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ताक पर संविधान

Published On :    19 May 2018   By : MN Staff
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इस समय पूरे देश की निगाहें हाल ही में सम्पन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद चल रहे नाटक पर लगी हुई हैं जहां पर संघ के पिट्ठू राज्यपाल बजुभाई वाला के एक असंवैधानिक कदम से जहां लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ रही हैं। राज्यपाल ने परिणाम के बाद जो कदम उठाया इसकी पहले से ही उम्मीद थी क्योंकि कर्नाटक के राज्यपाल बजुभाईवाला सबसे तो आरएसएस का आदमी है बाद में वह राज्यपाल है। 


इन संघियों का इतिहास ही ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है कि उन्होंने हमेशा ही डा. बाबासाहब अम्बेडकर के संविधान के विरोध में जाकर काम किया है और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुवादी मानसिकता के लोगों ने राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों को दागदार बनाने में कोई कसर नहीं लगायी है। कर्नाटक के राज्यपाल तो उस संगठन के कट्टर समर्थक हैं जिनका सम्बंध गुजरात है और इतना ही बजुभाईवाला वह शक्स है जिसने नरेन्द्र मोदी की सरकार में 18 वर्ष तक वित्तमंत्री रहे हैं और इस हद तक आरएसएस के समर्थक है कि नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए स्वतः विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था इनके इसी खासियत को आधार बनाकर यदि विश्लेषण किया जाय तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ऐसे लोगों से संविधान सम्मत कदम उठाने की तो उम्मीद ही नहीं कर सकते है। 


उनके द्वारा उठाया गया कदम ही इस बात की ओर इंगित करता है उन्होंने त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में भाजपा की सत्तासीन बनाने का काम किया है क्योंकि उनको ऐसा ही काम करने के लिए राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया गया है। जो संघ की मानसिकता से मुक्त होकर किसी भी स्थिति में उनके काम करने की गारण्टी नहीं दी जा सकती है।


कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में बहुमत नहीं होने की स्थिति से पूरी तरह से आश्वस्त हुए बगैर ही उसको सरकार बनाने का मौका देना एकदम असंवैधानिक ही कहा जा सकता है जिसके मूल्यों की रक्षा करना संवैधानिक पदों पर आसीन होने वाले लोगों की है। जिन पर भारतीय लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व संविधान ने सौप रखा है जिसमें संवैधानिक पदों पर आसीन होने वाले प्रत्येक नागरिक की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों की हरहाल में रक्षा करने की जिम्मेवारी आयत होती है।


भारत में संविधान लागू होने के बाद जिन लोगों को इन संवैधानिक पदों पर आसीन किया गया है या नियुक्ति किया गया है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है इन महामहीमों का विवेक लोकतंत्र तार-तार होने से नहीं बच पाया है। क्योंकि इन पदों पर आसीन होने वाले लोगों ने हमेशा ही संविधान सम्मत कदम नहीं उठाया क्योंकि ऐसे लोगों की मानसिकता संविधान विरोधी रही है। जबकि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार विधानसभा त्रिशंकु होने की स्थिति में जब तक किसी भी दल के बहुमत है होने का भरोसा नहीं हो, तब तक किसी को भी सरकार बनाने का मौका देना गलत ही कहा जा सकता है।


ऐसी ही स्थिति कर्नाटक में बनी हुई है। ठीक इसी प्रकार स्थिति वर्तमान समय में पांच राज्य ऐसे हैं जहां पर भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी नहीं है जहां पर गैर भाजपा दल सबसे ज्यादा सीटें जीतकर आये हैं। फिर भी उनको सरकार बनोन का मौका राज्यपालों ने क्यों नहीं दिया।


जबकि कर्नाटक में दिया जा सकता है तो फिर बिहार, गोवा, मणिपुर, मेघालय में और नागालैण्ड जैसे राज्यों में भी मौका मिलना ही चाहिए। जहां पर सरकार बनाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। इस पर भी देश की सर्वोच्च अदालत के स्वतः संज्ञान लेने के अधिकार का इस्तेमाल करके उसकी स्थिति पर भी विचार करना चाहिए जहां के महामहीमों ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाहन करने की बजाय अपनी पार्टी हित को सबसे अधिक महत्व दिया है। जो उनकी मानसिकता को प्रदर्शित करने के लिए काफी है। वर्तमान समय में अधिकांश महामहिम संघ के लोग हैं जिन्होंने हमेशा ही भारतीय संविधान के विरोध में जाकर काम किया है वही काम वे आज भी कर रहे हैं जिसके अन्दर समतावादी सोच की बजाय 


विषमतावादी सोच ठूंस ठूंस कर भरी हुई हैं तो इसकी कोई गारण्टी नहीं दी जा सकती है कि संघ के लोग संविधान के प्रावधानों का पालन ईमानदारी कर रहे हैं। जिन्होंने हमेशा ही संविधान के विरोध में जाकर काम किया वही आज भी जारी है।जो भारतीय संविधान का खुला उल्लंघन है।

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