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सोनभद्र की एक कलंक कथा.....

Published On :    9 Sep 2019   By : MN Staff
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इस देश के आदिवासी कौन? फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने उपन्यास ‘‘मैला आँचल“ में आदिवासियों पर हुए हमले को सृजित किया है. मेरीगंज के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद के इशारे पर गाँव के लोगों ने आदिवासियों पर जानलेवा हमला किया.



इस देश के आदिवासी कौन? फणीश्वर नाथ रेणु ने अपने उपन्यास ‘‘मैला आँचल“ में आदिवासियों पर हुए हमले को सृजित किया है. मेरीगंज के तहसीलदार विश्वनाथ प्रसाद के इशारे पर गाँव के लोगों ने आदिवासियों पर जानलेवा हमला किया.


उसके बाद न्याय व्यवस्था के आगे एक-एक करके सभी गुनहगार छूट गए. विश्वनाथ प्रसाद आदिवासियों की जमीन हड़पने में कामयाब हो जाता है. पिछले माह उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में इसी तरह का घटनाक्रम हुआ. 


एक दबंग प्रधान के ट्रक्टरों में सैकड़ों की तादाद में लदकर पहुंचे लठैतों द्वारा आदिवासियों को उनके घरों से निकालकर बड़ी बेहरहमी से मारा पीटा गया. इस हमले में करीब एक दर्जन आदिवासी मारे गए और दर्जनों घायल हैं, जो अब भी न्याय की बाट जोह रहे हैं. 


ऐसे में सवाल उठता है कि देश का सत्ता तंत्र क्या आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार की रक्षा कर पा रहा है? सोनभद्र का हमला भी आदिवासियों की जमीनों पर कब्ज़ा करने के लिए ही हुआ है. 



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ऐसा लगता है कि भारत की वर्चस्वशाली और आक्रमणकारी शक्तियाँ आज भी आदिवासियों की जमीनों को हड़पकर उन्हें दास बनाकर रखना चाहती हैं. ‘‘मैला आँचल“ का  प्रसंग और सोनभद्र में हुए हमले का प्रसंग ऋग्वेद में उल्लखित इंद्र के हमले का ही आधुनिक और यथार्थ रूप लगता है.



पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्यों के सन्दर्भ में यह पूछा जाना चाहिए कि इस देश के आदिवासी कौन हैं? ऋग्वेद और सिंधु सभ्यता के पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि बाह्य आक्रमणकारी विदेशी आर्यों ने देश के मूलनिवासियों को नसंहार करके उनके निवास स्थलों पर कब्ज़ा कर लिया. 



जीवित बचे मूलनिवासी अपनी जान बचाने के लिए जंगल में भाग गये और जंगलों में रहने के लिए मजबूर हुए. जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है. एक प्रकार से उन्हें विदेशी आर्यों द्वारा जंगलों में धकेल दिया गया. इसका एक परिणाम यह हुआ कि आदिवासी अपनी संस्कृति को संरक्षित करने में सफल रहे. 



आगे चलकर आर्य और अनार्य विदेशी और देशज लोगों के बीच संघर्ष का दुष्परिणाम यह हुआ कि वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया गया. जिन लोगों ने आर्यों के साथ समझौता किया उन्हें आज शूद्र कहा जाता है और जिन लोगों ने आर्यों के साथ लड़ने के बाद उनकी गुलामी स्वीकार नहीं की और जंगल में चले गये उन्हें आज आदिवासी कहा जाता है और जिन लोगों ने आर्यों के साथ लड़ाई करने के बाद परजित हुए फिर भी उनकी गुलामी स्वीकार नहीं उन्हें अछूत बना दिया गया. 



इसके बाद चर्तुवर्ण व्यवस्था बनाई गयी जिसमें वर्ण व्यवस्था के अनुसार काम बांट दिये गये. बाद में इसी चर्तुवर्ण व्यवस्था ने हजारों जातियों को जन्म दिया.



