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आजादी के बाद से ही चल रहा है रक्षा घोटालों का दौर पार्ट -1

Published On :    14 May 2019   By : MN Staff
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भारत की तथाकथित आजादी के बाद से ही ये सिलसिला चल रहे हैं. बताते चलें कि 1947 में कथित आजादी के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चलता रहा है.



सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि रक्षा मंत्रालय से राफेल डील से जुड़े कागज चोरी हो गए हैं. पहली बार नहीं है जब किसी रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों. भारत की तथाकथित आजादी के बाद से ही ये सिलसिला चल रहे हैं. बताते चलें कि 1947 में कथित आजादी के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चलता रहा है. जब पाकिस्तान की कबाइली फौजों ने कश्मीर पर आक्रमण शुरू किया तो सीमा की देखभाल और दूसरे कामों के लिए भारतीय सेना ने सरकार से जीपों की मांग की. भारत सरकार की तरफ से इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त वीके कृष्ण मेनन ने ब्रिटिश कंपनियों के साथ जीप खरीदने का सौदा किया.


 मेनन ने एक संदिग्ध कंपनी के साथ 1500 जीपों की खरीददारी का सौदा कर लिया. इसके लिए उन्होंने 80 लाख रुपए कंपनी को एडवांस में दे दिए. इन जीपों की जरूरत भारत को तुरंत थी, लेकिन इनकी पहली खेप जिसमें 150 जीपें थीं, सीजफायर होने के बाद भारत पहुँची. साथ ही ये इतनी घटिया क्वालिटी की थीं कि चल भी नहीं सकती थीं. इस घोटाले की जाँच के लिए अनंथसायनम आयंगर की अध्यक्षता में कमिटी बनाई गई. लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकल सका और 30 सितंबर 1955 को ये केस बंद कर दिया गया. साथ ही 3 फरवरी, 1956 को मेनन जवाहर लाल नेहरू की सरकार में मंत्री बन गए. भारत-चीन युद्ध के समय मेनन भारत के रक्षा मंत्री थे. इस युद्ध के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था.


यही नहीं 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने. 1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव की अगुवाई में कांग्रेस ने रिकॉर्ड 412 सीटें हासिल की. लेकिन, 1989 के चुनाव में उनकी सरकार चली गई. इसका एक बड़ा कारण बोफोर्स घोटाला था. भारत सरकार ने सेना के लिए 155 एमएम फील्ड हवित्जर खरीदने के लिए टेंडर निकाला. हवित्जर का मतलब छोटी तोप या बंदूक होता है. सरकार ने तय किया था कि इस डील में कोई बिचौलिया नहीं होगा. तीन देशों फ्रांस, ऑस्ट्रिया और स्वीडन ने इस सौदे में दिलचस्पी दिखाई. स्वीडन और ऑस्ट्रिया ने आपस में तय किया कि तोप स्वीडन सप्लाई करेगा और गोला-बारूद ऑस्ट्रिया का होगा. ऐसे में स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी को ये डील मिल गई.


करीब 1500 करोड़ के इस सौदे में भारत को 410 हवित्जर बेची गईं. लेकिन मई, 1986 में स्वीडन के एक रेडियो पर खबर आई कि बोफोर्स ने इस सौदे को हासिल करने के लिए करीब 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दी है. और इस कथित रिश्वत देने में राजीव गाँधी का भी नाम आया. साथ ही बोफोर्स तोप की क्षमता पर भी सवाल उठाए गए. इस डील में इटली के रहने वाले और उस दौर में गाँधी परिवार के करीबी ओतावियो क्वात्रोकी पर इस सौदे में दलाल की भूमिका निभाने का आरोप लगा.


