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धूंआ-धूआं जिंदगी : चूल्हे में उज्जवला योजना

Published On :    7 Apr 2021   By : MN Staff
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घरेलू गैस की बढ़ती कीमतों ने ग्रामीण महिलाओं को धकेला चूल्हे की ओर : रिपोर्ट



नई दिल्ली : ‘‘पाँच-छह सौ रुपए में तो किसी तरह गैस भरवा लेते थे, अब तो एक सिलेंडर लगभग 900 रुपए में मिल रहा है. इतने में भराने की हिम्मत नहीं है. ये हालात ग्रामीण महिलाओं की है. मध्य प्रदेश के जिला सतना के कोठरा गाँव में रहने वालीं चंद्रकली के मुताबिक उन्हें पांच साल पहले उज्जवला योजना का गैस कनेक्शन मिला था।.तब उन्हें लगा था कि अब गोबर के कंडे और लकड़ी से छुटकारा मिल जायेगा, लेकिन गैस के बढ़ते दामों ने हमें फिर मिट्टी के चूल्हे पर पहुंचा दिया है. अब फिर से जिंदगी धूंआ-धूआं बन चुकी है.


गौरतलब है कि केंद्र सरकार की रिकॉर्ड बुक के हिसाब से चंद्रकली 2016 में लॉन्च हुई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना का लाभ पाने वाली करोड़ों भारतीयों में से एक हैं. इस योजना के लिए सरकार ने शुरू में 8,000 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. इसके बाद सरकार ने एक बार फिर 2018-19 में 3,200 करोड़ रुपए, वहीं, 2019-20 में 3,724 करोड़ और 2020-21 में 1,118 करोड़ रुपए आवंटित किये. सरकार का यह भी दावा है कि इस योजना की मदद से देश की कुल 95 फीसदी आबादी को एलपीजी गैस कनेक्शन मिल पाया है. सरकार इसे अब 100 फीसदी करना चाहती है.


अगर बात महंगाई की करें तो इसी साल जनवरी से लेकर मार्च तक घरेलू गैस की कीमत 125 रुपए बढ़ी है. 4 फरवरी को 25 रुपए, 15 फरवरी को 50 रुपए, फिर 25 फरवरी को 25 रुपए और 1 मार्च को भी इतने ही रुपए बढ़ाए गए थे. यानी 14.2 किलो वाले घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत 917.50 रुपए हो गई थी जो 4 फरवरी से पहले 767 रुपए थी.


लॉकडाउन के समय सरकार ने उज्जवला योजना के तहत सिलेंडर फ्री में देने का ऐलान किया था, फिर भी लोगों ने सिलेंडर रिफिल नहीं करा पाए. महिलाओं का कहना है कि जब गैस सिलेंडर मिला था तो एक दो बार गैस सिलेंडर किसी तरह भरवा भी लिया था. लेकिन, बढ़ती महंगाई ने अब गैस सिलेंडर भरवाना बंद कर दिया है. क्योंकि पैसे से और भी व्यवस्था करनी पड़ती है. बल्कि लकड़ी और गोबर कंडे गैस से सस्ता पड़ा रहा है.



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बताते चलें कि पिछले कुछ वर्षों में प्रकाशित कई रिपोर्टों और अध्ययनों में बताया जा चुका है कि गैस की कीमतों में हो रही लगातार बढ़ोतरी के कारण प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थी गैस सिलेंडर रिफिल नहीं करा रहे हैं जिस कारण महिलाएं फिर से खाने पकाने के लिए जहरीले ईंधन का प्रयोग करने को मजबूर हैं. 


वर्ष 2018 में रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कम्पैसाटनेट इकोनॉमिक्स के एक सर्वे में सामने आया कि राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में योजना के 85 फीसदी लाभार्थी अभी भी खाना पकाने के लिए पारंपरिक लकड़ी के चूल्हों का उपयोग कर रहे थे. नियंत्रक और महालेखा परीक्षक की 2019 में आई रिपोर्ट में बताया गया है कि उज्ज्वला योजना के तहत प्रति वर्ष सिलेंडर रिफिल की दर 3.21 सिलेंडर है.



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2020 में फेडरेशन ऑफ एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर्स इन इंडिया ने दावा किया था कि उज्जवला योजना की शुरुआत के बाद से 22 फीसदी लाभार्थियों ने अपने सिलेंडर को फिर से भरवाया ही नहीं और 5-7 फीसदी लोगों को पहले रिफिल के बाद सब्सिडी का पैसा भी नहीं मिला. वहीं मार्च 2020 में कोविड-19 के बाद जब लॉकडाउन शुरू हुआ तब केंद्र सरकार ने अप्रैल और जून 2020 के बीच उज्ज्वला लाभार्थियों को तीन मुफ्त रिफिल देने की घोषणा की. 


आठ करोड़ उज्ज्वला लाभार्थियों के अनुसार कुल 24 करोड़ सिलेंडर रिफिल होने थे, लेकिन जून तक महज 12 करोड़ सिलेंडर ही रिफिल हुए. दिलचस्प बात तो यह है कि जब नरेंद्र मोदी ने इस योजना की शुरुआत की थी तब उन्होंने कहा था कि इस योजना का मकसद गरीब महिलाओं को जहरीले धुएं से मुक्ति दिलाना है. लेकिन, यह योजना एक जुमला साबित और महिलाओं की जिंदगी फिर से धूंआ-धूंआ बन गया. 



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