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लापरवाह सरकार

Published On :    15 May 2018   By : MN Staff
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केंद्र की एनडीए सरकार के लिए कंपनी दिवालिया कानून (इनसॉलवेंसी एंड बैंक करप्सी कोड) का सामना कर रहे 12 बड़े मामलों को निपटाने में आज मोदी सरकार पूरी तरह से नाकाम हो चुकी है, जबकि इस कंपनी दिवालिया कानून को लागू हुए दो साल बीत गए हैं इसके बाद भी सरकार को कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है। 


निश्चित तौर यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार जानबूझकर इन मामलों को लटका रही है। क्योंकि यह मामला उन लोगों से संबंधित है जो पूंजीपतियों से जुड़ा हुआ है। जबकि अगले साल मई में होने वाले आम चुनाव से पहले सरकार ने इन कंपनियों में फंसी आम आदमी के खून पसीने की कमाई की डेढ़ लाख करोड़ से ज्यादा की सम्पत्ति को निकालने का दावा किया था। 


लेकिन चार वर्ष से ज्यादा समय बीतने के बाद भी अभी तक आम जनता की खून पसीने की कमाई दलाल कंपनियों में फंसी है। दिवालिया कानून के प्रावधानों के मुताबिक दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के छह महीने के अंदर ही इसे खत्म करना होता है। यदि किसी वजह से यह 180 दिन में यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाती तो विशेष परिस्थितियों में केवल 90 दिन की अवधि ही बढ़ाई जा सकती है। 


लेकिन इन 12 बड़ी कंपनियों की दिवालिया प्रक्रिया की 270 दिन की अवधि पूरी हो चुकी है, लेकिन अदालत के दखल देने या प्रक्रियाजन्य देरी से इनमें से एक भी मामला सिरे नहीं चढ़ पाया है। जबकि ये सभी मामले पिछले साल जुलाई में ट्रिब्यूनल में दाखिल किए गए थे, जहां पर इन्हीं पूंजीपतियों का वर्चस्व है।


यदि मामलों पर गौर करें तो पता चलता है कि इस कानून के तहत निपटाए गए मामलों में बैंकों को ज्यादा फायदा नहीं हुआ है। इस कानून के तहत निपटाया जाने वाला पहला मामला सिनर्जी डूरे ऑटोमोटिव लिमिटेड का था, जिस पर 972 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। 


लेकिन बैंक इसमें से केवल 54 करोड़ रुपये ही वसूल कर पाया है। यानी कर्ज का 94 फीसदी डूब गया। दूसरा बड़ा मामला एस्सार स्टील का है, जिस पर 44,000 करोड़ रुपये का कर्ज है। इस पर पहले नूमेटल नाम के एक समूह ने 18,000 करोड़ की बोली लगाई थी, जबकि आर्सेलर मित्तल ने 32,000 करोड़ की बोली लगाई थी। बाद में नूमेटल ने भी अपनी बोली बढ़ाकर 32,000 करोड़ कर दी। 


लेकिन स्टील किंग कहलाने वाले लक्ष्मी निवास मित्तल की कंपनी आर्सेलर ने नूमेटल की बोली स्वीकार किए जाने को चुनौती दी। उसका कहना है कि नूमेटल में रेवांत रुइया के भी शेयर हैं। दिवालिया कानून नियमानुसार कंपनी के मालिक अपनी ही कंपनी की नीलामी में बोली नहीं लगा सकते और रेवांत तो नीलाम हो रही एस्सार के मालिकों में से एक हैं। 


इसलिए नूमेटल की बोली को खारिज कर देना चाहिए। इस पर एनसीएलटी के फैसले का आज भी इंतजार है। जो इन मामलों पर अभी तक कोई भी फैसला नहीं कर पाया है। नूमेटल का कहना है कि मित्तल पर उत्तम गलवा का 5,300 करोड़ और केएसएस पेट्रॉन का 7,000 करोड़ का कर्ज है। 


आईबीसी कोड के मुताबिक कोई कर्जदार कंपनी दूसरी कंपनी की नीलामी में हिस्सा नहीं ले सकती है, लेकिन मामला अभी सुलझा नहीं है। यही हाल दूसरी बड़ी कंपनियों का भी है। जेएसडब्ल्यू की एईऑन इन्वेस्टमेंट के साथ मिलकर मॉनेट इस्पात को खरीदने की पेशकश पर दूसरी कंपनियों ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज की है कि मॉनेट की मालकिन सीमा जाजोदिया हैं जो जेएसडब्लू के मालिक सज्जन जिंदल की बहन हैं, इसलिए वे बोली में हिस्सा नहीं ले सकती हैं। 


जेपी इंफ्रा के साथ कुछ और समस्या है। उसकी बोली लग रही है 8,000 करोड़ की, जबकि उसके पास 300 एकड़ जमीन भी है, जिसकी कीमत 10,000 करोड़ है। बाकी फ्लैट्स और दूसरी संपत्तियों की कीमत मिला कर कुल वैल्यूएशन 16,000 करोड़ रुपये होती है। जो अपनी देनदारी अदा करने में सक्षम है फिर भी वह देनदारी देने में असफल क्यों है? मतलब साफ है कि मोदी सरकार के गोलमोल रवैये के चलते ये बच रही हैं।

कंपनी द्वारा बैंकों को कर्ज अदा न कर पाने की सूरत में वे इसे बैड लोन घोषित कर देते हैं। बैंक कर्ज वसूल करने के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) को बताते हैं। इसकी परिसंपत्तियों का मूल्यांकन कराया जाता है। सभी कर्जदाताओं (सीओसी यानी कमेटी ऑफ क्रेडिटर्स) के दावों की जांच की जाती है। 


नीलामी की निविदा मंगाई जाती है। एनसीएलटी सभी दावों की जांच कर सीओसी की सहमति भी लेता है। यदि नीलामी की राशि कर्जदाताओं को स्वीकार नहीं है, तो एनसीएलटी उसकी संपत्तियों की नीलामी कर कर्ज वसूल करने की कोशिश करता है। 


मिली रकम कर्जदाताओं को दे दी जाती है। यह सारा काम दावा दाखिल होने के नौ माह में खत्म किए जाने का प्रावधान है। ऐसा प्रावधान होनेक के बाद भी मोदी सरकार कंपनी दिवालिया कानून के तहत न तो आम जनता की गाढ़ी कमाई इन कंपनियों से वापस करवा सकी है और ना ही कंपनियों के खिलाफ कोई कठोर कार्यवाही ही कर सकी है। 


इससे साबित होता है कि मोदी सरकार जानबूझकर कंपनियों को आम जनता की गाढ़ी कमाई को लूटने की पूरी छूट दे रही है। क्योंकि ये सभी कंपनियां उन्हीं पूंजीपतियों की है तो भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और उनकी चाटूकारिता करने वाली मनुवादी पार्टियों को चुनाव लड़ने के लिए कालाधन उपलब्ध कराती है। 


इसी कारण से इन कंपनियों के खिलाफ चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी हो कानूनी प्रावधान होने के बाद भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करती हैं। क्योंकि ये सभी कंपनियां इन्हीं मनुवादी लोगों की है जिनकी पार्टियां आज देश की सत्ता में काबिज हैं, जो देश की आम जनता को कंगाल बनाने का काम कर रही हैं।

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