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आज कल नये नजरिए से नया इतिहास लिखने का प्रयास हो रहा है. यह इतिहास दृष्टि कल्पनाओं, मान्यताओं और पूर्वाग्रहों पर ज्यादा निर्भर होने के कारण पौराणिक आख्यानों और मिथकों को इतिहास का हिस्सा घोषित कर रही है. इस दृष्टि से आदिवासी या मूलनिवासी के लिए एक नए नाम ‘वनवासी’ का प्रयोग किया जा रहा है. 


जबकि, संविधान में आदिवासी के लिए जन जाति शब्द का प्रयोग हुआ है. शब्दों की इस इतिहास दृष्टि और राजनीति से बाह्य आक्रमणकारियों के जुल्मोसितम की दास्तान को मिटाने की कोशिश हो रही है. 


साथ ही उन्हें सेवक और दास बनाकर वर्चस्वशाली समुदाय अपने रक्षार्थ लड़ाकू कौम के रूप में इस्तेमाल कर रहें हैं. वर्तमान साम्प्रदायिक राजनीति की परिस्थितियों में आदिवासियों को हिंदुत्व का पाठ पढ़ाकर उन्हें अल्पसंख्यकों के खिलाफ लड़ाने की कुटिल कोशिश हो रही है.


हिंदुत्व की पाठशाला के लक्षित समुदाय विशेषकर अनुसूचित जाति और जनजाति हैं. हनुमान, जामवंत और शबरी जैसे पौराणिक पात्रों के जरिये इनका हिन्दुत्वीकरण (ब्राह्मणीकरण) किया जा रहा है. जबकि, अनुसूचित जाति और आदिवासी विमर्श में एकलव्य जैसे चरित्र की बड़ी भूमिका रही है. 



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एकलव्य के माध्यम से यह समुदाय बाह्य आर्यों की कुटिलताओं, छल और उत्पीड़न को उजागर करता रहा है. वर्चस्वशाली ताकतें पहले इन समुदायों को अपने लिए इस्तेमाल करती हैं और फिर इनके संसाधनों को हड़पकर काबिज हो जाती हैं. 



भारतीय मिथकों और इतिहास के अनेक प्रसंगों को सांस्कृतिक राष्ट्रवादी नजरिये से लगातार विभिन्न माध्यमों के जरिए पोषित किया जा रहा है. एक प्रकार से प्राचीन भारत और पुराण ही इस पाठशाला की आधार सामग्री है.



जे. एस. मिल सरीखे अंग्रेज इतिहासकारों और औपनिवेशिक राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने मध्यकालीन भारत को शासक धर्म के आधार पर उसका दानवीकरण किया. लेकिन, एक मजेदार बात यह है कि इस काल में आदिवासियों के सन्दर्भ में कोई विशेष जानकारी नहीं मिलती है. 



सल्तनत और मुगलकाल में राज्याश्रय में लिखवाए गए इतिहास ग्रंथों तथा देशज आधुनिक भाषाओं के साहित्य में भी आदिवासियों के सन्दर्भ में कोई जिक्र नहीं मिलता. इसका मतलब यह है कि मध्यकालीन बादशाहों ने जंगल के निवासियों के जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया. 



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पहली दफा आधुनिक काल में आदिवासियों के संघर्ष और बलिदान की कहानियाँ सुनने को मिलती हैं. दरअसल व्यापार के इरादे से आए अंग्रेजों ने भारत की खनिज सम्पदा और राज्य की समृद्धि को देखकर यहाँ कब्ज़ा करके हुकूमत करने का मंसूबा पाल लिया. 



जंगलों से उन्होंने लकड़ी, कोयला जैसे प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की शुरुआत की. इसलिए तीरकमान और भाले से आदिवासियों ने अंग्रेजों का मुकाबला किया. लेकिन, आधुनिक बंदूकों और छल-कपट के युद्धों में आदिवासियों को पराजित होना पड़ा. 



यह हकीकत हैं कि 1857 के स्वाधीनता आंदोलन के पहले कोल, भील, मुंडा आदि आदिवासियों ने अपनी जान की बाजी लगाकर अंग्रेजों से युद्ध किया था. सत्तासीन अंग्रेजों ने अपने कानून में आदिवासियों को जन्मजात अपराधी घोषित किया. 



