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खतरे में संघ का वर्चस्व

Published On :    11 Jun 2018   By : MN Staff
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जैसे जैसे देश में बामसेफ एवं ऑफसूट संगठनों के माध्यम से मूलनिवासी महापुरूषों की समतामूलक विचारधारा का विस्तार हो रहा है वैसे ही संघ को बैक फुट पर जाकर सोच विचारकर अपने बयानों को संयमित करना पड़ रहा है क्योंकि इस समय देश में फुले-शाहू-अम्बेडकर के सच्चे अनुयायियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है और संघ की वेमनस्यता, नफरत और अराजकता वाली विचारधारा विस्तार लगातार घट रही है जिससे संघ के लोगों में स्पष्ट रूप से घबराहट देखी जा सकती है। 


वैसी ही घबराहट स्वत संघ प्रमुख मोहन भागवत की भाषा से ही अन्दाजा लगाया जा सकता है उन्होंने कहा कि संघ को सम्पूर्ण समाज का निर्माण करता है। इसलिए संघ के लिए कोई भी पराया नहीं है उनका यह बयान इस बात का संकेत दे रहा है कि संघ पर जो जातिवाद, भेदभाव, छुआछूत का जो हमेशा ही आरोप लगता रहा है उसी ठप्पा को हटाने का प्रयास संघ प्रमुख ने किया है। 


लेकिन इससे काम अब चलने वाला नहीं है क्योंकि आरएसएस का काला इतिहास अब बामसेफ एवं भारत मुक्ति मोर्चा के माध्यम से जन जन तक पहुंच रहा है जिससे संघ के द्वारा चलाये जा रहे प्रोपगण्डों का सच अब उन लोगों को मालूम हो रहा है जिन लोगों को विदेशी यूरेशियन लोगों ने मूलनिवासी बहुजनों को उन्हीं के देश में गुलाम बनाकर रखा है। 


जो आज भी गुलाम का जीवन जीने को मजबूर कर दिये गये हैं। मूलनिवासी बहुजन समाज को संविधान लागू होने के बाद भी वह हक और अधिकार नहीं मिल रहा है जिसके वे हकदार है संविधान के बाद भी आज देश की लोकतांत्रिक मशीनरी पर ही एक जाति या वंश का कब्जा बना हुआ है। जो असमानतावादी व्यवस्था के समर्थक आरएसएस की ही देन है।


यही वह संगठन है जिसके विचारधारा के लोगों ने इस देश की समूची लोकतांत्रिक मशीनरी अपना कब्जा जमा रखा है। और यहां की जल, जंगल, जमीन पर भी अपना प्रभुत्व बना रखा है। इसका सूत्रधारा कोई और नहीं बल्कि जवाहर लाल नेहरू है जो देश का पहला प्रधानमंत्री बना और इस देश में संघियों को लोकतंत्र की समूची व्यवस्था पर काबिज किया। जो स्वतः संघ के कैडर में जाता रहा है और संघ को अपनी सत्ता के संरक्षण में पूरे देश में स्थापित होने का मौका दिया। 


देश की कथित आजादी के समय से आज तक अप्रत्यक्ष रूप से संघ के लोग ही सत्ताधारी रहे हैं आज अगर संघ पूरी तरह से सत्ता में काबिज हुआ है तो उसकी जिम्मेदार कांग्रेस है क्योंकि कांग्रेस का निर्माण सन् 1885 में यूरेशियन लोगों ने किया और इस देश में अपने वांशिक वर्चस्व को प्रस्थापित रखने के लिए सन् 1925 में आरएसएस का निर्माण किया जिसने अपने उच्च वर्गीय सवर्णों की पहचान को अलग बनाये रखा और इस देश के लोगों को वर्णव्यवस्था, जातिव्यवस्था, छुआछूत, भेदभाव एवं क्रमिक असमानतावादी व्यवस्था का गुलाम बनाये रखने का काम किया। 


इतना ही नहीं इन्होंने इस संगठन का आरएसएस के नाम पर खूब प्रचार प्रसार किया जिसमें सरकारी धन भी पानी की तरह बहाया गया, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ आज तक किसी को नहीं बताया है इसका शब्दिक अर्थ बताना हम अपना सामाजिक दायित्व समझते हैं आरएसएस का शाब्दिक अर्थ है रेशियल सुपरमेसी शोसल सिस्टम जिसका हिन्दी में अर्थ है वांशिक श्रेष्ठता पर आधारित समाज व्यवस्था यानि (वंश श्रेष्ठतातंत्र) है। 


जिसका एक मात्र मतलब है कि ऐसा समाज सिस्टम स्थापित होना चाहिए जिससे यूरेशियन रेश और मूलनिवासी बहुजनों में स्पष्ट अन्तर दिखना चाहिए जो आज भारतीय समाज व्यवस्था में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जहां पर यूरेशियन लोगों की पहचान वर्णश्रेष्ठता के चलते ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के रूप में होती है वहीं मूलनिवासी बहुजनों की पहचान इस वर्णश्रेष्ठ सिद्धान्त के कारण शूद्र और अतिशूद्र के रूप में हो रही है यदि संवैधानिक भाषा में कहा जाय तो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी एवं धर्मपरिवर्तित लोगों के रूप में हो रही है इस ब्राह्मणवादी व्यवस्था को आज बामसेफ एवं भारत मुक्ति मोर्चा एवं ऑफसूट संगठनों के माध्यम से पूरी तरह से एक्सपोज कर दिया है जिससे सबसे अधिक घबराहट या भय रेशियल सुपरमेसी शोसल सिस्टम प्रस्थापित करने वाले संगठन को हो रही है। 


जिसकी विचारधारा का क्षेत्र दिन प्रतिदिन सिकुड़ रहा है और दिन प्रतिदिन उसके समर्थकों की संख्या घट रही क्यांकि इस संगठन में काम करने वाले अधिकांश लोग एससी, एसटी, ओबीसी के लोग हैं, जिनको बामसेफ के कारण अब यह पता चल रहा है कि हमारा असली हितचिंतक कौन है और हमारा असली दुश्मन कौन है? जैसे ही उनको इस बात का पता चलता वे तुरन्त ही वर्ण एवं जाति समर्थक संघ को लात मारकर अलग हो जाते हैं।


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