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बाबासाहब डा. अम्बेडकर का प्रेरणा दायी जीवन संघर्ष

Published On :    14 Apr 2018   By : MN Staff
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यह बात महामानव डा. अम्बेडकर द्वारा लिखित साहित्य से स्वंय स्पष्ट हो जाती है। कि शूद्रों के लिए शिक्षा के द्वार बन्द थे। मध्यकालीन भारत में जन्में संत महापुरूषां द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही अछूतां के लिए शिक्षा केन्द्र माने गए।



महाराष्ट्र में महार जाति के लोग शरीरिक रूप से पुष्ट व्यवस्था योग्य, विनम्र, साहसी, युद्ध कौशल में निपुण तथा राष्ट्र प्रेमी थे, किन्तु ब्राह्मणी व्यवस्था के होते हुए उन्हें अपने ही राष्ट्र मे सामाजिक न्याय प्राप्त न था। उन्हें अछूत, शूद्र, निम्न और नीच जाति की चौथी श्रेणी में रखा गया। 


यह बात महामानव डा. अम्बेडकर द्वारा लिखित साहित्य से स्वंय स्पष्ट हो जाती है। कि शूद्रों के लिए शिक्षा के द्वार बन्द थे। मध्यकालीन भारत में जन्में संत महापुरूषां द्वारा प्रदत्त ज्ञान ही अछूतां के लिए शिक्षा केन्द्र माने गए। संत धारा में तुकाराम, संत कबीर और रैदास की दूर-दूर तक फैली हुई प्रज्ञापूर्ण विचारधारा ने ही शिक्षा से वंचित समाज मे विवेक जाग्रत किया था। 


ऐसी शिक्षा पद्धति में ही रामजी राव, संत कबीर के सच्चे अनुयाई बने जिन्हांने ब्राह्मणवाद की कठोर नीतियां का रहस्य समझा। दादाजी मालोजी सकपाल महार जाति के सामाजिकां में एक सम्पन्न सेवा मुक्त व्यक्ति थे। उन्हीं के अथक प्रयास से रामजी राव को अंग्रेजी सेना में ‘सूबेदार मेजर’ पद प्राप्त हुआ। 


वर्ष 1891  में सेवा निवृत होने के उपरान्त रामजी राव रत्नागिरी जिले के दपोली ग्राम में आ बसे जहाँ माता भीमाबाई की तेरह संतानों के उपरान्त 14 अप्रैल सन् 1891 को तत्कालीन मध्यप्रदेश प्रांत की महू छावनी में महान सपूत भीमराव अम्बेडकर का जन्म हुआ।



बालक अम्बेडकर ने भारत में जन्म लेकर केवल अपनी मातृभूमि का नाम ही रौशन नहीं किया बल्कि विश्व के मानव समाज में महामानव होने का गौरव भी प्राप्त किया। जब भीमराव अम्बेडकर का जन्म हुआ तब सवर्ण कालचक्र की मनु व्यवस्था में चारां तरफ छुआ-छूत का भूत अछूत सामाजिकों को भयानक यातनाएँ दे रहा था। भीमराव अम्बेडकर बचपन से ही नवज्ञान ज्योति लेकर जन्मे थे। 


ऐसे सुन्दर, कुशाग्र बुद्धिमान बालक भीमराव के पिता ने उन्हें शिक्षित बनाने का निश्चय किया। पिता रामजीराव यथा समय बच्चे को स्कूल में दाखिल कराने ले गए और अपमानित होकर उल्टे पैर घर वापिस लौटना पड़ा। कालान्तर बाद एक अंग्रेज अधिकारी की सिफारिश से भीमराव अम्बेडकर का दाखिला इन शर्तों पर मिला कि वह अपने बैठने के लिए अपने घर से टाट पट्टी लेकर आएगा, कक्षा में सबसे बाद में प्रवेश करेगा तथा सबसे पीछे जमीन पर बैठेगा। 


किसी विद्यार्थी अथवा अध्यापक को स्पर्श नहीं करेगा, मेज-कुर्सी, ब्लैक बोर्ड जैसी निर्जीव वस्तुओं को भी हाथ नहीं लगाएगा। प्यास लगने पर स्वंय नल की टांटी नहीं खोलेगा अथवा बर्तन स्पर्श नहीं करेगा आदि अमानवीय परिस्थितियां में अछूतां के भाग्य विधाता को शिक्षा पाने का अधिकार प्राप्त हुआ। 


