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असम में एक पोलिंग बुथ पर कुल 90 वोटर, पड़े 171 वोट, चुनाव आयोग के पास हैं कोई जवाब

Published On :    6 Apr 2021   By : MN Staff
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साल 2014 के लोकसभा चुनाव से लगातार ईवीएम पर सवाल उठाए जा रहे है, लेकिन चुनाव आयोग मानता ही नहीं की ईवीएम में गडबडी की जा सकती है. जैसे जैसे देश में कोई चुनाव होता है वैसे वैसे अब ईवीएम में गडबडी का भंडाफोड हो रहा है.



गुवाहटी : साल 2014 के लोकसभा चुनाव से लगातार ईवीएम पर सवाल उठाए जा रहे है, लेकिन चुनाव आयोग मानता ही नहीं की ईवीएम में गडबडी की जा सकती है. जैसे जैसे देश में कोई चुनाव होता है वैसे वैसे अब ईवीएम में गडबडी का भंडाफोड हो रहा है. 


हालही में असम में विधानसभा चुनाव के दौरान एक पोलिंग बुथ पर कुल 90 वोट थे, लेकिन वोट पडे 171, इसे चमत्कार कहा जाए या ईवीएम में घोटाला? अब सवाल यह हैं की क्या इसका चुनाव आयोग के पास कोई जवाब है? अगर हैं तो चुनाव आयोग क्या इस घोटाले को स्पष्ट कर पाएगा ताकि मतदाताओं का विश्वास चुनाव आयोग पर बना रहे.


दरअसल यह मामला असम के दीमा हसाओ जिले का है. यहां के एक पोलिंग स्टेशन पर बड़ी बेईमानी का पर्दाफाश हुआ है. इस बूथ पर टोटल 90 वोटर हैं लेकिन यहां पर 181 वोट पड़े हैं. यह पोलिंग स्टेशन हाफलोंग विधानसभा क्षेत्र में है. इस क्षेत्र में वोटिंग दूसरे चरण में हुई थी. मालूम हो कि हाफलोंग विधानसभा क्षेत्र में लगभग 74 प्रतिशत वोटिंग हुई थी.


वहीं मामले का खुलासा होने के बाद जिला निर्वाचन अधिकारी ने पोलिंग स्टेशन के 5 अधिकारियों एवं कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया है और इस पोलिंग स्टेशन पर दोबारा मतदान का प्रस्ताव दिया है. हालांकि चुनाव आयोग ने अभी तक दोबारा मतदान के प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी है. जिस प्रकार से असम में भाजपा को चुनाव जिताने के लिए चुनाव आयोग तरह तरह के हथकंड़ों का इस्तेमाल कर रहा है, वो पूरा देश देख रहा है. भाजपा प्रत्याशी की गाड़ी से ईवीएम पकड़ी जाती है और चुनाव आयोग छोटे छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई कर लोगों की आंखों पर पर्दा डालने का काम करती है.


जिस सीट पर 90 वोटर हो और वहां पर 171 लोग वोटिंग कर दें, इस पर चुनाव आयोग का तर्क सुनकर आपको हंसी भी आएगी और गुस्सा भी छूटेगा. चुनाव आयोग का कहना है कि हमारे पास 90 लोगों की मतदाता सूची थी, लेकिन स्थानीय ग्राम प्रधान ने हमें 181 लोगों की मतदाता सूची थमा दी. चुनाव आयोग के पास यही हास्यास्पद बहाना बचा था. 


सवाल यह हैं की देश में कोई भी चुनाव, चुनाव आयोग की मतदाता सूची से होता है या ग्राम प्रधान की मतदाता सूची से? इसे आम जागरूख मतदाता भी समझ सकते है. लेकिन चुनाव आयोग के द्वारा देश की जनता की आखों में धुल झोकने का काम किया जा रहा है, ऐसा कहना गलत नहीं होगा. पूरा देश इन घटनाओं को देखकर कह रहा है, चुनाव आयोग ने भारत के लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा कर रख दी। कुछ दिन बाद लोग कहेंगे कि भारत में लोकतंत्र हुआ करता था.


चुनाव आयोग के इस रवैये को देखकर ऐसा लगता है जैसे सच में भारत में लोकतंत्र अब कुछ दिन का मेहमान रह गया है. जब चुनाव आयोग जैसी संस्था निष्पक्षता त्याग कर किसी दल विशेष को जीताने पर उतारु हो जाए तो फिर क्या बाकी रह जाता है? पिछले कुछ दिनों से चुनाव आयोग जिस प्रकार के कारनामे कर रहा है, उससे देश का लोकतंत्र समर्थक वर्ग काफी गुस्से में है और उनका आरोप हैं की चुनाव के माध्यम से देश का लोकतंत्र खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है.


वैसे तो अभी चल रहे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग की कई हरकतें संदिग्ध पाई गई हैं लेकिन असम में जो हुआ है, वो बताने के लिए काफी है कि भारत में जो चुनाव हो रहे हैं, उसमें एक पार्टी को हराने और एक पार्टी को जीताने के लिए तिकड़म किए जा रहे हैं. असम में इस बार चुनाव आयोग की बेईमानी पकड़ में आ गई है.


बता दें कि बामसेफ के राष्ट्रीय अध्यक्ष वामन मेश्राम पिछले कई सालों से कह रहे है की ईवीएम मशीन में गडबडी होती है. उनका यह भी आरोप है की कांग्रेस और भाजपा ने दो बार ईवीएम में घोटाला करके चुनाव जिता. यही नहीं तो सुप्रीम कोर्ट भी अपने फैसले में कह चुका हैं की ईवीएम से पारदर्शक, मुक्त और निक्ष्पक्ष चुनाव नहीं कराए जा सकते. इसके बावजूद चुनाव आयोग का तर्क हैं की ईवीएम को हैक नहीं किया जा सकता. अगर चुनाव आयोग के इस तर्क को सही मान ले तो सवाल यह हैं की एक पोलिंग बुथ पर जब कुल 90 वोट हैं, वहा 181 वोट कैसे पडे? क्या इसका चुनाव आयोग के पास कोई जवाब है? क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव आयोग अहम नहीं बल्कि जनता सर्वपरी है. इसलिए चुनाव आयोग इस स्थिती को स्पष्ट करें.



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