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विश्व रत्न डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर दुनिया के सर्वोच्च विद्वान-कोलंबिया विश्वविद्यालय

Published On :    24 Apr 2018   By : MN Staff
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इसमें कोई शक या संदेह नहीं है कि डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर दुनिया के सर्वोच्च विद्वान नहीं थे। वे विश्व के प्रकांड विद्वान सजग पत्रकार और हमेशा ही दूसरों के लिए जीने वाले महापुरूष थे,



इसमें कोई शक या संदेह नहीं है कि डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर दुनिया के सर्वोच्च विद्वान नहीं थे।  वे विश्व के प्रकांड विद्वान सजग पत्रकार और हमेशा ही दूसरों के लिए जीने वाले महापुरूष थे, ऐसे समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ भीमराव अंबेडकर की 127वीं जयंती पूरे देश में मनायी गयी। 


उन्हें बाबा साहेब के नाम से जाना जाता है। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे। उन्होंने मूलनिवासी बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और अछूतों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया. श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कई बातें...!


देश के संविधान को आकार देने वाले अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल साल 1891 में हुआ था। बाबा साहेब को भारतीय संविधान का आधारस्तंभ माना जाता है। उन्होंने ब्राह्मण (हिंदू) धर्म में व्याप्त छूआछूत,  महिलाओं और मजदूरों से भेदभाव जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद की और इस लड़ाई को धार दी। 


वे महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे ब्राह्मण (हिंदू) धर्म में अछूत माना जाता है। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उन्हें कई गंभीर मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा  आर्थिक मुश्किलों के साथ ही उन्हें हिंदू धर्म की कुरीतियों को सामना भी करना पड़ा और उन्होंने इन कुरीतियों को दूर करने के लिए हमेशा प्रयास किए। 


उसके बाद अक्टूबर 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया जिसके कारण उनके साथ लाखों मूलनिवासियो ने भी बौद्ध धर्म को अपना लिया। उनका मानना था कि मानव प्रजाति का लक्ष्य अपनी सोच में सतत सुधार लाना है।


डॉ.अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई। रमाबाई की मृत्यु के बाद उन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। सबिता कबीर को बाबसाहब की हत्यारिन कहा जाए तो कोई अतिसंयुक्ति नहीं होगी। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ। 


बी.आर. अंबेडकर को आजादी के बाद संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर उनकी अध्यक्षता में दो वर्ष 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ। कहा जाता है कि वे नौ भाषाओं के जानकार थे। 


इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। यहां पर उनके बारे में कुछ रोचक बातें बताने जा रहा हूं। डॉ.बाबसाहब अम्बेडकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान थे। यदि उदाहरण सहित बताया जाय तो जल्दी समझ में आयेगा। 


अभी हाल ही में अमेरिका के प्रसिद्ध कोलंबिया विश्वविद्यालय में उसके 250 वर्ष पूरा होने पर एक सर्वे किया गया कि इन 250 वर्षों में कौन सा ऐसा छात्र है जिसके आगे आज तक कोई भी विद्वान नहीं हुआ है। इस विश्व प्रसिद्ध सर्वे में कोलंबिया विश्ववि़ालय के 250 वर्षों के इतिहास में बाबासाहब अम्बेडकर को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। 


इतना ही नहीं कथित आजाद भारत के इतिहास में अब तक केवल दो ही व्यक्तियों को ‘डिलिट’ (डॉक्टर आफॅ साइंस) की उपाधि दी गयी है जिनका सम्बंध उस समुदाय से है जिस समुदाय को भारत में सदियों से थोपी गयी गैरबराबरी की व्यवस्था में अछूत कहा जाता है। 


जिनको ब्राह्मणों ने शिक्षा के भी अधिकार से वंचित रखा। उन महापुरूषों में डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर और भारत के राष्ट्रपति रहे डॉ.के.आर.नारायनन को ही अभी तक डीएससी की उपाधि हासिल हो सकी है। यह उपाधि आज तक किसी भी ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य को हासिल नहीं हुई है। 


जो इस बात का सबूत है कि इन लोगों के पास कोई मेरिट नहीं होता है। डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर के पास कुल 32 डिग्रियां थीं। जो आज तक किसी के भी पास नहीं है। साल 1990 में उन्हें भारत रत्न भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था। 


जबकि यूरेशियन ब्राह्मणों की वजह से डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया, जबकि डॉ.बाबासाहब को जीवित भारत रत्न से सम्मानित किया जा सकता था, लेकिन ब्राह्मणों ने ऐसा नहीं होने दिया। 


इसलिए बाबा अंबेडकर ने लाखों मूलनिवासियों के साथ बौद्ध धम्म अपनाकर हिन्दू धर्म अर्थात ब्राह्मण धर्म को हमेशा-हमेशा के लिए लात मार दी।


डॉ.अंबेडकर जिस ताकत के साथ समस्त मूलनिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए उन्हें एकजुट करने और राजनीतिक-सामाजिक रूप से उन्हें सशक्त बनाने में जुटे थे, उतनी ही ताकत के साथ उनके विरोधी भी उन्हें रोकने के लिए जोर लगा रहे थे। 


लंबे संघर्ष के बाद जब डॉ.अंबेडकर को भरोसा हो गया कि वे हिंदू धर्म से जातिप्रथा और छुआ-छूत की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहे हैं तो उन्होंने वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं। 


कथित आजादी के बाद पंडित नेहरू मंत्रिमंडल में डॉक्टर अंबेडकर कानून मंत्री बने और महिलाओं को पूरी तरह से आजाद करने के लिए हिंदू कोड बिल तैयार किया, लेकिन इस बिल को लेकर भी उन्हें जबर्दस्त ब्राह्मण विरोध झेलना पड़ा। 


खुद नेहरू भी तब अपनी पार्टी के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर बढ़ते दबाव के सामने झुकते नजर आए। इस मुद्दे पर मतभेद इस कदर बढ़े कि अंबेडकर ने पिछड़ों एवं महिलाओं के हक के लिए कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। 


हालांकि बाद में हिंदू कोड बिल चार अलग-अलग भागों में पास हुआ और उससे महिलाओं की स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव भी आया, लेकिन डॉ.अंबेडकर के बिल से ये कई मामलों में लचीला था। 


क्योंकि हिन्दू कोड बिल जिस प्रकार से पास कराना चाहते थे उस प्रकार से पास नहीं हुआ जिसका नतीजा सामने है कि आज आधी आबादी कही जाने वाली महिलाएं आज भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था की गुलाम हैं। जिससे बाबासाहब ने पूरी तरह से आजाद बनाने के लिए हिन्दू कोडज्ञ बिल बनाया था जिसका विरोध ब्राह्मणों एवं उनके पालतू कुत्तों ने किया।



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