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लद्दाख मामले पर रिपोर्टिंग करना पीटीआई को पडा भारी, प्रसार भारती ने खत्म कर दिया करार

Published On :    17 Oct 2020   By : MN Staff
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लद्दाख में चीनी घुसपैठ की रिपोर्टिंग करना और दोनो देशों के राजदूत की वार्ता को प्रसारित करना न्यूज एजेंसी पीटीआई को महंगा पड़ा है. केंद्र के स्वामित्व वाली संस्था प्रसार भारती ने न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) को पत्र लिखकर अपना करार खत्म कर दिया है.



नई दिल्ली : लद्दाख में चीनी घुसपैठ की रिपोर्टिंग करना और दोनो देशों के राजदूत की वार्ता को प्रसारित करना न्यूज एजेंसी पीटीआई को महंगा पड़ा है. केंद्र के स्वामित्व वाली संस्था प्रसार भारती ने न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) को पत्र लिखकर अपना करार खत्म कर दिया है. 15 अक्टूबर को लिखे पत्र में प्रसार भारती ने पीटीआई को बताया कि उसके बोर्ड ने मल्टीमीडिया सेवाओं के लिए घरेलू समाचार एजेंसियों से नए प्रस्ताव मंगवाने का फैसला किया है.


गैरतलब है की प्रसार भारती अपने समाचार सब्सक्रिप्शन के लिए पीटीआई को सालाना 6.85 करोड़ रुपये का भुगतान कर रहा है. इसके साथ ही प्रसार भारती ने एक अन्य न्यूज एजेंसी यूएनआई से भी करार समाप्त करने का फैसला किया है.

उल्लेखनीय हैं की इस साल जून महीने में प्रसार भारती के वरिष्ठ अधिकारी ने लद्दाख मामले को लेकर पीटीआई की कवरेज की निंदा कर उसे देशद्रोही करार दिया था. पीटीआई के अधिकारी को पत्र लिखकर उनकी न्यूज कवरेज को राष्ट्रहित के लिए हानिकारक बताया था. पत्र में जिक्र किया गया था कि पीटीआई को समय-समय पर कई बार उनकी संपादकीय खामियों के बारे में बताया गया, जिस वजह से गलत खबरों का प्रसार हुआ और इससे जनहित को हानि पहुंची.

दरअसल 2014 से वरिष्ठ मंत्रियों के साथ संबंध खट्टे होना शुरू हुए. वहीं, संघ परिवार के लोग पीटीआई की कवरेज स्वतंत्रता को लेकर नाराज थे. पीटीआई पर सरकार की तरफ से पहला आधिकारिक दबाव 2016 में उस समय डाला गया, जब प्रसार भारती ने एकतरफा घोषणा कर कहा कि वह पीटीआई को इसकी 9.15 करोड़ रुपये की वार्षिक सदस्यता फीस का सिर्फ 75 फीसदी ही भुगतान करेगा. 



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पीटीआई के चेयरमैन होरमूसजी कामा ने 2016 में द वायर को बताया था, पीटीआई में हम स्वतंत्रता को महत्व देते हैं और इसका मतलब है कि हमें सभी राजनीतिक दलों से स्वतंत्र होना होगा- फिर चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा.

इस साल जून महीने में उस समय मामला अधिक बिगड़ा, जब सरकार पीटीआई के भारत में चीन के राजदूत और चीन में भारत के राजदूत के साक्षात्कारों से नाराज हो गई. प्रसार भारती के एक अधिकारी ने उस समय संवाददाताओं से कहा था, पीटीआई की देशविरोधी रिपोर्टिंग अब संबंधों को जारी रखने के लिए संभव नहीं है. 


सरकार को लगता है कि लद्दाख मामले पर चीनी राजदूत का साक्षात्कार नहीं लिया जाना चाहिए था. भारतीय राजदूत विक्रम मिस्री के साथ पीटीआई के साक्षात्कार से साउथ ब्लॉक की काफी किरकिरी हुई थी क्योंकि मिस्री ने चीन की घुसपैठ पर टिप्पणी की थी और उनके इसी बयान को पीटीआई ने ट्वीट किया था.  असल में विक्रम मिस्री का बयान प्रधानमंत्री के उन दावों से विपरीत था, जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की सीमा में किसी ने प्रवेश नहीं किया.



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द वायर की खबर के अनुसार प्रसार भारती 2016 बाद से पीटीआई को सिर्फ 75 फीसदी ही भुगतान कर रहा है. दोनों संगठनों के संबंधों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि प्रसार भारती पर पीटीआई का लगभग 11 करोड़ रुपये बकाया है.

बता दें कि पीटीआई देशभर में संवाददाताओं और फोटोग्राफरों का एक बड़ा नेटवर्क है. इसकी सेवाओं को देश में सभी प्रमुख समाचार संगठनों के लिए अनिवार्य समझा जाता है. साथ ही भारतीय मीडिया द्वारा पीटीआई को अभी भी समाचार के लिए पहली पसंद समझा जाता है. सरकार के लिए पीटीआई कवरेज का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि एजेंसी की रिपोर्ट्स बड़े पैमाने पर ऐसे कई अख़बार और टीवी स्टेशन लेते हैं, जिनका सूचना के लिए खुद का कोई स्रोत नहीं है.


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