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कॉरपोरेट लोन के चलते डुबा 94 साल पुराना लक्ष्मी विलास बैंक

Published On :    20 Nov 2020   By : MN Staff
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सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक को चुना लगाने के बाद अब कॉरपोरेट क्षेत्र की नजर नीजी बैंकों की तरफ जा रही हैं. जिसके चलते पीएमसी, येस और अब 94 साल पुराना लक्ष्मी विलास बैंक डुबने की कगार पर है. जिसकी प्रमुख वजह कॉरपोरेट द्वारा लिया गया लोन ना चुकाना हैं.



नई दिल्ली : सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक को चुना लगाने के बाद अब कॉरपोरेट क्षेत्र की नजर नीजी बैंकों की तरफ जा रही हैं. जिसके चलते पीएमसी, येस और अब 94 साल पुराना लक्ष्मी विलास बैंक डुबने की कगार पर है. जिसकी प्रमुख वजह कॉरपोरेट द्वारा लिया गया लोन ना चुकाना हैं. 


इसके अलावा दूसरी वजह यह रही कि बैंक ने अपनी आर्थिक हैसियत से ज्यादा लोन बांट दिए. बैंक ने बड़ी संख्या में मिड साइज कंपनियों को कॉरपोरेट लोन बांट दिए, जिनके फंसने पर बैंक की मुश्किले और बढ़ी. दरअसल इस बैंक ने इन्फ्रास्ट्रक्चर, पावर, रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन और टेक्सटाइल्स जैसे एक दर्जन सेक्टर्स को बड़े पैमाने पर लोन बांट दिए थे.

इन कॉरपोरेट लोन्स के चलते ही बैंक के पतन की शुरुआत हुई थी. येस बैंक की असफलता की बात करें तो उसे भी रिस्की सेक्टर्स को बड़े पैमाने पर लोन बांटे और संकट में फस गई. इसी तरह लक्ष्मी विलास बैंक ने भी 2007 से 2010 के दौरान इन्फ्रास्ट्रक्चर, मेटल्स, कंस्ट्रक्शन और रियल एस्सेट सेक्टर बड़े पैमाने पर दांव लगा दिया. बैंक ने यह ध्यान नहीं दिया कि कितना लोन देना उसके लिहाज से ठीक रहेगा. इसके बाद आई मंदी की वजह से बैंक की पूंजी फंसती गई. जो बैंक डुबने का मुख्य कारण बन गई.



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दरअसल बैंकिंग सेक्टर में लोन के बिजनेस की बात करें तो कॉरपोरेट ऋण आसान टारगेट हैं, जबकि रिटेल लोन के बिजनेस में कड़ी प्रतिस्पर्धा है. ऐसे में बैंक तेज ग्रोथ के लिए कॉरपोरेट लोन का रुख करते हैं, लेकिन उसमें रिस्क भी अधिक है. 2007 से 2010 के दौरान बैंक की लोन बुक का अमाउंट लगभग दोगुना होते हुए 3,612 करोड़ रुपये से बढ़कर 6,277 करोड़ रुपये हो गया.



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एक तरफ अर्थव्यवस्था में पहले जैसी स्थिति नहीं थी तो दूसरी बैंक ने लोन में और इजाफा कर लिया. मार्च 2010 में बैंक की लोन बुक का अमाउंट 6,277 करोड़ रुपये था, लेकिन मार्च 2013 में यह बढ़कर 11,702 करोड़ रुपये हो गया. इसमें भी सबसे ज्यादा लोन इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को दिया गया था. 2010 में इस सेक्टर के पास 588 करोड़ रुपये का लोन था, जो मार्च 2013 में बढ़कर 1,059 करोड़ रुपये हो गया. इसके अलावा बैंक ने फार्मा, मेटल्स ट्रेडिंग, इंजीनियरिंग और सीमेंट कंपनियों को भी जमकर लोन दिए. यही वजह थी कि बैंक का एनपीए लगातार बढ़ता गया और वसूली ना होने के चलते बैंक डूबने के कगार पर पहुंच गया.


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