ज्ञातव्य है कि आजादी के करीब साठ साल बाद आदिवासियों को जन्मजात अपराधी ठहराने वाली आईपीसी की धारा को हटाया गया. उसी समय आदिवासियों को उनकी जमीनों का मालिकाना हक़ दिया गया. इस प्रकार दशकों से चल रही जल, जंगल और जमीन की लड़ाई का एक हिस्सा पूरा हुआ था.



 लेकिन सोनभद्र में हुए कत्लेआम ने आदिवासियों के जमीनी अधिकार के कानून पर सवालिया निशान लगा दिया है? सोनभद्र में आदिवासियों का नरसंहार दरअसल प्रशासन और गाँवो में बैठे मुख्यधारा के वर्चस्वशाली लोगों के लूट और हत्या की कलंककथा है. ऐसे में यह सवाल फिर से उठता है कि जल, जंगल और जमीन के असली मालिक कौन हैं?



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सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में प्राप्त अवशेषों के आधार पर डीएन झा जैसे इतिहासकरों का दावा है कि इस देशज सभ्यता को अंतिम रूप से घुमंतू और पशुचारण संस्कृति वाले लोहे और घोड़े से सुसज्जित विदेशी आर्यों ने समाप्त किया था. 



गंगा घाटी से लेकर राजस्थान और गुजरात के तमाम स्थल इस बात के सबूत हैं. बचे-खुचे देशज लोगों ने घने जंगलों और पहाड़ों पर अपना बसेरा किया. इस प्रकार हजार सालों से वे न सिर्फ अपनी संस्कृति और जीवन को बचाते आए हैं. बल्कि, तथाकथित मुख्यधारा की बर्बर संस्कृति से पृथक भी बने हुए हैं. 



भाषिक दृष्टि से सिंधु सभ्यता द्रविड़ सभ्यता मानी जाती है. पुरातात्विक आधार पर सबसे प्राचीन बसावट इसी सभ्यता की प्राप्त हुई है. जबकि, मानव आनुवांशिकी के अध्ययन से यह बात सिद्ध होती है कि सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन एंड्रो-आस्ट्रिक परिवार के जन समुदाय भारत के विभिन्न स्थलों पर रह रहे थे.



आज विशेषकर झारखण्ड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, अंडमान आदि राज्यों में आदिवासी बड़ी संख्या में रहते हैं. आधुनिकता और तथाकथित विकास ने आदिवासियों के जीवन को मुश्किल और उनकी संस्कृति को विकृत किया है. 



पूँजीवाद और नवउदारवादी व्यस्था में आदिवासियों को जड़ों से उखाड़कर समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का ढोंग किया जा रहा है. जबकि, आदिवासी का सबसे खुशहाल जीवन उनकी संस्कृति और प्रकृति में है. दरअसल, यह खेल आदिवासियों की जमीनों के हड़पने और सत्तातंत्र से जुड़े लोगों के अपने विकास का है. 



आदिवासियों की जमीनों के भीतर उपलब्ध खनिजों का दोहन करके सत्ता उन्हें शहरों की तरफ धकेल रही है, जहाँ वे दिहाड़ी मजदूर बनने के लिए अभिशप्त हैं. यही नहीं पिछले दो तीन दशकों में खासकर इसाई मिशनिरियों के साथ-साथ हिन्दू धर्म के अलम्बरदार आदिवासियों के धर्म परिवर्तन के लिए उनके जीवन और बसावट में गैर जरुरी हस्तक्षेप कर रहे हैं. 



जबकि, आदिवासियों का अपना एक धर्म है. वे प्रकृति पूजक हैं. लेकिन, अब प्रलोभन और भय से अन्य धर्म ग्रहण करने का उनपर दबाव बनाया जा रहा है. इस प्रकार, आज पूँजी सत्ता, राजसत्ता, सामंती सत्ता और धर्मसत्ता का चौतरफा हमला उन आदिवासियों पर हो रहा हैजो इस देश के मूलनिवासी हैं.





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