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अनुच्छेद 370 हटाने को लेकर विदेशों में गुस्से का माहौल

Published On :    8 Aug 2019   By : MN Staff
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मोदी सरकार के एकतरफा फैसले से भारत को गम्भीर नतीजे भुगतने होंगे : विदेशी मीडिया



‘‘ब्लूमबर्ग में छपी अर्चना चौधरी और इस्माइल दिलावर की रिपोर्ट का शीर्षक है ‘70 सालों के सबसे दिलेर कदम से मोदी की मजबूती बढ़ी, पाकिस्तान भड़का’. इसमें कहा गया है कि इस फैसले से मोदी को देश की अर्थव्यवस्था के बारे में नकारात्मक खबरों से राहत मिली है. इससे अफरातफरी में कर्ज लेने के फैसले, वृद्धि में कमी और बढ़ती बेरोजगारी से ध्यान हट गया है. पर, इससे पाकिस्तान के रिश्ते और खराब होने तथा घाटी में अशांति होने के खतरे बढ़ गए हैं. सरकार ने यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए नहीं, बल्कि हिन्दू बहुसंख्यकवाद के विचारों से प्रभावित होकर उठाया है.’’

केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा आर्टिकल 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर के तीन टुकड़े बनाये जाने पर देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी गुस्से का महौल है. इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विदेश के कई मीडिया ने मोदी सरकार की निंदा करते हुए कहा है कि भारत में मोदी सरकार का यह फैसला एकतरफा फैसला है. 


मोदी सरकार द्वारा लिए गये एकतरफे फैसले से भारत को गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं. हालांकि, भारत-पाकिस्तान के परस्पर संबंधों तथा दक्षिण एशिया में शांति व सुरक्षा के लिहाज से अहम होने की वजह से कश्मीर का मसला अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में अक्सर बना रहता है. ऐसे में कुछ प्रमुख मीडिया में छपी खबरों और टिप्पणियों को देखने से इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति की भावी हलचलों का अंदाजा लगाया जा सकता है. 


बताते चलें कि भारत सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त करने के फैसले पर विदेशी मीडिया में भी काफी चर्चा है. ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के एडिटोरियल बोर्ड ने अपनी टिप्पणी के शीर्षक में लिखा है कि भारत कश्मीर में भाग्य को परखने की कोशिश कर रहा है. इस टिप्पणी में इस फैसले के लिए अनेक तल्ख संज्ञाओं और विशेषणों का प्रयोग हुआ है. कश्मीर को ‘दुनिया की सबसे खतरनाक जगह’ बताने के पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के बयान को भी शीर्षक में रखा गया है. टाइम्स के बोर्ड ने भारत सरकार के फैसले को गलत और खतरनाक बताते हुए आशंका जतायी है कि इससे ख़ून-खराबा निश्चित तौर पर बढ़ जायेगा तथा पाकिस्तान के साथ तनाव भी गहरा हो जायेगा. 


वही लंदन से प्रकाशित होने वाले ‘द गार्डियन’ अखबार के वरिष्ठ संवाददाता जैसन बर्क ने अपने लेख में लिखा है कि मोदी सरकार का यह कदम कोई कानूनी नुक्ताचीनी की बात नहीं है, बल्कि इरादे और वैचारिकी का एक बयान है. उनका मानना है कि इस फैसले का नतीजा इतना ज्यादा गम्भीर होने वाला है जिसका अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल हो जायेगा. बर्क ने रेखांकित किया है कि बीते दशकों के लगातार दखल से कश्मीर की स्वायत्तता बहुत ही कम हो चुकी है. वहाँ बसने वाली आबादी के लिए इस अनुच्छेद का बड़ा सांकेतिक महत्व था. उनकी आशंका है कि फैसले के नतीजे कश्मीर और भारत के लिए त्रासद हो सकते हैं.


जबकि, ‘ब्लूमबर्ग’ में छपी अर्चना चौधरी और इस्माइल दिलावर की रिपोर्ट का शीर्षक है ‘70 सालों के सबसे दिलेर कदम से मोदी की मजबूती बढ़ी, पाकिस्तान भड़का’. इसमें कहा गया है कि इस फैसले से मोदी को देश की अर्थव्यवस्था के बारे में नकारात्मक खबरों से राहत मिली है. इससे अफरातफरी में कर्ज लेने के फैसले, वृद्धि में कमी और बढ़ती बेरोजगारी से ध्यान हट गया है. पर, इससे पाकिस्तान के रिश्ते और खराब होने तथा घाटी में अशांति होने के खतरे बढ़ गए हैं. साथ ही ‘ब्लूमबर्ग’ में अपने लेख में टिप्पणीकार मिहिर शर्मा ने लिखा है कि कश्मीर से संबंधित निर्णय अभूतपूर्व है और यही बहुत बड़ी समस्या है. 


