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भारत सरकार एक बीमार सरकार

Published On :    19 May 2018   By : MN Staff
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दुनिया की तुलना में स्वास्थ्य सेवा में भारत बहुत पिछड़ा हुआ देश है। हम स्वास्थ्य में पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल से भी पीछे हैं। हर साल पाँच साल से कम उम्र के 15 बच्चे लाख मरते हैं। नियोनेटल डेथ (नवजात शिशु की मृत्यु) जन्म लेने से एक महीने के अन्दर मरने वाले बच्चों के मामले में दुनिया में भारत पहले स्थान पर है। दुनिया के 35 देशों में जहाँ पर 5 साल से उम्र के बच्चे मरते हैं, इसमें भारत पहले स्थान पर है और 46 प्रतिशत बच्चें कुपोषण के शिकार हैं। उम्र के हिसाब से वजन नहीं है, उम्र के हिसाब से लम्बाई कम है और लम्बाई के हिसाब से वजन भी कम है। इससे हमारे बच्चों का शरीरिक विकास नहीं हो रहा है। इन बच्चों का भविष्य अंधेरे में है। लोग जिस बिमारी से मर रहे हैं, उस बीमारी का आसानी से इलाज किया जा सकता है। बहुत से देशों में इन बिमारियों का नामोनिशान नहीं है। बिमारियों के इलाज का खर्च भी बहुत कम है। 


एक नई बीमारी हमारे देश में लोगों को मार डालती है वो बीमारी है भारत सरकार। वो कैसे जान से मार डालती है? इसके बारे में आपलोगों को भ्रम होगा। सरकार के पास जनता को मारने के बहुत से तरीके हैं। वो आपको पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं देती हैं, मगर टैपवाटर (टोटी का पानी) देती हैं, वो पानी भी शुद्ध नहीं है। सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं होता है। लोगों की जनसंख्या के हिसाब से अस्पताल बनाना सरकार ने बन्द कर दिया है। हेल्थ सेक्टर के लिए सरकार ने बजट कम कर दिया है। सरकार ने स्वास्थ्य के लिए 37,000 करोड़ रूपये का बजट दिया है और डिफेन्स (रक्षा) के लिए 2 लाख करोड़ रूपये का बजट दिया है। बच्चों के विकास के लिए पैसा कम है और गाँवों की सफाई के लिए ज्यादा पैसा खर्च किया जाता है। 


दुनिया के सबसे गन्दे शहरों में भारत में ज्यादा गन्दे शहर हैं। इसी वजह से बिमारियाँ फैल जाती हैं और लोग मर जाते हैं। अस्पताल में दाखिल होने के बाद एक साल की आमदनी में से आधा खर्च हो जाता है। 40 प्रतिशत लोग अपनी बीमारी के इलाज के लिए घर बेचते हैं या कर्जा लेते हैं। 25 प्रतिशत लोग अस्पताल में स्वास्थ्य खर्च की वजह से (बीपीएल) गरीबी रेखा से नीचे हो जाते हैं। 


सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को पूरा का पूरा निजीकरण कर दिया है। संविधान के आर्टिकल 47 के हिसाब से स्वास्थ्य सेवा सरकार की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य सेवा के नाम पर प्राईवेट अस्पताल को लूटने का लाईसेन्स दिया गया है। प्राईवेट अस्पताल को चलाने वाले लोगों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार अपने आप गैर-जिम्मेदार बन गयी है। स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर (इन द सर्विस ऑफ द पिपुल) प्राईवेट अस्पताल वाले आम लोगों को लूटते हैं क्योंकि सरकार ने उनको लूटने का लाईसेन्स दे रखा है। प्राईवेट अस्पताल वाले जनता को लूटकर सरकार को फायदा पहुँचाते हैं। 


प्राईवेट अस्पताल वाले जनता को लूटने के साथ-साथ प्राईवेट अस्पताल में काम करने वाले कर्मचारियों को भी लूटते हैं। प्राईवेट अस्पताल में काम करने वाले सभी लोग ठेकेदारी प्रथा में काम करने वाले होते हैं और उन लोगों का तनख्वाह भी कम रहता है। प्राईवेट अस्पताल में काम करने वाले लोगों की भी सुरक्षा नहीं रहती है। प्राईवेट अस्पताल में काम करने वाले मेडिकल स्टॉफ और डाक्टर की भी तनख्वाह बहुत कम होती है। 


प्राईवेट अस्पतालों को फार्मा कम्पनियाँ ज्यादा कमीशन देती हैं और डाक्टरों को कीमती की गिफ्ट देती है या विदेशी कार का गिफ्ट देने वाली कम्पनी की दवा को प्राईवेट अस्पताल अपने पास रखती हैं। जो दवा ज्यादा मार्जिंन देती हैं, उस दवा को बड़े-बड़े डाक्टर रखते हैं। और जो गैस की गोली 2.65 रूपये में मिलती है, वही गोली 8.65 रूपये वाली लिखते हैं क्योंकि उसमें उनको कमीशन ज्यादा मिलता है। जो एन्टीबायोटिक दवा 211 रूपये में मिलती है, उसको डाक्टर 700 रूपये वाला ब्राण्ड की दवा का लिखता है, क्योंकि उसको उसमें फायदा मिलता है। कम पैसा वाला दवा लेकर अगर डाक्टर को दिखाया तो डाक्टर गुस्सा करके महंगे वाली दवा खरीदने के लिए मजबूर करता है।


जिस बीमारी का इलाज 100 रूपये में होता है, प्राईवेट अस्पताल में 1000 रूपये लगता है। इसका असर दो तरीके से होता है। मरीज पूरा इलाज नहीं करवाता है, और यदि पूरा इलाज करवाया तो उसको लूट लिया जाता है। लोग प्राईवेट अस्पताल से डर जाते हैं। बहुत लोगों को समस्या की जानकारी है, लेकिन छुपी हुई समस्या के बारे में जानकारी नहीं है। ये सब सच्चाई लोगों को बताने की जरूरत है। सरकार जो लोगों के स्वास्थ्य के बारे में धोखेबाजी कर रही है। इसकी जानकारी लोगों तक पहुँचाना है। जनता के विरूद्ध एन्टीपिपुल (गैर मानवीय) कामों को सरकार अंजाम दे रही है। सरकार की दुश्मनी को लोगों को बताने की जरूरत है। 

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