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आईडीबीआई बैंक को बेचने की तैयारी

Published On :    12 Jun 2018   By : MN Staff
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पहले पूर्व की यूपीए सरकार ने देश के सरकारी बैंकों का निजीकरण करना शुरू किया अब वहीं काम वर्तमान की एनडीए सरकार भी कर रही है।



मुम्बई: पहले पूर्व की यूपीए सरकार ने देश के सरकारी बैंकों का निजीकरण करना शुरू किया अब वहीं काम वर्तमान की एनडीए सरकार भी कर रही है। इसके बाद भी लोग यह कहते नहीं अघाते हैं कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। 


आज देश में सभी बैंकों का निजीकरण करने के लिए सरकारें किस तरह से षड्यंत्र कर रही हैं इसका अंदाजा लगाना आम जनता के बस की बता नहीं है। देश के सरकारी बैंकों का निजीकरण करने से पहले सरकार उनका या तो दिवाला ही निकाल रही है या तो भ्रष्टाचार का शिकार बना रही हैं और बाद में घाटे का शिकार बनाकर उसको निजी कपंनियों के हवाले कर रही है। 


इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केंद्र ने भारी घाटे और खराब कर्ज के बोझ तले दबे सरकारी बैंकों में सुधार की प्रक्रिया के नाम आईडीबीआई बैंक को बेचने की तैयारी कर ली है।


आईडीबीआई बैंक के निजीकरण के प्रस्ताव में एक विकल्प इसकी 86 फीसदी हिस्सेदारी एलआईसी जैसे सरकारी उपक्रम को बेचने की है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि मुंबई में शुक्रवार को वरिष्ठ बैंकरों और अधिकारियों की बैठक में इस प्रस्ताव पर चर्चा की गई। 


हालांकि एलआईसी अकेले आईडीबीआई के शेयर नहीं खरीद सकती। उस पर किसी एक कंपनी में अधिकतम 15 फीसदी शेयर खरीदने की शर्त लागू है। एलआईसी के पास आईडीबीआई के 10.82 प्रतिशत हिस्सेदारी पहले से ही है। 


दूसरा प्रस्ताव सरकार की हिस्सेदारी को 50 फीसदी से नीचे लाए जाने का भी है। सरकार ने मई में ही बैंक में अपने अंशधारिता 80.96 फीसदी से बढ़ाकर 85.96 फीसदी की थी। हालांकि पूंजी के संकट से जूझ रहे आईडीबीआई बैंक ने कई अन्य माध्यमों से पूंजी जुटाकर वित्तीय स्थिति सुधारने की कवायद शुरू की है।


निजीकरण के बाद सरकार पर घाटे और एनपीए से जूझ रहे आईडीबीआई को दोबारा पूंजी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी नहीं होगी। सरकार का उद्देश्य निजीकरण के जरिये बैंक के बोर्ड को पेशेवर बनाना है, ताकि बैंक के कामकाज में सुधार के साथ जवाबदेही लायी जा सके। 


यदि देखा जाए तो केवल सुधार की सफाई दी जा रही है, जबकि पूरा माजरा बैंक को बेचने की है। कई सरकारी बैंकों के बीच विलय की खबरें भी तेज हैं। गौरतलब है कि केंद्र ने बैंकों को पुनर्पूंजीकरण के तहत इस साल 85 हजार करोड़ मुहैया कराने हैं, लेकिन इन बैंकों का घाटा ही 87 हजार करोड़ रुपये पहुंच गया है।


आईडीबीआई एकमात्र ऐसा सरकारी बैंक है, जो बैंक राष्ट्रीयकरण कानून के दायरे में नहीं है। इससे सरकार के लिए उसमें अपना हिस्सा बेचना आसान होगा और कानून में बदलाव की जरूरत भी नहीं होगी। आईडीबीआई बैंक का घाटा पिछले एक साल में 62 फीसदी बढ़ा है। 


वित्तीय वर्ष 2016-17 में उसका नुकसान 5158 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2017-18 में 8237 करोड़ रुपये हो गया है। उसका एनपीए भी इस दौरान 32 फीसदी बढ़कर 55 हजार 588 करोड़ रुपये पहुंच गया है। 


रिजर्व बैंक पीएनबी, सिंडिकेट समेत छह और सरकारी बैंकों को त्वरित सुधार प्रक्रिया (पीसीए) के तहत ला सकता है। जबकि 21 में से 11 सरकारी बैंक पहले ही पीसीए के दायरे में हैं।



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