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आन्दोलन के दो रास्ते

Published On :    11 Jun 2019   By : MN Staff
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जन-आन्दोलन ही एक मात्र विकल्प है



आन्दोलन के दो रास्ते हैं, पहला राजनीतिक आन्दोलन और दूसरा सामाजिक आन्दोलन. राजनीतिक आन्दोलन से केवल सत्ता का परिवर्तन होता है, वही सामाजिक आन्दोलन से व्यवस्था का परिवर्तन होता है. राजनीतिक परिवर्तन से नेता बदलता है, सरकारे बदलती हैं, मगर समस्याऐं जस की तस रहती हैं. बल्कि, सरकारों की गलत नीतियों के कारण समस्याएं और विकराल रूप धारण कर लेती है. वही सामाजिक आन्दोलन से सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं मानसिक परिवर्तन होता है. अर्थात व्यवस्था परिवर्तन होने से एक ही साथ सभी समस्याओं का समाधान होता है. अगर व्यवस्था परिवर्तन होता है तो ‘‘सत्ता और सम्पत्ति’’ बोनस में मिल जाती है.


डॉ. बाबासहाब अम्बेडकर कहते हैं ‘‘हमारा संघर्ष सत्ता और सम्पत्ति के लिए नहीं है, सम्पूर्ण आजादी के लिए है’’ दूसरी बात, देश में सत्ता परिवर्तन हर पाँच साल बाद होता है. देश में 1952 से स्वतंत्र रूप से चुनाव हो रहे हैं. हर पाँच साल बाद चुनाव होता है, नेता बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, परन्तु क्या देश में सामाजिक भेदभाव, वर्ण-व्यवस्था, जातिवाद, छुआछूत, क्रमिक असमानता, स्त्रीदासता खत्म हुई? क्या गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, हत्या, बलात्कार, आतंबवाद, नक्सलवाद खत्म हुआ क्या? इसका केवल एक ही जवाब है नहीं. चलो सत्ता परिवर्तन का ग्राफ देखते हैं. 


हर पाँच साल पर सरकारें बदलती रहीं, मगर सामाजिक भेदभाव, वर्णवाद, जातिवाद, छुआछूत, क्रमिक असमानता, गैरबराबरी, स्त्रीदास्ता आदि जो 1947 के पहले थी अर्थात गुलाम भारत में विद्यमान थी, वह सत्ता परिवर्तन अर्थात कथित आजाद भारत में आज भी उसी तरह से खड़ी ही नहीं है, बल्कि चरम पर है. भारत ही वह देश है जहाँ सामाजिक उत्पीड़न सबसे ज्यादा होता है. हर पाँच साल पर सरकारें बदलती रही, मगर जो गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी, हिंसा, दंगा-फसाद, धार्मिक उन्माद, हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, नक्सलवाद 1947 के पहले नहीं था वह सत्ता परिवर्तन के बाद आज विश्व में नंबर एक पर है. भारत में बेरोजगारी के चलते 83 करोड़ लोग गरीबी के कगार पर हैं और भुखमरी के शिकार हैं. 


भारत में हर दिन हिंसा, दंगा-फसाद, आर्थिक उन्माद आतंकवाद और नक्सलवाद की घटनाएं होती रहती हैं. अगर भारत में महिला सुरक्षा की बात करें तो आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. हर 15 मिनट पर एक महिला का बलात्कार होता है, हर 22 मिनट पर एक महिला का सामुहिक बलात्कार और हर 35 मिनट पर एक बच्ची को हवस का शिकार बनाया जाता है. अर्थात जो गुलाम भारत में नहीं था, जो 1947 के पहले नहीं था वह सत्ता परिवर्तन के बाद इतना ज्यादा बढ़ गया कि आज भारत ही भारत की महिलाओं के लिए सबसे असुरिक्षत देश बन गया है. 


यही नहीं हर पाँच साल पर सरकारें बदलती रही, मगर जो मनुस्मृति के आधार पर 1947 के पहले मूलनिवासी बहुजनों को शिक्षा, सम्पत्ति के अधिकार वंचित किया था वहीं प्रणाली आज भी धड़ल्ले से चल रही है. देश में 10 लाख स्कूल ऐसे हैं जिसमें एक भी अध्यापक नहीं है, देश में 10 लाख से ज्यादा ऐसे स्कूल हैं जो एक-एक शिक्षकों के भरोसे पर चल रहें है. यही हाल स्वास्थ्य क्षेत्र में भी है. उपरोक्त बातों का विश्लेषण करने से पता चलता है राजनीति आन्दोलन से मात्र सत्ता का परिवर्तन हा सकता है, लेकिन व्यवस्था का नहीं. 


इस विश्लेषण पर कुछ लोग सवाल उठा सकते हैं कि 1947 के बाद देश की सत्ता पर मूलनिवासी बहुजन समाज पहुँचा ही नहीं तो कैसे होगा? यह भी कहना हो सकता है कि जब तक सत्ता मूलनिवासियों के हाथों में नहीं होगी तब तक कैसे हो सकता है? देश की सत्ता तक पहुँचने के लिए ही बहुजन समाज की पार्टियाँ मेहनत कर रही हैं. हाँ यह बात बिल्कुल सत्य है, पर क्या कभी किसी ने सोचा है कि 1952 के बाद से आज तक मूलनिवासी देश की सत्ता तक क्यों नहीं पहुँच सका? 


बगैर यह इतिहास जाने हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं. डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर भी कहते थे कि ‘‘जो कौम अपना इतिहास नहीं जानता वह कौम देश, समाज का तो छोड़ो खुद का विकास नहीं कर सकता है’’ जानकारी के लिए बता दूँ कि काँग्रेस और बीजेपी मूलनिवासी बहुजनों को सत्ता तक जाने से रोकने के लिए द्विदलीय संसद प्रणाली बनायी है. एक एनडीए और दूसरा यूपीए है. इस एनडीए और यूपीए के सभी क्षेत्रिया पार्टियाँ घटक दल बनी हुई है.


इस प्रणाली का मकशद यह है कि क्षेत्रिय पार्टियाँ राज्यों में रहेगी और केन्द्र में एनडीए और यूपीए रहेगी. यही वो कारण है जो मूलनिवासियों को सत्ता तक जाने से रोकते हैं. इसलिए जब तक इस प्रणाली को खत्म नहीं किया जायेगा तब तक सत्ता तक पहुँच पाना संभव नहीं है. अब सवाल है यह कैसे संभव होगा? इस द्विदलीय प्रणाली को कैसे समाप्त किया जा सकता है? 


इसको समाप्त करने के लिए केवल एक ही विकल्प बचा है वो है जन-आन्दोलन. अगर जन-आन्दोलन किया जाए तो सारी समस्याओं का एक साथ अंत हो सकता है. वामन मेश्राम साहब के नेतृत्व में बामसेफ द्वारा जन-आन्दोलन चलाये जा रहे हैं. बस मूलनिवासी बहुजनों को साथ देने की जरूरत है. अगर मूलनिवासी बहुजन समाज साथ देता है तो हम अपने मकसद में जरूर कामयाब हो सकते हैं.



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