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मूलनिवासी बहुजनों को अपने इतिहास से लेना होगा सबक

Published On :    30 May 2018   By : MN Staff
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जिस समाज का अपना इतिहास मालूम नहीं होता है उसका भविष्य अंधकारमय होता है और जिसका भविष्य अंधकारमय होता है, वे समाज वैचारिक गुलामी से कभी मुक्ति नहीं होता है। उसकी उन्नति और उद्धार का मार्ग सदा के लिए अवरूद्ध हो जाता है। इतिहास प्रेरणा देता है, प्रेरणा से स्वाभिमान जगता है, मनोबल बढ़ता है, स्वाभिमान और मनोबल से हक के लिए संघर्ष की शक्ति प्राप्त होती है और संघर्ष से क्रांति होती और क्रान्ति से सत्ता मिलती हैं।’’ आज सभी मूलनिवासी बहुजनों का कर्तव्य है कि जिस घृणापरक प्रवत्तियों के साथ विदेशी ब्राह्मणों ने देश के मूलनिवासियों को पराजित और विभाजित करके गुलाम बना रखा है, मूलनिवासी इतिहास को मिटा डाला है। 


उन प्रवृत्तायों को समूल नाश का प्रण करना होगा तथा नया इतिहास गढ़ना होगा। इतिहास और इस आनुवंशिक शोध से सीख लेते हुए हमें चट्टानी एकता कायम करनी है, समान विचार और समान कार्यक्रम बनाना है तथा बहुजन समाज, बहुजन सत्ता, बहुजन संस्कृति और बहुजन धर्म की स्थापना करना है। इसके लिए प्रत्येक को निजी क्षुद्र स्वार्थों और महत्वकांक्षाओं को तिलांजलि देनी होगी तथा त्याग और संघर्ष का संकल्प लेना होगा। तभी डा. बाबासाहब के सपनों का आदर्श समाज अर्थात समता, स्वतंत्रता, भाईचारा तथा न्याय पर आधारित समाज की स्थापना की जा सकती है, मूलनिवासी गौरव को हासिल किया जा सकता है।


समृद्ध और विकसित भारत के लिए विदेशी ब्राह्मणों द्वारा भी वर्तमान ब्राह्मणी व्यवस्था का पुनर्मूल्यांकन समय की मांग है। आस्ट्रेलियाई और अमेरिकी श्वेतों से भारतीय आर्य ब्राह्मण प्रेरणा लेकर एक नया इतिहास गढ़ सकते हैं। जिस प्रकार ब्राह्मणों द्वारा भारत का शूद्रातिशूद्र वर्ग हजारों साल से शास्त्रीय निर्योग्यताओं के बोझ तले दबकर चरम शोषण के दौर से गुजरा है, उसी प्रकार आस्ट्रेलिया और अमेरिका के अश्वेत भी वहां के श्वेत समाज द्वारा लगातार अवसरों से वंचित किये गये थे। 


परन्तु इन देशों की श्वेत-सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। सन् 2008 में आस्ट्रेलिया के श्वेत समाज और सरकार ने वहां के मूलनिवासियों से उनके साथ अतीत में की गई दमन और शोषण के लिए माफी मांगी। नस्ल भेद के आधार पर आस्ट्रेलिया में गोरे लोगों ने वहां के मूलनिवासियों के साथ नाना तरह के अपमान और उत्पीड़न किया था। 


यह आस्ट्रेलिया के ही जागरूक सरकार और समाज की उदारता और महानता की उद्भूत मिशाल है कि उसने अपनी गलती का प्रायश्चित वहां के अश्वेतों को अधिकर और सम्मान देकर किया। इसी प्रकार अमेरिका की सरकार ने भी गत 2008 में दास-प्रथा के लिए वहां के मूलनिवासियों (अफ्रीकन-अमेरिकन) से क्षमा मांगी है। अमेरिकी सीनेट ने 1988 में अमेरिका के मूलनिवासी रेड इंडियंस पर किये गये अत्याचार के लिए क्षमा मांगते हुए 1877 में उनकी जमीन गैर कानूनी रूप से छीनने के एवज में 12.2 करोड़ डालर का मुआवजा दिया था। ऐसी मिशाल भारत में भी पेश किया जा सकता है, यदि सत्य को स्वीकार कर बुराई के महिमामंडन से परहेज किया जाए। 


कितना अच्छा होता। यदि कोई ब्राह्मण वंशज आगे आकर आर्य पूर्वजों द्वार निर्मित असमानता पर आधारित ब्राह्मणी व्यवस्था के खिलाफ बगावत का बागडोर थाम लेता तथा बहुजन ब्राह्मण बंधुत्व स्थापित करने के लिए तूफानी संघर्ष करता। लेकिन भारत की व्यवस्था पर काबिज शासक वर्ग की चारित्रक इतिहास को आधार बनाकर विश्लेषण किया जाय तो यह निष्कर्ष निकालकर सामने आता है कि विदेशी यूरेशियन ऐसा कभी करने वाला नहीं है। 


क्योंकि उसको यहां की मिट्टी, प्रकृति और इन्सानियत से कुछ भी लेना देना नहीं है वह केवल अभी सत्ता एवं व्यवस्था को कायम रखने के लिए ही फर्जी देश भक्ति एवं सहानभूति का नाटक करता है और देश को लूटकर विदेशी तिजोरियां भरने का काम कर रहा है। यह क्रम करीब 5000 वर्ष से चल रहा है जो नम्बर एक देशद्रोही है क्योंकि उसके डीएनए में वह सच्चाई छिपी हुई है जो उसकी चापलूसी, धोखेबाजी और दंगाबाजी का सबूत दे रहा है क्योंकि ऐसा इसीलिए दावे के साथ कहा जा सकता है कि इसके डीएनए और इस देश के असली मालिक मूलनिवासी बहुजनों से किसी भी 99.99 प्रतिशत मेल नहीं खाता है जो उसके शरीर में आज भी मौजूद है जिसमें ईमान सच को स्वीकार करने की हिम्मत नहीं है जिसका चरित्र ही बेईमानी और देश की गद्दारी भरा है तो वह ईमानदार 200 प्रतिशत नहीं हो सकता है। जिसका सबूत सामने है वह आज भी अपनी चाणक्य नीति से देश के मूलनिवासी बहुजनों को गुलाम बनाने की नीति पर अग्रसर है।

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