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गोलमाल है सब गोलमाल है

Published On :    4 Aug 2018   By : MN Staff
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मोदी सरकार से संतुष्ट नहीं संघ, फिर भी देगा 2019 में साथ-वॉल्टर एंडरसन



यूएनए: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर वॉल्टर के. एंडरसन और अमेरिकी मूल के राइटर श्रीधर डी.दामले ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर दूसरी किताब लिखी है ‘द आरएसएस ए व्यू टू द इनसाइड’ इस किताब में एंडरसन और उनको सहयोगी श्रीधर दामले ने आरएसएस के वैश्विक दृष्टिकोण और संगठन के विकास पर फोकस किया है।


एंडरसन के मुताबिक, वक्त बदल चुका है, कभी बीजेपी आरएसएस पर निर्भर हुआ करती थी, लेकिन अब आरएसएस संघी पार्टी (बीजेपी) पर निर्भर है और आने वाले लोकसभा चुनाव में आरएसएस कुछ मुद्दों पर संघी पार्टी से ‘नाखुश’ होने के बावजूद भी उसका साथ देने को मजबूर है। 


सवाल यह है कि अगर संघ बीजेपी से नाखुश होता तो आगामी चुनाव में बीजेपी का साथ नहीं देता। इससे साबित होता है कि संघ का चुनाव षड्यंत्र है।वॉल्टर के. एंडरसन ने अपनी नई किताब को लेकर एक खास बातचीत की, इस दौरान उन्होंने कश्मीर मुद्दे, गौ-हत्या, राम मंदिर और आने वाले चुनावों पर भी चर्चा की। 


बीजेपी पर आरएसएस की निर्भरता को स्पष्ट करते हुए एंडरसन ने कहा आरएसएस वैसे तो खुद को गैर-राजनीतिक संगठन बताती है, लेकिन रहती इसके उलट है। लिहाजा आरएसएस को सत्ता में रहने के लिए जाहिर तौर पर बीजेपी की जरूरत है, क्योंकि संघ के उन मुद्दों को देश में लागू करना है जिसमें सरकार की भूमिका अहम है।


वॉल्टर एंडरसन के मुताबिक आरएसएस सरकार के प्रति स्वीकार्य रूप से प्रतिबद्ध है, हालांकि ये बहस का विषय है कि बीजेपी पर आरएसएस की निर्भरता कितनी है और आरएसएस बीजेपी पर कितना भरोसा करता है। इसे हम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइार्) के उदाहरण से समझा जा सकता है। 


सरकार एफडीआई इसलिए चाहती थी कि इससे विदेश का पैसा और देश में नौकरियों के नए अवसर पैदा होते, लेकिन आरएसएस और बीजेपी में आम सहमति नहीं थी। हालांकि यह सिर्फ दिखावे के लिए है। 


इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आरएसएस को लगता था कि एफडीआई से संस्कृति, मूल्यों, नैतिकता, उपभोक्तावाद और स्वदेशी अर्थव्यवस्था कमजोर होगी, फिर भी आरएसएस ने एफडीआई का आइडिया जोरदार तरीके से स्वीकार किया।मोदी सरकार के चार साल पूरे होने को आरएसएस कैसे देखता है के सवाल पर एंडरसन ने कहा इसे लेकर मिली-जुली राय है। 


वॉल्टर एंडरसन का यह भी कहना है कि भले ही आरएसएस बीजेपी के कामों से संतुष्ट न हो, फिर भी वो चाहती है कि अगले साल फिर से बीजेपी ही केंद्र की सत्ता में आए, क्योंकि चुनावों को लेकर बीजेपी शॉर्ट टर्म उद्देश्यों पर ही फोकस करती है, लेकिन आरएसएस लंबी अवधि के उद्देश्यों पर काम करती है, इसके लिए उसे बीजेपी जैसी सरकार की जरूरत है। क्योंकि 2025 में आरएसएस को 100 साल पूरे हो रहे हैं।


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