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आत्मनिर्भता के नाम पर कर्जनिर्भता पर जा पहुंचा भारत

Published On :    21 May 2020   By : MN Staff
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कोरोना महामारी के संकट से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था कर्ज के दलदल में फंस चुकी थी. अब इस संकट के बाद नए कर्ज बांटने से इसका बुरा हाल होना तय है.



नई दिल्ली : कोरोना महामारी के संकट से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था कर्ज के दलदल में फंस चुकी थी. अब इस संकट के बाद नए कर्ज बांटने से इसका बुरा हाल होना तय है. हालांकि, सरकार की मंशा भी यही बता रही है कि देश और जनता का सत्यानाश हो जाए.कोरोना के संक्रमण से भय और अनिश्चितता का माहौल, बेमौसम बरसात और देश में पहले से व्याप्त आर्थिक मंदी कोढ़ में खाज की तरह साबित होती जा रही है. 


वित्त वर्ष 2020 की तीसरी तिमाही में देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 4.7 फीसदी पर आ गई जो कि पिछले 11 वर्ष में सबसे कम रही. पिछले 7 वर्ष में व्यक्तिगत उपभोग की दर सबसे निचले स्तर पर रही, नए निवेश की दर पिछले 17 साल में सबसे कम रही, विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 15 साल में सबसे कम रही और खेती की विकास दर पिछले 4 वर्ष में सबसे कम रही. जनवरी 2019 में यदि कृषि कार्यों को करने हेतु कर्ज लेने की दर 7.6 फीसदी थी तो जनवरी 2020 में वो 6.5 फीसदी पर आ गई. ठीक वैसे ही जनवरी 2019 में यदि औद्योगिक कार्यों को करने हेतु कर्ज लेने की दर 5.2 फीसदी थी तो जनवरी 2020 में वो 2.5 फीसदी पर आ गई. इसी तरह से सेवा क्षेत्र में जनवरी 2019 में यदि कर्ज लेने की दर 23.9 फीसदी थी तो जनवरी 2020 में वो 8.9 फीसदी पर आ गई. नोटबंदी के बाद से ही देश की अर्थव्यवस्था बीमारू हालत में चली गई.


यही नहीं फरवरी 2020 में देश में बेरोजगारी दर 45 वर्ष में सबसे ज्यादा हो गई जो कि 7.78 फीसदी थी. वहीं रुपये के मुकाबले डॉलर सबसे निचले स्तर पर है. निर्यात और आयात का अनुपात बढ़ता चला जा रहा है जिसका बोझ देश के भुगतान संतुलन पर पड़ेगा. सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दामों में कमी आने की वजह से थोड़ी सांस मिली है. जबकि, वर्ष 2020-21 के बजट मे वर्ष 2019 20 के बजट के मुकाबले केंद्र सरकार ने केंद्रीय जनकल्याण योजनाओं के मद में 38,968 करोड़ रुपये, खाद्य योजनाओं में 68650 करोड़ों रुपये और किसानों को मिलने वाली खाद सब्सिडी पर 8,687 करोड़ रुपये और मनरेगा के बजट में 9,502 करोड़ की कटौती की गई. साथ ही ग्रामीण क्षेत्र की अन्य योजनाओं में सरकार ने दो हजार करोड़ रुपये की कटौती की. इस संक्रमण से उपजे हालातों की वजह से विश्व में मंदी का दौर रहेगा और भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा.



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असल में यदि पहले से ही भारत की अर्थव्यवस्था बेहतर होती तो देश कुछ बेहतर तरीके से संक्रमण से उपजे हालातों को नियंत्रित कर सकता था. कोरोना संक्रमण और लॉकडाउन की वजह से बहुत-सी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं मानती हैं कि देश की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर शून्य या नकारात्मक हो जाएगी जो बहुत ही चिंता का विषय है. केंद्र सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए और देश के नागरिकों को राहत देने हेतु 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की. पैकेज की अभी तक की घोषणाओं में सबसे बड़ा हिस्सा बैंकों से मिलने वाले कर्ज का है.


हालात यह हैं कि बैंकों से कर्ज लेने की दर 27 साल में सबसे कम है. देश में मार्च 2020 तक बैंकों का कर्ज ने रूप में उद्योगों पर 56 लाख करोड़ रुपये (इसमें 83 फीसदी बकाया कर बड़े उद्योगों पर है) छोटे उद्योगों पर 10 लाख करोड़ रुपये (जो कर्ज माफी या कर्ज के पुनर्गठन की मांग कर रहे हैं) 12 लाख करोड़ रुपये खेती और लगभग 26 लाख करोड़ रुपये के निजी कर्ज हैं. मध्यमवर्ग पहले ही वेतन कटौती और नौकरियां छूटने की समस्या से जूझ रहा जिसकी वजह से कर्ज अदायगी एक बड़ी समस्या होगी. इस वजह से बैंकों को डर इस बात का है कि अब दिए गए कर्ज की किस्तें टूटनी शुरू हो जाएंगी.



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पुराने कर्ज न दे पाने की स्थिति में नए कर्ज कौन लेगा और इससे आत्मनिर्भरता कैसे बढ़ेगी सरकार इस प्रश्न का जवाब नहीं दे पा रही. हड़बड़ी में दिए गए कर्ज की वजह से बैंकों में घोटाले भी बढ़ेंगे और कर्ज डूबने की स्थिति में बैंकों की वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ेगा. देश में 6 करोड़ 30 लाख सूक्ष्म, मध्यम लघु उद्योग हैं. एमएसएमई सेक्टर में 45 लाख उद्योगों को तीन लाख करोड़ रुपये बिना किसी गारंटी के लोन देने की बात कही गई है. 


सरकार का पैकेज और सरकारी कंपनियों पर बकाया भुगतान स्वयं बहुत कुछ कहता है. इस पैकेज की घोषणा करने से पहले सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए था कि वर्ष 2019 दिसंबर में एमएसएमई सेक्टर को दिए गए कुल लोन का 12.6 फीसदी यानी 2 लाख 3 हजार करोड़ रुपये एनपीए होने की तरफ बढ़ गया था. इस क्षेत्र के बाकी बचे हुए उद्योगों के लिए सरकार के पास क्या कार्य योजना है इस पर कोई स्पष्टता नहीं दिखती. साथ ही इस क्षेत्र में कार्य करने वाले 11 करोड़ कर्मचारियों के हितों को लेकर भी सरकार खामोश है.



बता दें कि महामारी के संकट से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था कर्ज के दलदल में फंस चुकी थी, अब कोरोना संकट के बाद नए कर्ज बांटने से अर्थव्यवस्था का बुरा हाल होना तय है. 20 लाख के पैकेज में 70 फीसदी हिस्सा कर्जीय व्यवस्था का है. उद्योगों व देश के नागरिकों के लिए मुद्रा की तरलता के साथ-साथ सरकार को इस तरह के राजकोषीय उपाय करने चाहिए जिनसे देश के नागरिकों की जेब में सीधा पैसा जाए. इससे स्पष्ट है कि सरकार भारत को आत्मनिर्भर भारत बनाने की जगह कर्ज निर्भर भारत बनाना चाहती है.


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