कई बार भीमराव के साथ अमानवीयता का व्यवहार किया जाता था। एक बार भीमराव अम्बेडकर को गर्मी के मौसम में प्यास लगी तो वे पानी पीने के लिए सब के सामने गिड़गिड़ाए लेकिन कपटी ब्राह्मणों के बच्चां ने नल की टांटी नहीं खोली। 


गर्मी के मौसम में भीमराव बिना पानी के घर वापस चले जाते कई बार तो काफी दूर घर होने के कारण किताबां का वजन ज्यादा होने के कारण व घर दूर होने के कारण तांगे से घर जाने के लिए बैठते तो थे तो तांगे वाले भीमराव अम्बेडकर और उनके भाई से सबसे पहले जाति पूछते थे जब वह बताते थे कि वह महार जाति के हैं तो उन्हें तांगे वाला गाली देकर तांगे से धक्का देकर नीचे फेक देता था। 


मगर उन्होंने रात-रात भर जाग कर हमारे लोगां के लिए बचपन में घोर यातनाआें और कठोर ब्राह्मणवादी अमानवीय परिस्थितियों से जूझते हुए भीमराव अम्बेडकर ने विद्या अध्ययन प्रारम्भ किया। दिन भर प्यास से तड़पते हुए स्कूल से घर वापिस आते और अपनी तृष्णापूर्ति करते। 


सतरह वर्ष की आयु में वर्ष अप्रैल 1906 के अन्तर्गत भिक्कू बालंगकर की द्वितीय पुत्री रामाबाई से भीमराव अम्बेडकर का विवाह हो गया। रामबाई के पिता उन दिनों दयोली में कुली का काम करते थे। प्रतिभाशाली भीमराव अम्बेडकर की लग्न ने बड़ौदा के महाराज सयाजी राव के हृदय में दया की रेखा खींच दी। 


उन्होंने अछूत विद्यार्थी को उच्च शिक्षा प्राप्ति के लिए पच्चीस रूपये मासिक छात्रवृति की घोषणा की। उन दिनां भीमराव अम्बेडकर ‘‘एलिफिस्टन कालेज, बम्बई’’ में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। वर्ष 1907 में उन्हांने मैट्रिक परीक्षा पास की और शूद्र सामाजिकां में चर्चा का विषय बन गए। 


लगातार परिश्रम और आर्थिक मदद मिलने के कारण उपरोक्त विद्यालय से ही सन् 1912 में बी.ए. पास कर लिया। पिता की आर्थिक परिस्थिति के कारण भीमराव अम्बेडकर की शिक्षा रूक गई। फलस्वरूप वह ‘बड़ौदा राज्य’ में लैफ्टीनेंट के पद पर नियुक्त हो गए। उन्हीं दिनों पिता राम जी राव रोगग्रस्त होने के कारण वह अपने पुत्र भीमराव को पुकार रहे थे मगर भीमराव 


अम्बेडकर वहां पर नहीं जा सके। उनके पिता रामजी सूबेदार की भीमराव अम्बेडकर की राह देखते-देखते 02 फरवरी 1913 को आकस्मिक मृत्यु हो गई। जिससे समस्त परिवार शोक में डूब गया।


बड़ौदा के महाराज ने भीमराव अम्बेडकर की आगामी शिक्षा का भार लेते हुए जुलाई 1913 को उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु ‘‘कोलम्बिया विश्वविद्यालय’’ अमेरिका भेज दिया। वहाँ पहुँचकर भीमराव अम्बेडकर ने भारतीय छुआ-छूत एवं अन्याय से मुक्ति महसूस की। 


लगातार 18 घण्टे के कठिन परिश्रम को वह ये जान कर भूल गए क्योंकि वहां उन्हें भारतीय प्रतिबन्धां पर पूर्ण स्वतन्त्रता थी। मन चाहे जहाँ जा सकते थे, खेल सकते थे, पढ़ सकते थे। वर्ष 1915 में भीमराव अम्बेडकर ने ‘प्राचीन भारतीय वाणिज्य’ (।दबपमदमज पदकपंद बवउउमतबम) थिसिज लिखकर एम.ए. तथा वर्ष 1916 में पी.एच.डी (डाक्टरेट की उपाधि) से विभूषित किए गए। 


