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लॉकडाउन में कितने प्रवासी मजदूर मारे गए इसका सरकार के पास नहीं कोई डेटा

Published On :    14 Sep 2020   By : MN Staff
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कोरोनो वायरस का संक्रमण रोकने के लिए 25 मार्च से देशभर में लगाए गए लॉकडाउन की मार सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूरों पर पड़ी. लॉकडाउन लगाए जाने की वजह से कंपनियां और कारखाने बंद हो गए.



नई दिल्ली : कोरोनो वायरस का संक्रमण रोकने के लिए 25 मार्च से देशभर में लगाए गए लॉकडाउन की मार सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूरों पर पड़ी. लॉकडाउन लगाए जाने की वजह से कंपनियां और कारखाने बंद हो गए. यही नहीं तो असंगठित और निर्माण क्षेत्र साथ ही छोटे छोटे उद्योग बंद हाने से लाखों मजदूरों के पास रोजगार नहीं था. जिसके चलते उन्हें हजारों किमी की दूरी पार कर अपने अपने घर वापस जाने को मजबूर होना पड़ा. 


इस दौरान कई हादसे भी हुए जिसमें बहुत से मजदूरों ने अपनी जान गवाई. लेकिन हैरान करने वाली बात यह हैं की सरकार के पास इसका कोई डेटा नहीं हैं. यह जानकारी संसद में पुछे एक सवाल के जवाब में सामने आई हैं.


 लोकसभा में सवाल पूछे गए थे की कोरोना वायरस की महामारी को रोकने के लिए 68 दिनों के लॉकडाउन में कितने मजदूरों की मौत हुई? इसके जवाब में केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने बताया कि वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए किए गए 68-दिन के लॉकडाउन में कितने मजदूर मारे गए इसका सरकार के पास कोई डेटा नहीं है.



यह भी पढ़े : बढ़ते भ्रष्टाचार को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट करे हस्तक्षेप, याचिकाकर्ता की मांग



लोकसभा में सवाल पूछा गया था की महामारी के चलते पूरे देश में किए गए लॉकडाउन के दौरान कितने प्रवासी मजदूरों ने अपनी जान गवाई इसका आंकड़ा केंद्र सरकार के पास है और क्या राज्यवार मृतकों की संख्या उपलब्ध है? यह भी पूछा गया कि क्या पीड़ितों को सरकार ने कोई मुआवजा या आर्थिक सहायता दी?  इस सवाल पर केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने बताया कि वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए किए गए 68-दिन के लॉकडाउन में कितने मजदूर मारे गए इसका सरकार के पास कोई डेटा नहीं है. 


सरकार से जब पूछा गया कि ‘‘क्या सरकार ने पीड़ित परिवारों को कोई मुआवजा या आर्थिक सहायता प्रदान की है.’’ इसपर मंत्रालय ने कहा कि चूंकि इस तरह का डेटा सरकार के पास नहीं है, इसलिए पीड़ितों के परिजनों को मुआवजा देने का कोई सवाल ही नहीं था. एक अन्य सवाल प्रवासी श्रमिकों को हुई परेशानी का अनुमान लगाने में सरकार की विफलता को लेकर पूछा गया था.



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बता दें कि 30 मई की हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार 9 से 27 मई के बीच श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में 80 मजदूरों की मौत हो गई थी. लाखों प्रवासी श्रमिकों को शहरों से उनके गांवों में पहुंचाने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था की गई थी. रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स से उपलब्ध डेटा के मुताबिक जान गंवाने वालों में 4 से 85 साल की उम्र तक के लोग थे. इसके अलावा ऐसे कई प्रवासी मजदूर हैं जिनकी मौत दुर्घटना, भूखमरी़़़, लंबा चलने से आई थकान, या अन्य वजह से हुई.



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