इस लेख का शीर्षक है ‘भारत कश्मीर में अपना वेस्ट बैंक बना रहा है’. लेख में शर्मा ने इस बिंदु पर लिखा है कि अभी यह साफ नहीं है कि कश्मीर एक अशांत अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र बनेगा या फिर वेस्ट बैंक? जहाँ हथियारों से लैस इजरायली बाशिंदे बेहद सुरक्षित बस्तियों में रहते हैं तथा एक बड़ी और लाचार आबादी मनमाने न्याय के साये में बसती है. वे कहते हैं, सबसे ज्यादा संभावना इन्हीं में से एक की है और यह भारत के लिए किसी भी तरह से सकारात्मक नहीं होगा. इससे देश के अन्य बेचैन हिस्सों में भी चिंता बढेगी. बर्क की तरह शर्मा का भी मानना है कि सरकार ने यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा को देखते हुए नहीं, बल्कि हिन्दू बहुसंख्यकवाद के विचारों से प्रभावित होकर उठाया है.


इन्होंने भी रेखांकित किया है कि जूझती आर्थिकी के माहौल में अन्य पॉपुलिस्ट-एकाधिकारवादियों की तरह मोदी भी चुनावी फायदे के लिए बहुसंख्यक अस्मिता पर आधारित राजनीति पर जोर दे सकते हैं. वे अफसोस जताते हैं कि कश्मीरी नेता या तो भ्रष्ट हैं या ढुलमुल हैं या फिर परिवारवादी हैं. जो बाकी हैं वे इस्लामी चरमपंथी हैं. 


कमजोर राजनीतिक विपक्ष, बिकी या दबा दी गयी मीडिया और स्वतंत्र संस्थाओं के पर कुतरे जाने के कारण इस फैसले का ज़ोरदार विरोध न हो पाने को कश्मीर और भारत के लिए त्रासदी बताते हुए मिहिर शर्मा कहते हैं कि बाहर से ही कोई ठोस दबाव बन सकता है. लेकिन ट्रंप उदारवादी लोकतांत्रिक नेताओं से कहीं अधिक एकाधिकारवादियों को प्यार करते हैं और झिनजियांग के लिए कोई भी आगे नहीं आया. ऐसे में मोदी को यह चिंता क्यों होगी कि यदि वे कश्मीर में भी ऐसा करेंगे, तो भारत दुनिया में अलग-थलग पड़ जाएगा?


‘बीबीसी’ पर भारत में उसके पूर्व संवाददाता एंड्रयू वहाइटहेड ने लिखा है कि दशकों से हो रही कवायद ने अनुच्छेद 370 को व्यावहारिक तौर पर महत्वहीन कर दिया है, पर सरकार के निर्णय का सांकेतिक बहुत सबसे अधिक मायने रखता है. इन्होंने भी आशंका व्यक्त की है कि भारत का इस सबसे अस्थिर क्षेत्र में स्थिति और खराब हो सकती है. इसके अलावा ‘सीएनएन’ के निखिल कुमार ने भी लिखा है कि भारत की घोषणा से इस हिस्से में तनाव बढ़ेगा. आगामी दिनों में कश्मीर, भारत, पाकिस्तान और अन्य देशों की प्रतिक्रियाओं और हलचलों के बाद विश्लेषणों का एक चरण शुरू होगा. फिलहाल, देशी-विदेशी मीडिया की नजर हिरासत में रखे गए कश्मीरी नेताओं के बारे में भारत के अगले फैसले तथा मंगलवार को पाकिस्तानी संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक पर है. अगले कुछ दिनों में भारत सरकार के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी चुनौती दिए जाने की आशा है.


सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि जिस तरह से मोदी सरकार के इस फैसले का देश विदेश में विरोध हो रहा है और विदेशी मीडिया मोदी सरकार के फैसले को देश और जनता के लिए खतरा बता रहे हैं. उससे एक बात सच साबित होती दिखती है कि देश में कुछ न कुछ बड़ा खतरा होने वाला है. क्योंकि जब-जब जम्मू-कश्मीर को लेकर कोई फैसला हुआ है तब-तब भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुए है. 


बात उन दिनों की है जब देश में बीजेपी की सरकार थी और प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी थे. बाजपेयी सरकार ने लाहौर समझौता किया था उस समय कारगिल युद्ध हुआ था, जिसमें हजारों सैनिक मारे गये थे. अब वर्तमान में भी बीजेपी की ही सरकार और इस सरकार ने भी जम्मू-कश्मीर को लेकर बड़ा फैसला लिया है. इससे भारत और पाकिस्तान के रिस्तों में दारर आने की संभावना नजर आ रही है.


पदमाकर पाटिल (वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता)

नागपुर,  महाराष्ट्र



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