डस्टबीन में डालने वाले प्लास्कि को बॉडी कवर (पीपीई) बनाकर पहनने को मजबूर हो रहे हैं. जबकि, कारवां पत्रिका के अनुसार मोदी सरकार यह जानते हुए की भारत में इस महामारी से निपटने के लिए उसके पास कोई भी मेडिकल सुरक्षा उपकरण नहीं पर्याप्त रूप से नहीं है. इसके बाद भी सरकार भारत में निर्माण होने वाले सुरक्षा उपकरणों का दूसरे देशों में निर्यात करती रही.



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