कोलम्बिया विश्वविद्यालय से शिक्षा पूर्ण करने के उपरान्त डा. अम्बेडकर आगामी शिक्षा के लिए जून 1916 में ‘‘स्कूल आफ इकनोमिक्स एण्ड पौलिटिक्स’’ लंदन में प्रवेश लिए। इस कार्य में प्रोफेसर सैलिगमैंन ने उनकी पूर्ण मदद की किन्तु बीच में ही बड़ौदा महाराज सियाजीराव द्वारा प्रदत्त छात्रवृति अवधि समाप्त हो जाने के कारण वापिस बड़ौदा आ गए। 



वहाँ आकर डा. अम्बेडकर ने जुलाई 1917 में बड़ौदा रियासत के सेना सचिव नियुक्त हो गए। यहाँ पर उन्हें अनेक अत्याचारां से गुजरना पड़ा, यहाँ तक कि आफिस के चपरासी उनकी मेज पर फाइल फेंक कर मारते, कर्मचारी छुआ-छूत करते जिसे देखकर उन्हें अत्यधिक निराशा हो गई और पद से त्याग पत्र दे दिया तथा नवम्बर 1917 में बम्बई चले गए। 


वहाँ आकर डा. अम्बेडकर ने '‘Small holdings in India and their remedies’’ नामक ब्रौशर का प्रकाशन किया तथा वर्ष 1918 में छत्रपति शाहूजी की अध्यक्षता में आयोजित अछूत सम्मेलन में भी उपस्थित हुए। इस तरह उन्हांने दर्जनों ग्रन्थ, शोधपत्रों की रचना की। उपरोक्त कालेज में भी सवर्ण प्रोफेसर एवं छात्रों के मध्य छुआ-छूत और तिरस्कार ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। 


रोजाना के असहनीय अपमान से तंग आकर डा. अम्बेडकर ने वहाँ से भी नौकरी छोड़ दी। उन्होंने वर्ष 1920 में ‘‘मूक नायक’’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। अछूतां के साथ गुजर रहे अस्पृश्यता, सार्वजनिक स्थानां, कुँओं और मन्दिर प्रवेश निषेध जैसी भयानक स्थितियां से मुकाबला करने के लिए ‘‘अत्यंज संघ’’ की स्थापना की। 


पत्रिका जैसे साधनों से संग्रहित धन तथा मित्रों से कर्ज स्वरूप लिए गए धन के आश्रय से आगामी शिक्षा प्राप्त करने का फैसला किया और पुनः कोल्हापुर महाराज से विचार विमर्श करने चले गए। डा. अम्बेडकर की इच्छा का समर्थन करते हुए छत्रपति शाहूजी महाराज ने उन्हें पूर्ण मदद प्रदान की। 


वह कानून और अर्थशास्त्र की शिक्षा को पूर्ण करने के लिए लंदन चले गए। वहाँ जाकर डा. अम्बेडकर ने ‘‘लंदन स्कूल आफ इकोनोमिक्स एण्ड 


पौलिटिकल साइन्स’’ तथा जर्मनी से डी.एस.सी. तथ बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की। इस तरह डा. अम्बेडकर एम.ए., एम.एस.सी, पी.एच.डी., डी.एस.सी., 


एल.एल.डी. लिट बार एट लॉ जैसी महत्वपूर्ण उपाधियां से सम्पूर्ण हो गए। इतना ही नहीं, उन्हांने संस्कृत, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, अंग्रेजी तथा फारसी और मानव शास्त्र आदि का गहन अध्ययन किया। बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर अमेरिका, जर्मनी और इग्लैण्ड जैसे समतावादी एवं मानवतावादी देशां से शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त वापिस भारत आए। 


अपने ही देश में अमानवीय, अन्याय, असमानता, छुआ-छूत और घृणा जैसे घृणित अत्याचारां से तिरस्कृत हुए। सवर्ण हिन्दुआें के उपरोक्त व्यवहार के प्रति डा. अम्बेडकर के दिल में क्या धारणाऐं उत्पन्न हुई हांगी इसका अन्दाजा लगाना बहुत ही मुश्किल है।



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