1989 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. क्वात्रोकी भारत से भागकर विदेश चले गए. राजीव गाँधी पर क्वात्रोकी की मदद के भी आरोप लगे. इस मामले की सीबीआई जाँच शुरू हुई. 1991 में राजीव की हत्या के बाद उनका नाम आरोपियों की सूची से हटा दिया गया. हालांकि जाँच जारी रही और 31 मई, 2005 को दिल्ली हाइकोर्ट ने राजीव गाँधी के खिलाफ लगे सारे आरोपों को गलत करार दिया. सीबीआई ने इंटरपोल से लेकर कई संस्थाओं से क्वात्रोकी को हिरासत में लेने की कोशिश की, लेकिन सफल न हो सकी. 12 जुलाई, 2013 को क्वात्रोकी की मौत हो गई.इसके बाद 1999 में बोफोर्स तोप की क्वालिटी पर खड़े किए गए सवालों को हमेशा के लिए बंद कर दिया.


इसके साथ ही 1999 में देश का एक और बड़ा घोटाला हुआ जिसका नाम है कारगिल ताबूत घोटाला. हथियारों की खरीद-फरोख्त के अलावा कारगिल युद्ध में मारे गए सैनिकों के लिए खरीदे गए कफनों और ताबूतों की खरीददारी में भ्रष्टाचार का आरोप अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार पर लगा. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक कारगिल युद्ध में मारे गए भारतीय सैनिकों के लिए सरकार ने अमेरिकी फर्म बुइटरोन एंड बैजा से 500 एल्युमिनियम ताबूत खरीदने का सौदा किया. एक ताबूत की कीमत करीब 2500 डॉलर रखी गई. कैग के अनुमान के मुताबिक यह कीमत वास्तविक कीमत का 13 गुना थी. इस सौदे में तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस और तीन आर्मी अफसरों का नाम आया. सीबीआई जाँच हुई. दिसंबर, 2013 में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट के फैसले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया और ये केस भी खत्म हो गया.


साल 2001 में तहलका पत्रिका ने ऑपरेशन वेस्ट एंड नाम से एक स्टिंग ऑपरेशन किया. इसमें आरोप लगाया गया कि भारत सरकार द्वारा किए गए 15 रक्षा सौदों में रिश्वतखोरी हुई है. इस्राएल से खरीदे जाने वाली बराक मिसाइल भी इनमें से एक थी. भारत सरकार इस्राएल से 7 बराक मिसाइल सिस्टम और 200 मिसाइल खरीदने वाली थी. भारत सरकार की जो टीम इस मिसाइल को देखने इस्राएल गई थी उसने इस मिसाइल की क्षमता पर प्रश्नचिंह लगाए. साथ ही, उस समय डीआरडीओ प्रमुख रहे डॉ. अब्दुल कलाम ने भी इसकी क्षमता पर आपत्ति जताई. लेकिन, फिर भी इस सौदे को हरी झंडी दे दी गई. 


तहलका के इस स्टिंग में एनडीए सरकार की सहयोगी समता पार्टी के खजांची आरके जैन ने कबूल किया कि इस सौदे को करवाने के लिए उन्हें पूर्व नौसेना प्रमुख एसएम नंदा के बेटे सुनील नंदा से एक करोड़ रुपये की रिश्वत मिली थी. साथ ही उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस और उनकी करीबी जया जेटली को भी पैसे दिए थे. इस घोटाले की सीबीआई जाँच हुई और आरके जैन और सुनील नंदा को गिरफ्तार किया गया. 24 दिसंबर, 2013 को सीबीआई ने यह केस सबूतों की कमी के चलते बंद कर दिया. खास बात ये थी कि इस केस के बंद होने से एक दिन पहले यानी 23 दिसंबर, 2013 को तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने 262 बराक मिसाइल खरीदने की अनुमति दी थी.


साल 2000 में भारतीय वायुसेना ने रक्षा मंत्रालय से कहा कि भारत के राष्ट्रपति, पीएम और सेनाध्यक्षों समेत तमाम दूसरे बड़े वीवीआईपी लोगों के लिए नए हेलिकॉप्टर्स की जरूरत है. तब तक ये एमआई-8 हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल कर रहे थे. अगले 10 सालों में इन्हें बदलने की जरूरत थी. सुरक्षा की दृष्टि से तय किया गया कि ये ऐसे हेलिकॉप्टर हों जो 6 हजार मीटर की ऊंचाई तक उड़ सकें. 2007 में टेंडर निकाले गए. दो कंपनियां सामने आईं. पहली सिकोर्स्की और दूसरी फिनमैकेनिका. फिनमैकेनिका अगस्ता वेस्टलैंड की पैरेंट कंपनी है. केंद्र सरकार ने एयरफोर्स की सिफारिश पर अगस्ता वेस्टलैंड के मॉडल एडब्ल्यू 101 को चुना.


