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क्या भाजपा ने मुस्लिम विरोधी NRC के ज़रिये की है घृणित राजनीती ?

Published On :    6 Aug 2018   By : MN Staff
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एक तरफ गृह मंत्री राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि इन लोगों के साथ कोई भी विदेशियों वाली कार्रवाई नहीं की जाएगी दूसरी ओर वही मंत्री NRC के प्रकाशन के दो दिन पहले घोषणा करते हैं कि भारत की सबसे बड़ी जेल का निर्माण असम में किया जाएगा.



गुवाहाटी:  हाल ही में भाजपा शाषित केंद्र सरकार के इशारे पर असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के ज़रिये 40 लाख मुस्लिमों को घुसपैठिये बताकर जेल में डाला जा रहा है और वोट का अधिकार छीना जा रहा है. माना जा रहा है कि मुस्लिमों के विरोध में कार्यवाही करके भाजपा गैर मुस्लिमों में हिंदुत्व की भावना भरके उनका वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करना चाहती है.


सेवानिवृत्त IPS, एस. आर. दारा पुरी के अनुसार, उन्हें NRC की कार्यवाही का जायज़ा लेने यूनाइटेड अगेंस्ट हेट (UAH) के सौजन्य से एक फैक्ट फाइंडिंग टीम (जिसमेकई वरिष्ठ पत्रकार भी थे) के साथ 28 जून से 2 जुलाई तक असम जाने का मौका मिला.


दारापुरी ने बताया कि उनकी टीम नेगुवाहाटी में पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और प्रफुल्ल महंता से भी एनआरसी के बारे में बातचीत की. बारपेटा, गोआलपाड़ा तथा बोनगईगाँव जिले में बहुत सारे डी-वोटर (संदिग्ध वोटर) और विदेशी घोषित किए गए लोगों और डी-वोटर एवं विदेशी घोषित करके गिरफ़्तार किए गए लोगों के परिवारों से मिले. NRC के संबंध में काम कर रही कई संस्थाओं के सदस्यों से भी मिले.NRCसमन्वयक के कार्यालय में अतिरिक्त समन्वयक कलिता से भी मिले. 





इस फैक्ट फाइंडिंग अभियान के दौरान कई लोगों से बातचीत करके हम इन निष्कर्षों तक पहुंचे:-


1. एनआरसी प्रक्रिया का सभी पक्षों ने स्वागत किया है क्योंकि लोग बांग्लादेशी के टैग से मुक्त होना चाहते हैं.


2. एनआरसी तैयार करने हेतु अपनाई गई प्रक्रिया में बहुत सारी कमियां रही हैं.


3. एनआरसी सेवा केंद्रों पर काम करने वाले अधिकतर कर्मचारी असमिया हैं. उनके बांग्लाभाषियों के लिए पूर्वाग्रह के कारण उनके मामलों को सहानुभूतिपूर्वक न देखकर छोटी-छोटी त्रुटियों के कारण प्रस्तुत अभिलेखों को रद्द कर दिया गया है.


4. असम में1997में चुनाव आयोग की ओर से अपनाई गई डी-वोटर की अवधारणा अवैधानिक है. यह सर्वविदित है कि कोई व्यक्ति या तो वोटर हो सकता है या वोटर नहीं हो सकता. हमारे संविधान में ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं है. हैरानी की बात है कि इसे अब तक किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी गई.


5. नागरिकों को डी-वोटर घोषित करके या विदेशी ट्रिब्यूनल द्वारा विदेशी होने की राय व्यक्त करने पर गिरफ़्तार करके जेल में डालना ग़लत है. इस समय असम में लगभग1900लोग जेलों में बंद हैं जिनमे आधी शादीशुदा औरतें हैं. उनके साथ छोटे छोटे बच्चे भी हैं. इन जेलों की व्यवस्था नरक जैसी है.


6. 2016में असम में भाजपा की सरकार बनने पर विदेशी ट्रिब्यूनल में ज्यूडिशिएल अधिकारियों की जगह पांच साल की प्रैक्टिस वाले30वकीलों को नियुक्त किया गया है जिनमें कई का संबंध कथित तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से है.


7.गुवाहाटी उच्च न्यायालय में विदेशी क़रार दिए गए नागरिकों के मामलों को कई वर्षों से एक ही जज उज्जल भुयां सुनते आ रहे हैं जिनकी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं. यह आश्चर्य की बात है कि इस बेंच पर रोटेशन से जज क्यों नहीं बदला गया. शिकायत होने पर अब4जुलाई को उन्हें हटा दिया गया है.


8. नागरिकता सिद्ध करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत सचिव द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र को भी सुबूत के तौर पर मान्यता देने की बात कही थी लेकिन एनआरसी में इसे वैध न मान कर अन्य सबूत मांगे गए.


9.कई नागरिकों ने शिकायत की कि उन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल में पेश होने का नोटिस या तो मिला ही नहीं या फिर बहुत देरी से मिला जिस कारण वे उपस्थित नहीं हो सके और उनके मामले का निस्तारण एक्स पार्टी हो गया.


उपरोक्त विवरण से साफ़ है कि हालांकि सभी पक्ष एनआरसी ऑपरेशन से सहमत थे, लेकिन उसे तैयार किए जाने की प्रक्रिया और उसमें लगे अधिकतर कर्मचारियों के असमिया होने के कारण बांग्लाभाषी लोगों के प्रति उपेक्षा के कारण लोगों के मामले छोटी छोटी त्रुटियों के कारण रद्द करने के आरोप लगे हैं.


इसका नतीजा यह हुआ है कि अब30जुलाई को जारी किए गए एनआरसी ड्राफ्ट में 40, 07, 707 लोग सूची से बाहर हो गये हैं जो एक बहुत बड़ी संख्या है.


यह भी एक अजीब बात है कि जहाँ एक तरफ गृह मंत्री राजनाथ सिंह यह कह रहे हैं कि इन लोगों के साथ कोई भी विदेशियों वाली कार्रवाई नहीं की जाएगी और उनकी नागरिकता के मामले के अंतिम निस्तारण तक उनकी नागरिकता यथावत बनी रहेगी.


दूसरी ओर वही मंत्री एनआरसी के प्रकाशन के दो दिन पहले घोषणा करते हैं कि भारत की सबसे बड़ी जेल का निर्माण असम में किया जाएगा. क्या समझा जाए कि वह उन्हें दिलासा दे रहे हैं या डरा रहे हैं?इसके साथ ही भाजपा नेता अमित शाह और कैलाश विजयवर्गीय उन्हें लगातार घुसपैठिये कह रहे हैं.


हमें याद रखना चाहिए कि यह लाखों लोगों के जीवन-मरण का प्रश्न है. मुझे आज बांग्लाभाषी लोगों के मन में वैसा ही भय और निराशा नजर आ रहा है जो मैंने 1983 में नेल्ली नरसंहार के बाद देखा था. कहीं ऐसा न हो कि यह भय और निराशा आक्रोश और प्रतिशोध का रूप धारण कर ले.


अगर इस मामले में हिन्दू-मुस्लिम राजनीति की गई तो यह पहले से ही अशांत उत्तर-पूर्व की समस्या को और बढ़ा सकता है. कहीं ऐसा न हो कि वह उत्तर-पूर्व में एक और कश्मीर को जन्म दे दे.



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