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देश में लोकतंत्र नही बल्कि ब्राह्मणतंत्र स्थापित है-वामन मेश्राम

Published On :    9 Aug 2018   By : MN Staff
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मेश्राम ने कहा कि देश में ब्राह्मणों का एकाधिकार स्थापित हो गया है जिसकी वजह से हमारी समस्याओं का समाधान आज़ादी के सत्तर साल बाद भी नही हो पाया है. इसीलिए हमने देश को जागृत करने के लिए ये परिवर्तन यात्रा निकाली है



बालाघाट/मप्र : भारत देश में आज ब्राह्मणों की पांच-पांच राष्ट्रिय स्तर की पार्टिया हैं. जिनकी संख्या देश में मात्र 3.5 प्रतिशत है. जो सरपंच भी नही बन सकते अगर ईमानदारी से चुनाव हों, वो लोग देश की पंचायत यानि संसद पर कब्ज़ा किये बैठे हैं. ये जानकारी मीडिया ने भी छुपा रखी है.


उपरोक्त बातें मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में बहुजन क्रांति मोर्चा के बैनर तले एक कार्यक्रम की अध्यक्षता के दौरान बामसेफ के राष्ट्रिय अध्यक्ष वामन मेश्राम ने कही.


उन्होंने कहा कि पहले नंबर की ब्राह्मणों की राष्ट्रिय पार्टी है कांग्रेस जो 1885 में चटर्जी, मुखर्जी, बैनर्जी, गोखले, अगरकर, तिलक आदि नाम के ब्राह्मणों ने बनाई. उस समय महराष्ट्र में इसे राष्ट्रिय सभा कहा जाता था. राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले को जब इसमें जुड़ने का निमंत्रण मिला तो उन्होंने कहा था कि ये कैसी राष्ट्रिय सभा है ये तो ब्राह्मणों की सभा है.


ब्राह्मणों की दूसरे नंबर की पार्टी है कम्युनिस्ट पार्टी जिसकी स्थापना 1925 में महाराष्ट्र के कोंकणस्थ ब्राह्मण श्रीपाद अमृतडांगे ने बनाई. तीसरी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को बनाने वाला केरल का ईएमएस नामुद्रिपाद ब्राह्मण है.


भारतीय जनता पार्टी ब्राह्मणों की चौथे नंबर की पार्टी है जिसका मौलिक नाम जनसंघ था. बाद में दो ब्राह्मण अटल बिहारी वाजपेयी और आडवानी ने 1977 में भाजपा बनाई जिसके पहले अध्यक्ष बने अटल बिहारी. पश्चिम बंगाल की तृणमूल कोंग्रेस को मेश्राम ने ब्राह्मणों की पांचवी राष्ट्रिय पार्टी बताया जिसकी अध्यक्ष ममता बैनर्जी हैं.


उन्होंने कहा कि देश में इन्ही पांच पार्टियों का राज है जिससे सिद्ध हो जाता है कि देश में लोक तंत्र नही बल्कि ब्राह्मण तंत्र है. चुनाव से A नाम का ब्राह्मण जाता है तो B नाम का ब्राह्मण आ जाता है. सत्ता में तो परिवर्तन होता है मगर ब्राह्मणराज में परिवर्तन नही होता है जिससे हमारी समस्या बरकरार रहती हैं और ये एक गंभीर मसला है.


आम जन को लगता है कि प्रधानमंत्री मनमोहन और नरेंद्र मोदी तो ब्राह्मण नही हैं. लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि ये ब्राह्मणों द्वारा या ब्राह्मणों की पार्टियों द्वारा नोमिनेट किये गए प्रधानमंत्री हैं. इसलिए असली ताकत ब्राह्मणों के पास रहती है. ये लोग तो बस कागजों पर मोहर लगाने का काम करते हैं.


संसद में शरद यादव द्वारा कार्मिक मंत्रालय से मांगी गयी एक जानकारी का उदाहरण देते हुए मेश्राम ने कहा कि कार्यपालिका में 79.4 प्रतिशत पदों पर भी ब्राह्मणों का ही कब्ज़ा है.


उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली के योगेन्द्र यादव ने जब मीडियाकर्मियों और मीडिया हाउसों से जुड़े आंकड़े इक्कठा किये तो पाया कि 98 प्रतिशत पर ब्राह्मण-बनिए ही लोकतंत्र के इस चौथे सतम्भ पर कब्ज़ा जमाये बैठे हैं. इसी तरह से देश की न्यायपालिका में भी ब्राह्मणवाद का ही बोलबाला है.


ब्राह्मणवादी षड्यंत्र का खुलासा करते हुए उन्होंने कहा कि ब्राह्मण लोग कहते हैं कि उनका हिन्दू राष्ट्र निर्माण करना लक्ष्य है. वो लोग साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी को भी हिन्दू कहते हैं. तो क्या ब्राह्मण इन वंचितों और पिछड़ों का राष्ट्र निर्माण करना चाहते हैं? यह तो वास्तविकता नही है.


दरअसल इस तरह से विदेशी ब्राह्मण देश के मूलनिवासियों की आँखों में हिन्दुत्व की पट्टी बांधकर, उनको धोखे में रखकर ब्राह्मण राज को बचाए रखना चाहते हैं.


मेश्राम ने कहा कि देश के सभी संस्थानों पर ब्राह्मणों का एकाधिकार स्थापित हो गया है जिसकी वजह से हमारी समस्याओं का समाधान आज़ादी के सत्तर साल बाद भी नही हो पाया है. इसीलिए हमने देश के एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों को जागृत करने के लिए ये देशव्यापी परिवर्तन यात्रा निकाली है जो देश के सभी राज्यों के करीब 450 जिलो को कवर करेगी और इसका समापन छ: महीने बाद दिल्ली में होगा.




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