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शिक्षा पर खर्च के मामले में 136वें स्थान पर भारत

Published On :    31 Jul 2020   By : MN Staff
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एजुकेशन पर जीडीपी का 6 पर्सेंट खर्च करके भी कई छोटे देशों से पीछे रहेगा भारत



नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020 को मंजूरी देने के साथ ही शिक्षा पर देश की जीडीपी का 6 फीसदी हिस्सा खर्च करने का डंका पीट रही है. लेकिन, हकीकत में इसके उलट ही होने वाला है. अगर मोदी सरकार के बीते लगभग 6 साल के कार्यकाल में देखें तो मोदी सरकार साल दर साल शिक्षा के बजट में लगातार कटौती करते आ रही है. यदि शिक्षा पर खर्च कुल जीडीपी की बात करें तो मोदी सरकार के 2014-15 से लेकर 2019-20 तक 2.8 से लगभग 3 प्रतिशत ही खर्च हुआ है. जबकि, कांग्रेस सरकार भी 2.1 से 3 प्रतिशत से ज्यादा खर्च करने की जहमत नहीं उठाई है. वहीं अब नई शिक्षा लागू कर जीडीपी का 6 प्रतिशत र्खच करने का दम्भ भर रही है. 


असल में सरकार नई शिक्षा लागू कर सरकार एक तरह से मूलनिवासी बहुजन समाज के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर कर रही है. क्योंकि नई शिक्षा नीति के अंर्तगत सरकारी स्कूलों में पाँचवीं कक्षा तक अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जायेगी, जिससे मूलनिवासी समाज के बच्चे अंग्रेजी शिक्षा से दूर हो जायेंगे. जबकि इसके पहले ही सरकार कक्षा आठवीं तक परीक्षा खत्म कर दिया है. वहीं दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों में एल केजी से ही अंग्रेजी पढ़ाई जाती है, जिसमें पढ़ने वाले बच्चे सबसे ज्यादा उच्च तत्सम जाति के हैं.


सूत्रों ने बताया कि पीएम मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने शिक्षा के बजट को जीडीपी के 6 पर्सेंट तक किए जाने को मंजूरी दी है.हालांकि, मीडिया भी जोरों शोरों से होहल्ला मचा रहा है. मीडिया बता रहा है कि अब तक यह करीब 4 फीसदी ही रहा करता था, इस लिहाज से देखें तो यह बड़ा इजाफा है. असल में कांग्रेस और बीजेपी के कार्यकाल के इतिहास शिक्षा पर 4 प्रतिशत खर्च किया ही नहीं गया है. अगर आंकड़ा देखें तो 3 प्रतिशत से भी कम खर्च होता रहा है.


बता दें कि भले ही केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने शिक्षा पर जीडीपी के 6 फीसदी हिस्से को खर्च करने की बात कही है, लेकिन अब भी यह कई देशों के मुकाबले बहुत कम है. खासतौर पर भारत में शिक्षा और साक्षरता की स्थिति को देखते हुए जिस तरह से सुधार की जरूरत है, उसके मुकाबले यह बजट भी बहुत कम दिखाई देता है. अगर अन्य देशों की तुलना करें तो क्यूबा, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देश शिक्षा पर खर्च के मामले में भारत से कहीं कई गुना आगे हैं. 


एजुकेशन और हेल्थ को लेकर दुनिया भऱ में चर्चित क्यूबा इस पर जीडीपी का 12.8 पर्सेंट हिस्सा खर्च करता है. वहीं फिनलैंड 6.9 फीसदी, स्वीडन 7.7 पर्सेंट, बोत्सवाना 9.6 पर्सेंट, ब्राजील 6.2 पर्सेंट, बुर्किना फासो 6 फीसदी और पाकिस्तान 2.9 पर्सेंट यह 2017 का आंकड़ा है. इसके अलावा जर्मनी 4.8 फीसदी, इजरायल 5.8 पर्सेंट और यूनाइटेड किंगडम 5.5 पर्सेंट खर्च करते हैं. ये आंकड़े वर्ल्ड बैंक के डाटा पर आधारित है.

खर्च में कंजूसी...साल दर साल शिक्षा बजट में कटौती
शिक्षा पर खर्च के मामले में भारत की स्थिति बहुत ज्यादा संतोषजनक नहीं है. क्योंकि, सरकारें साल दर साल शिक्षा बजट में कटौती करते आ रही हैं. नतीजन शिक्षा पर खर्च के मामले में भारत दुनिया में 136वें स्थान पर जा पहुंचा है. आज शिक्षा को न केवल घटिया स्तर पर पहुंचा दिया है, बल्कि शिक्षा को पूरी तरह से चौपट ही बना दिया गया है. अगर भारतीय शिक्षा पर खर्च होने वाले कुल जीडीपी की बात करें तो 2013-14 में शिक्षा पर कुल जीडीपी का 3.1 प्रतिशत खर्च किया जाता था जो 2014-15 में यही खर्च 2.8 प्रतिशत हो गया. इसी तरह से 2015-16 में यही खर्च 2.4 प्रतिशत पर आ गया. 



हालांकि, 2016-17 में 2.8 प्रतिशत और 2017-18 में इसमें थोड़ी वृद्धि हुई और यह आंकड़ा 2.9 प्रतिशत पर आ गया है. वहीं 2018-19 में 3 प्रतिशत और 2019-20 में 3.4 प्रतिशत खर्च करने का दावा किया जा रहा है. बताते चलें कि मई, 2019 को जारी सरकार की नई शिक्षा नीति के मसौदे में 2030 तक, कुल सरकारी खर्च के 10 फीसदी से 20 फीसदी तक शिक्षा पर खर्च बढ़ाने का सुझाव दिया गया. लेकिन भारत के वर्तमान शिक्षा बजट में इतनी वृद्धि के लिए कोई धन उपलब्ध नहीं हुआ. बल्कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य और केंद्रीय शिक्षा के वित्त के विश्लेषण के अनुसार, 2015 के बाद से मुद्रास्फीति के सुधार के बाद स्कूली शिक्षा पर सरकारी खर्च वास्तव में कम हो गया है.



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