12 हेलिकॉप्टरों की कीमत करीब 3600 करोड़ थी. 2012 से डिलिवरी शुरू हो गई. 2013 तक 3 हेलिकॉप्टर भारत आ गए. लेकिन, 2013 में इस डील में रिश्वतखोरी की बात सामने आई. आरोप लगा पूर्व एयर चीफ मार्शल एस पी त्यागी पर. कहा गया कि उन्होंने डील के नियम बदले और ऊंचाई की सीमा को घटाकर 6000 मीटर से 4500 मीटर कर दिया. इससे अगस्ता वेस्टलैंड को ये सौदा मिल गया. इसके एवज में त्यागी और उनके रिश्तेदारों पर 360 करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के आरोप लगे. अगस्ता वेस्टलैंड की तरफ से इस पूरे सौदे को करवाने की जिम्मेदारी क्रिश्चियन मिशेल नाम के दलाल पर थी. उन्हें कंपनी ने कथित तौर पर 225 करोड़ रुपये दिए थे. इस मामले के सामने आते ही सरकार ने ये सौदा रद्द कर दिया.


अगर भारत में घोटालों की बात करें तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने मिलकर देश को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. आईये एक नजर डालते हैं भारत में 1948 से लेकर आज तक के घोटालों की सूची पर


कांग्रेस, भाजपा के संयुक्त घोटाले


ऽ    जीप घोटाला (1948)

ऽ    साइकिल घोटाला (1951)

ऽ    बीएचयू फंड घोटाला (1955)

ऽ    मो0 सिराजुद्दीन एण्ड कंपनी घोटाला (1956)

ऽ    मुंध्रा मैस घोटाला (1957)

ऽ    तेजा लोन घोटाला (1960)

ऽ    कैरो घोटाला (1963)

ऽ    पटनायक कलिंग ट्यूब्स मामला (1965)

ऽ    नागरवाला काण्ड (1971)

ऽ    मारुति घोटाला (1974)

ऽ    कुओ ऑयल डील घोटाला  (1976)

ऽ    अंतुले ट्रस्ट घोटाला (1982)

ऽ    बोफोर्स घोटाला (1987)

ऽ    सेंट किट्स मामला (1989)

ऽ    बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज घोटाला (1992)

ऽ    सिक्यूरिटी स्कैम (1992)

ऽ    तांसी भूमि घोटाला (1992)

ऽ    चीनी आयात घोटाला (1994)

ऽ    जूता घोटाला (1995)

ऽ    यूरिया घोटाला (1996)

ऽ    चारा घोटाला (1996)

ऽ    पेट्रोल पंप आवंटन घोटाला (1997)

ऽ    बराक मिसाइल घोटाला (2001)

ऽ    स्टाम्प पेपर घोटाला (2003)

ऽ    ताज कॉरिडोर मामला (2003)

ऽ    खाद्यान्न घोटाला, उत्तर प्रदेश (2003)

ऽ    सत्यम घोटाला (2008)

ऽ    मधु कोडा (2009)

ऽ    खाद्यान्न घोटाला (2010)

ऽ    हाउसिंग लोन स्कैम (2010)

ऽ    एस बैंड घोटाला (2010)

ऽ    आदर्श घोटाला (2010)

ऽ    कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला (2010)

ऽ    कोयला आवंटन घोटाला (2012)

ऽ    2जी स्पेक्ट्रम घोटाला (2008)

भाजपा के घोटाले


1- कारगिल ताबूत घोटाले, कारगिल उपकर दुरूपयोग घोटाला।

2- दूरसंचार प्रमोद महाजन - घोटाले (रिलायंस)

3-अरुण शौरी निजी खिलाड़ियों को बेलआउट पैकेज यूटीआई घोटाले

4- साइ



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