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प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज बोले:मोदी सरकार को विकास के सही मायने समझने की ज़रूरत.

Published On :    9 Jul 2018   By : MN Staff
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प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने कहा कि सरकार ने शिक्षा,स्वास्थ्य,पोषण,सामाजिक सुरक्षा जैसे कई क्षेत्रों से जुड़ी ज़िम्मेदारियों को औद्योगिक घरानों याराज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दिया है.



नई दिल्ली: प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज नेकहा कि केंद्र सरकार कई क्षेत्रों में अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही है और उन्हें कॉरपोरेट या राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दे रही है. विकास सम्बन्ध में मोदी सरकार को व्यापक नजरिया अपनाने की जरूरत है.


बेल्जियम में पैदा हुये और अब भारतीय नागरिक द्रेज ने कहा कि विकास के लिए शिक्षा,स्वास्थ्य,पोषण,सामाजिक सुरक्षा,पर्यावरण संरक्षण,सार्वजनिक परिवहन आदि क्षेत्रों में विस्तृत कदम उठाने की जरूरत है.


एक समाचार एजेंसी से बातचीत मेंद्रेज़ ने कहा, ‘सरकार को आर्थिक वृद्धि की सनक से बाहर निकलना चाहिये और विकास क्या है इसको लेकर व्यापक नजरिया अपनाना चाहिये. आर्थिक वृद्धि जीवन स्तर में सुधार के तौर पर विकास में निश्चित रूप से योगदान दे सकती है पर यह अपने आप में दूरगामी नहीं हो सकती है.’


उन्होंने कहा, ‘मोदी सरकार इनमें से कई जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ रही है और उन्हें किसी न किसी रूप में औद्योगिक घरानों या फिर राज्य सरकारों के भरोसे छोड़ दे रही है.’


आर्थिक जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले द्रेज ने कहा कि विकास की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण शुरुआत गुणवत्तापूर्ण सार्वभौमिक शिक्षा है. इसे हाल ही में दुनिया भर में हुए कामों के आधार पर इसे देखा जा सकता है.


उन्होंने कहा, ‘सार्वभौमिक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भारत में व्याप्त सामाजिक विषमता को देखते हुये,देश के काफी अहम है. चार साल निकल चुके हैं लेकिन प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में भी कोई बड़ी पहल नहीं हो सकी है.’


द्रेज ने कहा कि पिछले चार साल वंचित तबके के लिये खासतौर से बेहतर नहीं रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि नोटबंदी से वित्तीय रूप से कमजोर वर्ग को झटका लगा है.


उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था किसी तरह से7.5प्रतिशत वृद्धि रूझान के आसपास वृद्धि हासिल करने में सफल रही है. पिछले15साल अर्थव्यवस्था इसी स्तर के आसपास वृद्धि हासिल करती रही है. इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में मेहनताना दरें कमोबेश स्थिर रही हैं.


कई पुस्तकों के लेखक रहे द्रेज ने कहा कि भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी दुनिया में सबसे कम है. उन्होंने कहा कि यही दो प्रमुख संकेत हैं जो बताते हैं कि तीव्र आर्थिक वृद्धि पर्याप्त रोजगार के अवसर और लोगों के लिये आय के अवसर पैदा करने में असफल रही है.


उन्होंने सरकारी डाटा की अनुपलब्धता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह देश में‘सांख्यिकी प्रणाली में आई गिरावट’का लक्षण है और सरकार की‘असुविधाजनक आंकड़ों’को दबाने की प्रवृत्ति को दिखाता है.


उन्होंने कहा, ‘इसके और कई उदाहरण दिए जा सकते हैं. जैसे गरीबी सूचकांक आउट ऑफ डेट हैं,इसका सबसे हालिया अधिकारिक आंकड़ा2011-12का है.’


उन्होंने पिछले दो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे2005-06और2015-16के बारे में कहा कि इन दोनों सर्वे में10साल काअंतर था जबकि बाकी दक्षिण एशियाई देशों में यह अंतर दो से तीन साल का होता है.


रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर द्रेज ने यह भी दावा किया की मोदी सरकार ने सामाजिक नीतियों से मुंह फेर रखा है.


उन्होंने कहा, ‘अगर स्वच्छ भारत मिशन को अपवाद के रूप में देखें,तो बीते सालों में शिक्षा,स्वास्थ्य,पोषण,सामाजिक सुरक्षा या इनसे संबंधी मामलों में कोई खास कदम नहीं उठाए गए हैं. यहां तक कि जहां सरकार की कानूनी तौर पर ज़िम्मेदारी बनती है,जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मातृत्व लाभ देने के लिए भी कोई ऐसा कदम नहीं उठाया गया जिस पर बात कर सकें. यह गरीबों के लिए एक बुरी खबर है जो अपनी आजीविका के लिए अधिकतर सार्वजनिक और सामाजिक सुविधाओं पर निर्भर रहते हैं.’


द्रेज ने आधार के आने से सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में भ्रष्टाचार कम होने के दावे को भी ख़ारिज किया. उन्होंने दावा किया, ‘इसके उलट,कम से कम झारखंड में तो इससे भ्रष्टाचार घटा नहीं बल्कि बढ़ा ही है. इसकी एक वजह यह भी है कि जब लोग बायोमीट्रिक टेस्ट में फेल हो जाते हैं तो उनका राशन पीडीएस डीलर हड़प लेते हैं.’


इसके बजाय उन्होंने स्मार्ट कार्ड को ज्यादा भरोसेमंद तकनीक बताया,जो पहले से ही हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु में इस्तेमाल की जा रही है.



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